मुगल बादशाह अकबर के दरबार में कई विद्वान थे. इन लोगों को बाद में अकबर के नवरत्न कहा गया. इन नवरत्नों में बीरबल का नाम सबसे अलग दिखाई देता है. बीरबल केवल एक दरबारी नहीं थे. वह अकबर के करीबी दोस्त थे. कवि थे. बुद्धिमान सलाहकार थे. हाजिरजवाब इंसान थे. अकबर को उनकी बातें बहुत पसंद थीं. बीरबल का असली नाम महेश दास था. उनका जन्म उत्तर भारत के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्मस्थान को लेकर इतिहासकारों में अलगअलग मत मिलते हैं. कुछ लोग उन्हें कालपी का रहने वाला मानते हैं. कुछ स्रोत उन्हें कन्नौज या आसपास के क्षेत्र से जोड़ते हैं. महेश दास को बचपन से ही कविता और भाषा में रुचि थी. वह संस्कृत, हिंदी और फारसी का अच्छा ज्ञान रखते थे. उनकी बातों में सरलता थी. उनकी समझ बहुत तेज थी. भारत में अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में मनाने का चलन है.

इए, मित्रता दिवस के बहाने अकबरबीरबल की दोस्ती की कहानियां जानतेसमझते हैं? यह भी जानेंगे कि कैसे एक कवि बादशाह अकबर का न केवल दरबारी बना बल्कि नवरत्नों में शामिल हुआ और फिर दोनों गहरे दोस्त हो गए.

पहली मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

कहा जाता है कि महेश दास की मुलाकात अकबर से तब हुई, जब वह दरबार में अपनी कविता सुनाने पहुंचे थे. उनकी कविता से अकबर बहुत प्रभावित हुए. अकबर उस समय ऐसे लोगों की तलाश में रहते थे, जो केवल उनकी प्रशंसा न करें. वह चाहते थे कि उनके आसपास समझदार और सच बोलने वाले लोग रहें. महेश दास ने अपनी बात बहुत आत्मविश्वास से रखी. उनकी भाषा में मिठास थी. उनकी बुद्धि में गहराई थी. अकबर ने उन्हें अपने दरबार में रख लिया. कुछ समय बाद अकबर ने उन्हें कविराय की उपाधि दी. बाद में वह राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुए. माना जाता है कि बीरबल नाम अकबर ने ही उन्हें दिया था.

बीरबल का असली नाम महेश दास था.

दोस्ती की असली वजह क्या थी?

अकबर और बीरबल की दोस्ती केवल मजाक और हंसी पर आधारित नहीं थी. इसके पीछे कई बड़ी वजहें थीं. बीरबल अकबर को सही सलाह देते थे. वह कठिन सवालों का आसान जवाब खोज लेते थे. वह बिना डरे बादशाह की गलतियों की ओर भी इशारा कर देते थे. अकबर को बीरबल की यही बात सबसे अच्छी लगती थी. दरबार में बहुत से लोग बादशाह की बात पर तुरंत सहमति जता देते थे. बीरबल ऐसा नहीं करते थे. वह अकबर का सम्मान करते थे. लेकिन जरूरत पड़ने पर असहमति भी जताते थे. यही वजह थी कि अकबर उन्हें केवल दरबारी नहीं, बल्कि दोस्त मानते थे.

लाजवाब थी बीरबल की हाजिरजवाबी

बीरबल की सबसे बड़ी ताकत उनकी हाजिरजवाबी थी. वह किसी भी परिस्थिति में शांत रहते थे. सामने चाहे बादशाह हों या कोई बड़ा सेनापति, वह अपनी बात समझदारी से रखते थे. एक प्रसिद्ध कथा में अकबर ने बीरबल से पूछादुनिया में सबसे ज्यादा कौवे कहां हैं? बीरबल ने तुरंत जवाब दियाजहांपनाह, आपके राज्य में. अकबर ने पूछाअगर कौवों की संख्या इससे कम निकली तो? बीरबल बोलेतो कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गए होंगे. अकबर ने फिर पूछाअगर संख्या ज्यादा निकली तो? बीरबल ने कहातो दूसरे राज्यों के कौवे यहां मेहमान बनकर आए होंगे. यह लोककथा है. इसका पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन यह बीरबल की तेज बुद्धि और हास्यबोध को दिखाती है.

मुगल बादशाह अकबर. फोटो: Getty Images

बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी

बीरबल और अकबर से जुड़ी एक और बहुत प्रसिद्ध कहानी है. इसमें एक गरीब आदमी ठंडे पानी में खड़े होकर इनाम पाने की कोशिश करता है. गरीब आदमी कहता है कि वह केवल दूर जल रहे दीपक को देखकर ठंडे पानी में खड़ा रहा. अकबर को लगता है कि दीपक की गर्मी से उसे सहारा मिला होगा. इसलिए वह उसे इनाम नहीं देते. बीरबल इस फैसले से दुखी होते हैं. अगले दिन वह दरबार में नहीं आते. अकबर उनके बारे में पूछते हैं. बीरबल संदेश भेजते हैं कि खिचड़ी पक रही है. लेकिन हांडी आग से बहुत दूर टंगी है. अकबर समझ जाते हैं कि इतनी दूर रखी हांडी में खिचड़ी नहीं पक सकती. तब बीरबल कहते हैंअगर दूर का दीपक गरीब आदमी को गर्मी दे सकता है, तो दूर की आग खिचड़ी भी पका सकती है. अकबर को अपनी गलती समझ आती है. वह गरीब आदमी को उसका इनाम दे देते हैं. यह कहानी भी लोक प्रचलित है. इसका उद्देश्य न्याय और तर्क की बात समझाना है.

जब बीरबल ने बादशाह को आईना दिखाया

बीरबल अकबर की गलतियों पर सीधे हमला नहीं करते थे. वह अपनी बात कहानी या मजाक के जरिए कहते थे. एक कथा के अनुसार, अकबर ने कभी कहा कि उनके राज्य में सभी लोग बहुत समझदार हैं. बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि यह बात तभी साबित होगी, जब लोग बिना सोचे बादशाह की हर बात को सही न मानें. अकबर ने पूछाक्या तुम मेरी बात को गलत कह रहे हो? बीरबल ने उत्तर दियामैं आपकी बात को गलत नहीं कह रहा. मैं केवल यह कह रहा हूं कि समझदार लोग सवाल भी पूछते हैं. अकबर को यह जवाब पसंद आया. वह जानते थे कि बीरबल उनका अपमान नहीं कर रहे. वह उन्हें बेहतर शासक बनने में मदद कर रहे हैं.

धर्म और अकबर की समझदारी

अकबर के शासनकाल में अलगअलग धर्मों के लोग रहते थे. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाने की कोशिश की. बीरबल भी इस माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे. बीरबल हिंदू धर्म से जुड़े थे. फिर भी वह मुगल दरबार में सम्मानित थे. अकबर उनकी धार्मिक पहचान का सम्मान करते थे. कहा जाता है कि बीरबल ने कई बार अकबर को समझाया कि किसी भी धर्म या समुदाय के बारे में फैसला करने से पहले उसके विचारों को समझना जरूरी है. अकबर के धार्मिक विचारों में समय के साथ बदलाव आया. वह अलगअलग धर्मों के विद्वानों से चर्चा करते थे. बीरबल भी ऐसे संवादों में शामिल रहते थे.

नवरत्नों में बीरबल का स्थान

अकबर के दरबार में अबुल फजल, फैजी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह और अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे महान लोग थे. इन लोगों को लोकप्रिय रूप से अकबर के नवरत्न कहा जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि नवरत्न की यह सूची बाद की परंपराओं में अधिक प्रसिद्ध हुई. अकबर के समय सभी नौ लोगों की एक आधिकारिक सूची का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. फिर भी बीरबल का महत्व इसमें कम नहीं होता. वह अकबर के भरोसेमंद सलाहकार थे. वह सैनिक अभियानों में भी शामिल हुए. उन्हें ऊंचा पद मिला. उनकी पहचान एक प्रभावशाली दरबारी के रूप में बनी.

बीरबल की मृत्यु और अकबर का दुख

बीरबल की मृत्यु वर्ष 1586 में हुई. वह उत्तरपश्चिमी क्षेत्र में एक सैन्य अभियान पर गए थे. यह अभियान यूसुफजई कबीलों के खिलाफ था. युद्ध में बीरबल और उनके साथ बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए. यह अकबर के शासनकाल की बड़ी सैन्य त्रासदियों में से एक थी. इतिहास में यह भी मिलता है कि अकबर को बीरबल की मृत्यु से गहरा दुख हुआ. बीरबल उनके सबसे करीबी लोगों में थे. दरबार में उनकी जगह कोई आसानी से नहीं ले सका. उनकी मृत्यु के बाद अकबर के जीवन से हंसी का एक बड़ा स्रोत चला गया. बीरबल के साथ अकबर को केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि अपना सच्चा मित्र खोना पड़ा.

क्यों लोकप्रिय हैं बीरबल की कहानियां?

बीरबल की कहानियां बच्चों और बड़ों दोनों को पसंद आती हैं. इनमें मनोरंजन भी है और सीख भी. इन कहानियों में बीरबल कमजोर व्यक्ति की मदद करते हैं. वह लालची लोगों को सबक सिखाते हैं. झूठे लोगों का पर्दाफाश करते हैं. वह अकबर को भी तर्क के जरिए समझाते हैं. इनमें से कई कहानियां लोककथाएं हैं. उन्हें इतिहास का पक्का दस्तावेज नहीं माना जा सकता. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। फिर भी वे बीरबल की लोकप्रिय छवि को समझने में मदद करती हैं. बीरबल की असली महानता उनकी बुद्धि में थी. उन्होंने साबित किया कि दरबार में स्थान केवल ताकत से नहीं मिलता. ज्ञान, विनम्रता और सही समय पर सही बात कहने की क्षमता भी बहुत जरूरी होती है. अकबर और बीरबल की दोस्ती इसी विश्वास पर टिकी थी. एक बादशाह था. दूसरा उसका समझदार सलाहकार, लेकिन दोनों के बीच रिश्ता दोस्ती का था. यही वजह है कि सैकड़ों साल बाद भी बीरबल और अकबर की जोड़ी लोगों के दिलों में जिंदा है.