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एक तरफ परिवार का विरोध, दूसरी तरफ अपनी पसंद और धर्म को लेकर एक वयस्क युवक का फैसला…और फिर मामला पहुंच गया सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट. उत्तर प्रदेश के शामली के रहने वाले करीब 31 साल के आयुष मलिक ने कोर्ट के सामने कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया है. उन्होंने यह भी कहा कि उनके फैसले पर किसी तरह का दबाव, धमकी, लालच या जबरदस्ती नहीं थी. आयुष ने मुस्लिम महिला चांदनी कुरैशी से शादी करने की इच्छा भी जताई.

परिवार की ओर से इसके उल्टा आरोप लगाया गया कि आयुष को प्रभावित या ब्रेनवॉश किया गया है. इसी बीच उनके परिवार पर उन्हें घर में गैरकानूनी तरीके से रखने का आरोप लगा और मामला हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए हाईकोर्ट पहुंच गया. इस पर 16 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयुष के सामने दिए गए बयान और उनकी उम्र को देखते हुए साफ कहा कि एक बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, रहने की जगह और जीवनसाथी के बारे में कानून के मुताबिक फैसला लेने की स्वतंत्रता है. इसी के साथ कोर्ट ने पुलिस की फटकार भी लगाई है आइए जानते है पूरी कहानी…

कहानी की शुरुआत कहां से हुई?

शामली के रहने वाले आयुष मलिक करीब 31 साल के हैं और बैचलर ऑफ फार्मेसी यानी B.Pharm की पढ़ाई कर चुके हैं. मामला तब चर्चा में आया जब उनके धर्म परिवर्तन और मुस्लिम महिला से संबंध को लेकर परिवार और पुलिस के बीच विवाद खड़ा हो गया. कोर्ट में सामने आई जानकारी के मुताबिक आयुष ने अपना नाम बदलकर मोहम्मद अली भी रखा था. उनका कहना था कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया. लेकिन परिवार की तरफ से इस पूरे मामले को अलग नजरिए से देखा गया.

आयुष ने कब इस्लाम अपनाने की बात कही?

हाईकोर्ट में आयुष ने कहा कि उन्होंने 2014 में स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था. उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह फैसला किसी धमकी, दबाव, लालच, अनुचित प्रभाव या जबरदस्ती का नतीजा नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि धर्म अपनाने के बाद वह इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का पालन करते रहे हैं. कोर्ट ने उनके बयान को रिकॉर्ड करते हुए कहा कि फिलहाल ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया जिससे उनके स्वैच्छिक फैसले पर अविश्वास किया जा सके.

परिवार को बेटे का धर्म बदलना मंजूर नहीं था

मामले में एक अहम बात यह सामने आई कि आयुष का धर्म परिवर्तन उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को स्वीकार नहीं था. आयुष ने कोर्ट में कहा कि उनके परिवार को उनका यह फैसला मंजूर नहीं था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 4 जून से उन्हें अपने ही घर में धमकियों और गैरकानूनी तरीके से रोके जाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. यहीं से मामला महज धर्म परिवर्तन और शादी के विवाद से निकलकर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवाल तक पहुंच गया.

फिर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

आयुष की ओर से उनके दोस्त सुल्तान के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई. इस याचिका में आरोप लगाया गया कि आयुष को उनके पिता और परिवार ने गैरकानूनी तरीके से अपने कब्जे में रखा हुआ है. 9 सितंबर को जस्टिस संदीप जैन की अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आयुष को कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया. अदालत ने उस समय उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह भी कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आयुष ने अपनी इच्छा से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया और इसके बाद अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध चांदनी कुरैशी से विवाह किया.

धर्म परिवर्तन के बाद पत्नी और उसके परिवार पर FIR

इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी सामने आया. आयुष के धर्म परिवर्तन और चांदनी कुरैशी के साथ उनके रिश्ते को लेकर शामली पुलिस में शिकायत दर्ज हुई. इसके बाद चांदनी कुरैशी और उनके पिता के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत कार्रवाई की गई. रिपोर्ट के मुताबिक BNS की धाराएं भी मामले में जोड़ी गईं. आयुष की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया कि राज्य अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर उनके पिता उन्हें गैरकानूनी तरीके से रोके हुए हैं.

पिता का क्या आरोप है?

आयुष के पिता देव राज सिंह मलिक ने कोर्ट में अपने बेटे के बयान से अलग तस्वीर पेश की. पिता की ओर से कहा गया कि उनका बेटा अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन नहीं कर रहा था, बल्कि कुछ लोगों ने उसे प्रभावित या ब्रेनवॉश किया है. परिवार की ओर से यह दावा भी सामने आया कि मुस्लिम महिला और उसके परिवार ने आयुष पर प्रभाव डाला और संपत्ति पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की. हालांकि, कोर्ट के सामने आयुष ने खुद कहा कि उनका धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ है. एक वक्त ऐसा भी आया जब आयुष के हिंदू धर्म में लौटने की बात सामने आई

मामले की मीडिया रिपोर्टिंग में यह दावा भी सामने आया कि आयुष बाद में कथित तौर पर हिंदू धर्म में वापस लौट आए थे. हालांकि, 16 सितंबर को कोर्ट के सामने दिए गए बयान में आयुष ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था और वह इस धर्म की आवश्यक प्रथाओं का पालन करते हैं. यानी मामले में अलग-अलग समय पर आयुष की धार्मिक स्थिति को लेकर अलग दावे सामने आए, लेकिन हाईकोर्ट के सामने उनका तत्काल बयान उनके स्वैच्छिक रूप से इस्लाम अपनाने पर केंद्रित रहा. चांदनी कुरैशी से शादी को लेकर भी साफ किया अपना फैसला. मामले में सिर्फ धर्म परिवर्तन ही विवाद का केंद्र नहीं था.

आयुष ने हाईकोर्ट में कहा कि उन्होंने चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध बनाने का फैसला किया है और उनसे शादी करना चाहते हैं. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उन्होंने परिवार की इच्छा के खिलाफ चांदनी से विवाह कर लिया था, जबकि कोर्ट के समक्ष उनके बयान में शादी को लेकर विवाह करने की इच्छा और उसे कानून के मुताबिक आगे बढ़ाने की बात दर्ज हुई. यही वजह है कि कोर्ट ने आयुष के धर्म और जीवनसाथी के चुनाव. दोनों को उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा.

16 सितंबर को कोर्ट में पेश हुए आयुष

9 सितंबर के आदेश के बाद पुलिस ने 16 सितंबर को आयुष मलिक को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने पेश किया. कोर्ट के सामने आयुष ने दो बातें बेहद स्पष्ट तरीके से कहीं. उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया. वह चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना चाहते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके फैसले के पीछे किसी तरह की धमकी, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव या लालच नहीं था. कोर्ट ने कहा- आयुष बालिग हैं, अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकते हैं. अदालत ने आयुष की उम्र और उनके बयान को देखते हुए कहा कि वह बालिग हैं और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने में सक्षम हैं. कोर्ट के मुताबिक आयुष ने बिना किसी अस्पष्टता के इस्लाम को मानने और उसका पालन करने की इच्छा जताई है. उन्होंने चांदनी कुरैशी से शादी करने की मंशा भी जाहिर की है. अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे इन फैसलों की स्वेच्छा पर संदेह किया जा सके.

परिवार की चिंता समझ में आती है, लेकिन…

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एक पिता का अपने बेटे की सुरक्षा और भलाई को लेकर चिंतित होना पारिवारिक रिश्ते के संदर्भ में समझ में आता है. लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता को केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका फैसला परिवार को पसंद नहीं है. यानी माता-पिता की असहमति और एक बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता. दोनों के बीच संतुलन के सवाल पर कोर्ट ने आयुष की अपनी इच्छा को महत्व दिया.

धर्म चुनने की आजादी पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि बालिग व्यक्ति सामान्य तौर पर अपनी अंतरात्मा के अनुसार अपना धर्म तय करने का अधिकार रखता है. कोर्ट के अनुसार किसी व्यक्ति की धार्मिक पसंद उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़ी है. केवल इसलिए कि परिवार के सदस्य उस फैसले से सहमत नहीं हैं, उस व्यक्ति की पसंद को खत्म नहीं किया जा सकता. जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा. अदालत ने शादी या जीवनसाथी के चुनाव को भी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा. हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वयस्क का यह तय करना कि वह किससे शादी करना चाहता है या किस व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित करना चाहता है, उसके व्यक्तिगत अधिकार और स्वायत्तता का हिस्सा है. सिर्फ परिवार की असहमति किसी बालिग व्यक्ति की इस पसंद को रोकने का वैध आधार नहीं बन सकती.

घर में पुलिस की मौजूदगी पर भी कोर्ट की नजर

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि आयुष अपने घर में पुलिस की मौजूदगी में रह रहे थे. कोर्ट ने कहा कि जब एक बालिग व्यक्ति अदालत के सामने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा और पसंद बता चुका है, तो सामान्य तौर पर उस पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए, जब तक यह साबित न हो कि उसका फैसला कानून में मान्य किसी दबाव या अन्य अवैध परिस्थिति से प्रभावित है. कोर्ट ने आयुष को दी अपनी पसंद की जगह रहने की आजादी इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आयुष को अपनी पसंद की जगह पर रहने की स्वतंत्रता दे दी. उन्हें अपनी इच्छा के मुताबिक धर्म को मानने और उसका पालन करने की भी आजादी दी गई. साथ ही कोर्ट ने उन्हें कानून के मुताबिक अपने वैवाहिक संबंध को लेकर उचित फैसला लेने की स्वतंत्रता दी जिसके बाद ये मामला सोशल पर काफी गूंज रहा है.