uttar pradesh healthy kidney removed instead of damaged one pay rs 2 crore

चिकित्सा क्षेत्र (Medical Sector) में संवेदनशीलता और लापरवाही को लेकर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश के एक डॉक्टर ने इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही बरतते हुए महिला की खराब दाहिनी…

Medical Negligence Case : चिकित्सा क्षेत्र (Medical Sector) में संवेदनशीलता और लापरवाही को लेकर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश के एक डॉक्टर ने इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही बरतते हुए महिला की खराब दाहिनी किडनी की जगह उसकी बिल्कुल स्वस्थ बाईं किडनी निकाल दी थी। इस भयंकर चूक के कारण दो साल तक तड़पने के बाद महिला की मौत हो गई थी। अब घटना के 12 साल बाद उपभोक्ता आयोग ने इसे ‘मेडिकल डिजास्टर’ (चिकित्सीय आपदा) मानते हुए दोषी डॉक्टर पर 2 करोड़ रुपये का भारी-भरकम मुआवजा लगाया है।

पेट में थी तेज दर्द की शिकायत

यह पूरा मामला साल 2012 का है जब उत्तर प्रदेश की रहने वाली शांति देवी पेट में तेज दर्द की शिकायत लेकर डॉक्टर राजीव लोचन के पास पहुंची थीं। मेडिकल जांच और रिपोर्ट्स में यह साफ तौर पर प्रमाणित था कि महिला की दाहिनी किडनी (Right Kidney) खराब हो चुकी है और उसे ऑपरेशन करके निकालना जरूरी है जबकि उनकी बाईं किडनी (Left Kidney) पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ थी।

6 मई 2012 को महिला का ऑपरेशन किया गया और डॉक्टरों ने दावा किया कि उन्होंने खराब हो चुकी दाहिनी किडनी को शरीर से अलग कर दिया है। ऑपरेशन के कई हफ्तों बाद भी जब शांति देवी की तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ तो जून 2012 में परिवार ने दोबारा सीटी (CT) स्कैन और रेडियोलॉजिकल टेस्ट करवाए। इन रिपोर्ट्स ने सबको हैरान कर दिया।

रिपोर्ट से पता चला कि महिला की खराब दाहिनी किडनी शरीर के अंदर ही मौजूद थी जबकि डॉक्टरों ने उनकी बिल्कुल सही और कामकाजी बाईं किडनी को बाहर निकाल दिया था। आयोग के सामने सुनवाई के दौरान डॉक्टर ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने चीरा (कट) तो दाहिनी तरफ ही लगाया था लेकिन शरीर के अंदर से बाईं किडनी निकाल दी। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। आयोग ने इसे लापरवाही की पराकाष्ठा माना।

दो साल तक डायलिसिस का दर्द और फिर मौत

इस एक गलत ऑपरेशन ने शांति देवी की पूरी जिंदगी को नरक बना दिया। शरीर में एकमात्र बची किडनी भी खराब thi जिसके कारण महिला को लगातार दो साल तक दर्दनाक डायलिसिस (Dialysis) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। आखिरकार 20 फरवरी 2014 को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। आयोग ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर डॉक्टर ने सही किडनी न निकाली होती तो महिला आज जीवित होतीं।

सस्पेंड किया था लाइसेंस

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने भी अपनी आंतरिक जांच बिठाई थी। जांच में डॉक्टर को पूरी तरह दोषी पाया गया और उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन दो साल के लिए सस्पेंड (रद्द) कर दिया था। आयोग के सामने यह भी साबित हुआ कि खुद को बचाने के लिए डॉक्टर की तरफ से एक फर्जी ‘केस शीट’ (मरीज का रिकॉर्ड) तैयार कर पेश की गई थी।

2 करोड़ मुआवजा देने का आदेश 

NCDRC के अध्यक्ष जस्टिस एपी साही और सदस्य भारतकुमार पंड्या की पीठ ने दोषी डॉक्टर को पीड़ित परिवार को कुल 2 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया है जिसका विवरण इस प्रकार है:

मुख्य मुआवजा (मेडिकल नेग्लिजेंस): ₹1.5 करोड़ (डेढ़ करोड़ रुपये)

पारिवारिक नुकसान (स्नेह व वैवाहिक जीवन की हानि): परिवार के सदस्यों को ₹10-10 लाख।

कानूनी खर्च: ₹1 लाख रुपये।

देरी होने पर भारी ब्याज: वहीं आयोग ने सख्त हिदायत दी है कि यह राशि 3 महीने के भीतर पीड़ित परिवार को सौंपनी होगी। यदि भुगतान में देरी होती है तो महिला की मौत की तारीख (20 फरवरी 2014) से 6% सालाना ब्याज देना होगा जो भुगतान न करने की स्थिति में बढ़कर 9% तक जा सकता है।