किराए की दुकान खाली नहीं करना एक किराएदार को भारी पड़ गया. दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले में किराएदार को किराएदारी खत्म होने के बाद संपत्ति पर अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए करीब 24.29 लाख रुपए चुकाने का आदेश दिया. किराएदार का दावा था कि उसने मकान मालिकों को 10 लाख रुपए सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर नकद दिए थे और पैसे वापस मिलने तक वह दुकान खाली नहीं करेगा. लेकिन अदालत में वह इस भुगतान को साबित नहीं कर सका.

यह मामला बताता है कि किराए की संपत्ति से जुड़े विवाद में केवल अपना दावा करना काफी नहीं है. किराया एग्रीमेंट, भुगतान की रसीद और बैंक ट्रांजैक्शन जैसे दस्तावेज आपकी कानूनी स्थिति मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं. आइए समझते हैं कि पूरा मामला क्या है, हाईकोर्ट ने क्या कहा और किराएदारों व मकान मालिकों को इससे क्या सीख मिलती है.
क्या है पूरा मामला?
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के तिलक नगर में रहने वाले एक किराएदार ने साल 2014 में जनकपुरी के एक दंपती से करीब 238.38 वर्ग फुट की दुकान किराए पर ली थी. शुरुआती किराया 25,500 रुपए प्रति माह था. रेंट एग्रीमेंट 11 महीने की अवधि के लिए किए गए थे, लेकिन वे रजिस्टर्ड नहीं थे.
किराएदार के मुताबिक, नवंबर 2016 से मार्च 2017 के बीच उसने मकान मालिकों को 10 लाख रुपए कैश सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में दिए थे. उसका दावा था कि इस रकम के बदले मासिक किराया घटकर 2,900 रुपए रह गया था.
दूसरी ओर, मकान मालिकों ने इस दावे को खारिज कर दिया. उनका कहना था कि किराया पहले 25,500 रुपए था और साल 2018 में बढ़ाकर 29,000 रुपए प्रति माह कर दिया गया था.
विवाद तब बढ़ा जब 2018 में किए गए किराया समझौते की अवधि 31 जुलाई 2019 को समाप्त हो गई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मकान मालिकों ने किराएदार से दुकान खाली करने को कहा, लेकिन उसने कथित तौर पर 10 लाख रुपए वापस मिलने तक दुकान खाली करने से इनकार कर दिया. मामला अंततः अदालत तक पहुंच गया.
किराएदार का 10 लाख रुपए का दावा क्यों कमजोर पड़ा?
इस मामले में सबसे अहम सवाल था कि क्या किराएदार वास्तव में 10 लाख रुपए की सिक्योरिटी डिपॉजिट रकम देने और उसके बदले किराया घटाकर 2,900 रुपए किए जाने को साबित कर सकता था. अदालत में उसके दावे के सामने कई समस्याएं आईं:
- भुगतान का प्रमाण नहीं: किरायेदार 10 लाख रुपए कैश देने के दावे के समर्थन में कोई ठोस रसीद या पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं कर सका.
- रेंट एग्रीमेंट पेश नहीं किए: उसने अलगअलग वर्षों में रेंट एग्रीमेंट किए जाने की बात स्वीकार की, लेकिन संबंधित सभी दस्तावेज अदालत में पेश नहीं किए.
- किराए को लेकर विवाद: किराएदार ने 29,000 रुपए मासिक किराए के दावे पर आपत्ति जताई और कहा कि किराया 2,900 रुपए था. लेकिन इस वैकल्पिक व्यवस्था को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले.
- गवाही में विरोधाभास: किराएदार की मां ने भी गवाही के दौरान कथित रकम के एक हिस्से के भुगतान से इनकार किया, जिससे 10 लाख रुपए के दावे पर सवाल उठे.
इस तरह अदालत के सामने किराएदार के उस तर्क को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे, जिसके आधार पर वह दुकान खाली करने से इनकार कर रहा था.
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 सितंबर 2026 के आदेश में दुकान खाली करने और अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए मकान मालिकों को मुआवजा देने का निर्देश दिया. रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अनधिकृत कब्जे के लिए मासिक 25,500 रुपए की दर से मेस्ने प्रॉफिट्स यानी उपयोग और कब्जे के बदले मुआवजा निर्धारित किया. इसमें हर तीन साल के बाद 15 फीसदी की बढ़ोतरी भी लागू की गई. ईटी की रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि यदि दुकान सितंबर 2026 में खाली की जाती, तो कुल देय राशि लगभग 24.29 लाख रुपए हो सकती थी. ध्यान रहे, यह मीडिया रिपोर्ट में दिया गया अनुमान है, न कि ₹24.29 लाख की सटीक राशि का स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम हिसाब. यह राशि पूरी तरह से अलग भी हो सकती है.



