
झारखंड के अंतरराष्ट्रीय थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है. भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में चार गोल्ड मेडल जीतने वाले 29 वर्षीय अमरदीप आज रांची के अरगोड़ा चौक पर अपने पिता की सब्जी की दुकान पर धनिया और हरी मिर्च बेचकर परिवार का खर्च चलाने को मजबूर हैं. उनकी दुकान पर सजे पदक उनकी खेल उपलब्धियों और मौजूदा आर्थिक संघर्ष के बीच का अंतर साफ दिखाते हैं.
अमरदीप की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने के बावजूद उन्हें खेल कोटे के तहत अब तक सरकारी नौकरी या कोई निर्धारित राशि नहीं मिल सकी. विदेशों में प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए भी उन्हें कर्ज लेना पड़ा. उनकी आर्थिक स्थिति का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले का संज्ञान लेते हुए खेल विभाग को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
कौन हैं अमरदीप कुमार?
अमरदीप कुमार की उम्र 29 वर्ष बताई जाती है. उनका जन्म वर्ष 1996 या 1997 के आसपास हुआ और वह मूल रूप से रांची, झारखंड के रहने वाले हैं. खेल के मैदान पर उन्होंने भारत के लिए खेलते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई लेकिन खेल उपलब्धियों के बावजूद आर्थिक स्थिति ऐसी रही कि उन्हें अपने परिवार की आजीविका में हाथ बंटाने के लिए पिता की सब्जी की दुकान पर बैठना पड़ रहा है.
कब जीता था पहला गोल्ड मेडल?
अमरदीप ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतने का सिलसिला साल 2015 में शुरू किया था. उस समय मलेशिया में आयोजित एशियन जूनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और गोल्ड मेडल जीता, इसके बाद भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व जारी रखा और अलग-अलग मौकों पर भारत के लिए शानदार प्रदर्शन किया.
अमरदीप की पदक यात्रा केवल एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रही. उन्होंने नेपाल के काठमांडू में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में 2017 में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता था. इसके बाद 2019 में बेंगलुरु में आयोजित प्रतियोगिता में भी उन्होंने देश के लिए गोल्ड मेडल जीता. साल 2026 में रांची में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी उनके खाते में एक और गोल्ड मेडल आया था.
कितना लेना पड़ा था कर्ज?
अमरदीप की आर्थिक परेशानियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उन्हें कई बार अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम करना पड़ा. मलेशिया जाने के लिए भी उन्होंने करीब 65 हजार रुपये का कर्ज लिया था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए पदक जीतने के बावजूद आर्थिक मदद की कमी ने उनके लिए खेल जारी रखना मुश्किल बना दिया.



