सोशल मीडिया रील्स की स्पीड, रातोंरात अमीर बनने की चाहत और स्मार्टफोन का बस एक टैप — जेनरेशन Z ने भारत के F&O मार्केट में कदम तो बड़ी धमाकेदार एंट्री के साथ रखा है, लेकिन इसके नतीजे उतने ही डरावने हैं. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के हालिया आंकड़ों के अनुसार, जहां एक तरफ 30 साल से कम उम्र के युवाओं की भागीदारी डेरिवेटिव्स बाजार में रिकॉर्ड तेजी से बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ भारी वित्तीय नुकसान का साया इनकी मेहनत की कमाई को लील रहा है.

सोशल मीडिया ‘फिनफ्लुएंसर्स’ के भ्रामक दावों और शॉर्टकट थ्रिल के चक्कर में ट्रेडिंग डेस्क पर उतरी यह नई पीढ़ी बिना किसी ठोस रिस्क मैनेजमेंट के लगातार अपनी पूंजी गंवा रही है, जिसने अब बाजार नियामक की भी चिंता बढ़ा दी है. एक स्टडी के अनुसार, देश के इक्विटी डेरिवेटिव्स मार्केट में ट्रेडर्स की उम्र कम हुई है.
वित्त वर्ष 2026 में, 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स इंडीविजुअल पार्टिसिपेंट्स का 43 फीसदी थे, जो चार साल पहले 31 फीसदी था. हालांकि, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया की स्टडी से पता चला है कि कम उम्र वाले ग्रुप में नुकसान की दर भी ज्यादा देखने को मिली थी. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर सेबी किस रिपोर्ट ने सभी की नींद उड़ा दी है.
क्या कहती है रिपोर्ट?
वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के लगभग 89 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ, जबकि 60 साल से ज़्यादा उम्र के पार्टिसिपेंट्स में यह आंकड़ा 81 फीसदी था. उम्र के हिसाब से यह बदलाव रिटेल डेरिवेटिव्स मार्केट में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है, जिसने भारत के बड़े शहरों के बाहर और कम आय वाले ग्रुप्स के इन्वेस्टर्स को भी आकर्षित किया है. इंडीविजुअल्स डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स में से लगभग तीनचौथाई सालाना 5 लाख रुपए से कम आय वाले ग्रुप से थे. रेगुलेटर ने बताया कि इस ग्रुप का टर्नओवर में 43 फीसदी हिस्सा था, लेकिन कुल नुकसान में 53 फीसदी हिस्सा था.
हुआ मोटा नुकसा
इस इनकम ग्रुप में लगभग 88 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ, जबकि सालाना 1 करोड़ रुपए से ज्यादा आय वाले इन्वेस्टर्स में यह आंकड़ा 81 फीसदी था. डेरिवेटिव्स में भागीदारी का भौगोलिक विस्तार भी काफी उल्लेखनीय रहा है. वित्त वर्ष 2026 में छोटे शहरों के इन्वेस्टर्स व्यक्तिगत ट्रेडर्स का लगभग दोतिहाई और डेरिवेटिव्स टर्नओवर का लगभग आधा हिस्सा थे. स्टडी में पाया गया कि B30 इन्वेस्टर्स की हिस्सेदारी इंडिविजुअल म्यूचुअल फंड एसेट्स का सिर्फ एकचौथाई है, जो उनके आम इन्वेस्टमेंट बिहेवियर की तुलना में डेरिवेटिव्स में रिस्क लेने की ज्यादा इच्छा को दिखाता है. स्टडी में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग और इन्वेस्टर्स के अंडरलाइंग इक्विटी पोर्टफोलियो के साइज के बीच के संबंध की भी जांच की गई.
सामने आए डराने वाले आंकड़े
वित्त वर्ष 202526 में, लगभग 95 लाख, या 78 प्रतिशत, इंडिविजुअल डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स का इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपए से कम था. इस ग्रुप की हिस्सेदारी टर्नओवर में 51 प्रतिशत थी, लेकिन कुल नुकसान में 70 प्रतिशत थी. स्टडी में यह भी पाया गया कि जिन ट्रेडर्स का इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपए से कम था, लेकिन डेरिवेटिव्स टर्नओवर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा था, वे कुल ट्रेडर्स का सिर्फ 13 प्रतिशत थे, जबकि कुल नुकसान में उनकी हिस्सेदारी 52 प्रतिशत थी.
वित्त वर्ष 202526 के दौरान लगभग 43 लाख ट्रेडर्स, या इंडिविजुअल डेरिवेटिव्स पार्टिसिपेंट्स का 35 फीसदी, वित्त वर्ष 2026 के आखिर में बिना किसी अंडरलाइंग इक्विटी पोर्टफोलियो के थे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इससे पता चलता है कि बिना किसी कैशइक्विटी होल्डिंग के डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की गई.
स्टडी में यह भी पाया गया कि कुल इंडिविजुअल ट्रेडर बेस 18 प्रतिशत कम हो गया, जो वित्त वर्ष 2025 में 1.06 करोड़ से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 87.5 लाख हो गया. सेबी के एनालिसिस में यह देखा गया कि उम्र, इनकम, लोकेशन, ट्रेडिंग एक्टिविटी और पोर्टफोलियो साइज के साथ ट्रेडिंग के नतीजे कैसे बदलते हैं, साथ ही यह भी चेतावनी दी गई कि इन संबंधों को कारणप्रभाव के सबूत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.



