
उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर एक बार फिर सियासी पारा चढ़ गया है. ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ के नारों के साथ सहारनपुर और राजधानी लखनऊ में ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं, जिन्होंने सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को निशाने पर ले लिया है. इन पोस्टरों में अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र किया है. एक तरफ जहां पश्चिमी यूपी में राजनीतिक सरगर्मियां पहले से ही तेज हैं, वहीं इन पोस्टरों के अचानक सामने आने से राज्य में एक नया राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है.
लखनऊ और सहारनपुर में लगे विवादित पोस्टर
राजधानी लखनऊ के गोमती नगर इलाके में स्थित विपुल खंड 4 के सीएमएस (CMS) चौराहे पर एक बेहद विवादित पोस्टर देखा गया. इस पोस्टर में कथित तौर पर अखिलेश यादव को एक लड़की का डांस देखते हुए दिखाया गया है, और साथ ही मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए लिखा है, “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे – 7 दिसंबर, मुज़फ़्फ़रनगर.” इसी तरह मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी के मौके पर सहारनपुर में भी अखिलेश यादव की फोटो और दंगों की 2013 की तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए हैं.
मस्जिद विवाद के बीच गरमाई सियासत
यह पोस्टर विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद एक पुरानी मस्जिद को गिराए जाने का मुद्दा पहले से ही चर्चा का विषय बना हुआ है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मस्जिद गिराए जाने को लेकर लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. इसी बीच, मस्जिद विध्वंस के ठीक दो दिन बाद 7 सितंबर को मुजफ्फरनगर दंगों की तस्वीरों वाले इन पोस्टरों के लगने से सियासी माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है और बहस तेज हो गई है.
पुलिस की कार्रवाई और जांच शुरू
जगह-जगह लगे इन पोस्टरों की भनक लगते ही पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आ गया. पुलिस ने आनन-फानन में इन विवादित पोस्टरों को वहां से हटा दिया है. हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इन्हें किस व्यक्ति या संगठन ने लगाया. पुलिस फिलहाल इस पूरे मामले की जांच कर रही है और यह पता लगाने में जुटी है कि इन पोस्टरों को लगाने के पीछे किसका हाथ है और इसका असली मकसद क्या था. फिलहाल, पुलिस की तरफ से आरोपियों की पहचान और आगे की कार्रवाई को लेकर आधिकारिक जानकारी का इंतजार किया जा रहा है.
मुजफ्फरनगर दंगों का दर्द और राजनीतिक संदेश
गौरतलब है कि 7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के इलाकों में भयंकर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस हिंसा और इसके बाद पड़ोसी जिलों में हुई घटनाओं में 60 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, जबकि 40,000 से अधिक लोगों को अपना घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था. इस घटना ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बहुत गहरा असर डाला था.



