Himachal Se: महाराणा प्रताप सिर्फ शौर्यपराक्रम ही नहीं समरसता के भी प्रतीक हैं. मध्यकाल में राजाप्रजा के बीच भेद न करने वाले शासक का होना काल्पनिक लग सकता है, लेकिन महाराणा ने इसे सच कर दिखाया. उन्होंने बाल्यकाल से ही भीलों वनवासियों के साथ खेलनाबैठना और भोजन करना शुरू किया और इस परम्परा को जीवन पर्यन्त निभाया. सैनिकों के साथ जमीन पर बैठ खानेसोने के स्वभाव ने सेना बीच उन्हें इतना प्यारविश्वास दिया कि अभावों की फिक्र किए बिना अंतिम सांस तक उनके सैनिक मातृभूमि की रक्षा के लिए जूझते रहे.

महाराणा प्रताप ने कैसे गिन-गिनकर मुगलों से अपने हिस्से वापस लिए? हल्दी घाटी का जवाब दिवेर की जंग से दिया​
महाराणा प्रताप ने कैसे गिन-गिनकर मुगलों से अपने हिस्से वापस लिए? हल्दी घाटी का जवाब दिवेर की जंग से दिया​

हल्दीघाटी युद्ध जिसमें वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा था, के प्रसंग के जिक्र के साथ पश्चिमी सोच के इतिहासकारों ने इतिश्री कर दी. लेकिन उसके आगे का सच दिवेर का युद्ध था, जिसमें महाराणा ने वापसी की और मुगलों से अपने राज्य का अधिकांश हिस्सा वापस जीत लिया. जयंती के अवसर पर पढ़िए उनसे जुड़े कुछ प्रसंग.

बाल्यकाल से ही सुखसुविधाओं से वंचित

बाल्यकाल में ही महाराणा प्रताप भेदभाव के शिकार हुए. पिता उदय सिंह दूसरी रानी धीर बाई पर मेहरबान थे. जगमाल और सगर उनके पुत्र थे. जगमाल को वे मेवाड़ के सिंहासन पर देखना चाहती थीं. इस योजना में महाराणा प्रताप को पिता से दूर रखना जरूरी था. धीर बाई इसमें सफल रहीं. अपने जन्मस्थान कुंभलगढ़ से माता जयवंता बाई साथ प्रताप जब उदयपुर पहुंचे तो उन्हें वहां रहने नहीं दिया गया. उदय सिंह के आदेश पर जयवंता बाई और प्रताप को चित्तौड़गढ़ दुर्ग के नीचे कुंवरपदा में निवास के लिए रवाना किया गया. सुरक्षा के लिए साथ में सिर्फ दस सैनिक थे. राजकुमारों को जो सुखसुविधाएं एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता था, प्रताप उससे पूरी तौर पर वंचित थे.

महाराणा प्रताप सैनिकों के साथ जमीन पर बैठ सामूहिक तौर पर भोजन करते थे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं।

अभावों बीच संघर्ष ने दी शक्ति

बचपन के ये अभाव आगे भी प्रताप के जीवन का हिस्सा बने. लेकिन अभावों बीच ही संघर्ष कर शक्ति अर्जित करने के अभ्यास ने आगे उनकी बहुत सहायता भी की. चित्तौड़ दुर्ग से उनके लिए भोजन आता था. प्रताप ने ‘भोजन पेटी’ की परम्परा प्रारंभ की.

वे सुरक्षा में लगे सैनिकों के साथ जमीन पर बैठ सामूहिक तौर पर भोजन करते थे. प्रताप के इस अंदाज ने सैनिकों के हृदय में उनके लिए अपार प्रेमविश्वास का भाव उत्पन्न किया. जनता के बीच भी इसका बहुत अच्छा संदेश गया. लोगों में उनके प्रति उत्सुकता और आदर बढ़ा. प्रताप ने सैनिकों के साथ सहभोज की परम्परा को जीवन पर्यन्त निभाया. उनके इस गुण ने सैनिकों में खूब उत्साह उत्पन्न किया.

भीलों का साथ जीवन पर्यन्त बना रहा

पिता महाराणा उदय सिंह ने बेशक उन्हें उदयपुर से दूर कर दिया था. लेकिन चित्तौड़ के वनों में भीलोंआदिवासियों के बीच विचरण करते बालक प्रताप जिस जीवन शैली में दीक्षित हो रहे थे, उसने उन्हें साहसशौर्य के साथ एक ऐसे बड़े वर्ग का विश्वास और सहयोग प्रदान किया, जो आगे के मुश्किल वक्त में उनके लिए हर कदम पर प्राण न्योछावर करने में भी पीछे नहीं हटा. ये भील जो राजसी भोजन, आदतों से पूरी तौर पर अपरिचित थे, के साथ खेलतेघूमते प्रताप ने उनकी बोलीबानी सीखी. उनका भोजन किया. उन्हें गले लगाया और साथ किया.

भील समाज की माताओं को इस राजकुमार से इतना अपनत्व और आदर मिला कि वे उन्हें ” कीका “ पुकारने लगीं. रोचक है कि प्रताप के मेवाड़ की गद्दी पर बैठने के बाद भी भील उन्हें “राणा कीका” ही कहते रहे और महाराणा इसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करते रहे. असलियत में प्रताप ने राजा प्रजा के भेद को समाप्त कर अपने राज्य की जनता का अपार विश्वास प्राप्त किया था.

महाराणा प्रताप के पिता के कुल 25 पुत्रों में से महाराणा सबसे बड़े थे. फोटो: Getty Images

सत्ता के लिए स्वाभिमान से समझौता नहीं

प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह का 1572 में निधन हुआ. उनके कुल 25 पुत्रों में प्रताप सबसे बड़े थे. लेकिन उदय सिंह ने धीर बाई से उत्पन्न जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया था. प्रताप पिता के निर्णय के समक्ष नतमस्तक थे. लेकिन दरबार के सरदार मेवाड़ की रक्षा के लिए गद्दी पर प्रताप का आसीन होना जरूरी मानते थे. थोड़े विवाद बाद प्रताप का राज्यारोहण हुआ. आंतरिक चुनौतियों से वे निपट लिए. लेकिन अकबर की दृष्टि बाकी बचे मेवाड़ पर थी.

अनेक राजपूत राजाओं की तरह प्रताप भी अकबर से समझौता करके शांति के साथ राज पाट चला सकते थे. लेकिन विदेशी आक्रांता के सामने उन्हें झुकना स्वीकार नहीं था. सत्ता के लिए स्वाभिमान खोने को वे तैयार नहीं थे. असलियत में प्रश्न निजी सत्ता का नहीं था. यह विदेशी आक्रांता से मातृभूमि, उसकी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का संघर्ष था. संघर्ष सिर्फ राजनीतिक नहीं था. वह सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक प्रतिरोध भी था.

हल्दीघाटी युद्ध ने रणनीति बदलने की दी सीख

18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मुगल और महाराणा प्रताप की सेनाओं का मुकाबला हुआ. संख्या और शस्त्रों के लिहाज से मुगल सेना भारी थी. प्रताप की सेना सीमित थी. हथियार भी शत्रु के मुकाबले कम थे. लेकिन इन कमियों के बीच भी प्रताप और उनकी सेना शौर्यसाहस के मामले में शत्रु के मुकाबले बीस थी. संकरे दर्रे के युद्ध में प्रताप ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिए.

18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मुगल और महाराणा प्रताप की सेनाओं का मुकाबला हुआ. फोटो: Getty Images

इस युद्ध में उनके घोड़े चेतक की भूमिका किंवदंती बन गई. भील योद्धाओं ने शत्रु सेना को हतप्रभ कर दिया. लेकिन निर्णायक विजय के लिए सेना और साधनों की कमी महाराणा को एक सीमा पर रुकने को मजबूर कर रही थी. वे सिर्फ साहसी नहीं थे. चतुर रणनीतिकार भी थे. इसलिए उन्होंने अगले मोर्चे के लिए पीछे हटने का फैसला किया. इतिहासकारों की राय में हल्दीघाटी का युद्ध न तो मुगलों की निर्णायक विजय का था और न ही राणा की पूर्ण पराजय का.

इस युद्ध ने महाराणा को रणनीति में बदलाव की जरूरत की सीख दी. मुगलों की बड़ी सैन्य ताकत के मुकाबले के लिए उनके पास सेना और संसाधन सीमित थे. इसलिए आमनेसामने के संघर्ष की जगह गुरिल्ला और सीमित युद्ध बेहतर रास्ता था. जीत के लिए मुगल सेना की राशन सप्लाई चेन को बाधित कर उसे पस्त करना जरूरी था. अबुल फ़ज़ल ने अकबरनामा में लिखा कि राणा प्रताप युद्धभूमि से जीवित निकल गए और मुगल उन्हें पकड़ने में असफल रहे.

जंगलों में भटकते युद्ध में वापसी की तैयारी

अपने जीवन में महाराणा ने शायद ही कुछ चैन के दिन गुजारे हों. लेकिन हल्दीघाटी युद्ध के बाद तो खासतौर पर समय बेहद मुश्किल रहा. गोगुंदा, कुंभलगढ़, अरावली के जंगलों और दक्षिणी मेवाड़ की पहाड़ियों में वे जान बचाने के लिए नहीं बल्कि पलटवार के लिए सेना और शक्ति संचित करने के लिए भटकते रहे. यह ऐसा समय था जब परिवार के लिए भोजन नहीं था. सिर छिपाने का ठिकाना नहीं था.

घास की रोटी का प्रसंग इसी समय का था. ऐतिहासिक तथ्य भले शब्दशः इसकी पुष्टि न करते हों लेकिन इतिहासकारों में इस बात पर सहमति है कि प्रताप और उनका परिवार बेहद अभाव में रहा. पर इस संघर्ष में महाराणा अकेले नहीं थे. विपन्नता से गुजर रहे महाराणा के चरणों में भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने अपनी पूरी दौलत समर्पित कर दी . यह मामूली रकम नहीं थी. यह मेवाड़ के पुनरुत्थान का आधार बनी. यह राशि इतनी बड़ी थी कि उसने महाराणा प्रताप को बड़ी सेना संगठित करने और उसे हथियारों से सुसज्जित करने में निर्णायक सहायता प्रदान की. माना जाता है कि इस रकम से अगले बारह वर्षों का सैन्य खर्च जुट सकता था.

फिर जीत का सिलसिला

सेना संगठित होने के साथ महाराणा एक बार फिर अकबर से मुकाबले के लिए तैयार थे. 1577 में प्रताप ने मुगल थानों को जीतना शुरू किया. अकबर ने उदयपुर पर कब्जे के बाद वहां का नाम मुहम्मदाबाद कर दिया था. प्रताप ने इसे फिर से कब्जे में किया. पुराना नाम उदयपुर बहाल किया. मुगल सिक्के गलवा दिए. गोगूंदा भी वापस लिया. अब प्रताप की मोही पर थी. सितंबर 1577 में मेवाड़ और भाटियों की संयुक्त सेना ने इलाके के खेतों को नष्ट करना शुरू किया. यहां मुजाहिद बेग की अगुवाई में तीन हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ मुगलों की पैदल सेना भी मौजूद थी. भयंकर युद्ध में मुजाहिद के साथ सैकड़ों मुगल सैनिक मारे गए.

मोही पर प्रताप का कब्जा हो गया. 158081 के आस पास अकबर बंगाल, बिहार और उत्तरपश्चिमी सीमांत में विद्रोहों से जूझ रहा था. अकबर की प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं. इस परिस्थिति का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने अपने विश्वस्त सरदारोंभामाशाह, हकीम खान सूर, चूंडावत सरदारों और भील सहयोगियों के साथ दिवेर अभियान की रणनीति बनाई. प्रताप ने पहले खोए अपने 36 किलों में से अधिकांश फिर जीत लिए. चावंड को राजधानी बनाया. प्रशासन को पुनर्गठित किया. राज्य के कृषि और व्यापार पर भी ध्यान दिया.

हल्दीघाटी का हिसाब दिवेर में किया चुकता

अरावली पर्वतमाला की घाटियों में स्थित दिवेर मेवाड़ को मारवाड़ और गुजरात से जोड़ने वाला मार्ग था. दिवेर पर कब्जे का मतलब मेवाड़ की जीवनरेखा पर नियंत्रण था. प्रताप सेना सहित आगे बढ़े. इसकी तारीख पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं. कुछ ने दिवेर अभियान का समय 1582 माना है. जबकि ओमेंद्र रत्नू ने हमले की तारीख 1583 की विजयादशमी बताई है.

यहां प्रताप की सेना ने मुगलों पर तीन तरफ से धावा बोला. घातक हमले में मुगल सेनापति सेरिमा खान , उज़्बेक बहलोल खान सहित तमाम सैनिक मारे गए. इस युद्ध में कोई युद्धबंदी नहीं था. प्रताप की सेना ने उस दिन शत्रु सेना पर जबरदस्त कहर ढाया था.दोपहर तक दिवेर थाने पर केसरिया झंडा फहर चुका था. उस रात मेवाड़ को घेरने वाले सभी बत्तीस मुगल थानों पर प्रताप की जीत हो चुकी थी. उन्होंने कुंभलगढ़ फिर से हासिल कर लिया था.

कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार जैसे यूनानियों ने मैराथन में विदेशी आक्रमणकारियों को निर्णायक रूप से रोका, वैसे ही प्रताप ने दिवेर में मुग़ल थानों की रीढ़ तोड़ दी. इस अभियान के बाद मेवाड़ का अधिकांश पर्वतीय भाग पुनः महाराणा के अधिकार में आ गए. दिवेर की जीत ने प्रताप की सेना के साथ ही उनके राज्य की जनता के खोए आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को वापस किया. हल्दीघाटी की पराजय की निराशा समाप्त हुई. मुगलों को एक बार फिर संदेश गया कि मेवाड़ झुकने को तैयार नहीं हैं