झारखंड हाई कोर्ट ने तलाकशुदा महिला की एकमुश्त एलिमनी 40 लाख से बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दी. कोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस का मकसद पत्नी को आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देना है. कोर्ट ने पति की 2.24 लाख रुपये मासिक आय और पत्नी की बेरोजगारी को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया.

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Jharkhand High Court Increases Alimony To Rs 70 Lakh In Divorce Case : झारखंड हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में तलाकशुदा महिला को मिलने वाली एकमुश्त गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) की राशि 40 लाख रुपये से बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दी. कोर्ट ने साफ कहा कि मेंटेनेंस का मकसद सिर्फ जीवित रखना नहीं, बल्कि पत्नी को ‘सम्मानजनक और आर्थिक रूप से सुरक्षित जीवन’ देना है.

यह मामला एक आईटी इंजीनियर दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 2019 में हुई थी. फैमिली कोर्ट ने 2024 में दोनों का तलाक मंजूर करते हुए पति को पत्नी को 40 लाख रुपये देने का आदेश दिया था, लेकिन दोनों पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे. पति का कहना था कि रकम बहुत ज्यादा है, जबकि पत्नी ने कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति और पति की आय को देखते हुए यह रकम कम है.

हाई कोर्ट ने क्यों बढ़ाई एलिमनी?

  • हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद, ने कहा कि पत्नी की कोई स्थायी आय नहीं है. उसे आने वाले कई दशकों तक इसी रकम के सहारे जीवन बिताना होगा.
  •  कोर्ट ने माना कि पति की नियमित कमाई है, जबकि पत्नी पूरी तरह एलिमनी पर निर्भर है. इसलिए ऐसी राशि तय होनी चाहिए जिससे वह भविष्य में महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों के बीच सम्मानजनक जीवन जी सके.
  • कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इस आधार पर गुजारा भत्ता कम नहीं किया जा सकता कि महिला के माता-पिता उसका सहारा बन सकते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसा करना कानून के मूल उद्देश्य को कमजोर करेगा.
  • सुनवाई में बताया गया कि पति पुणे में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम करता है. उसकी मासिक आय करीब 2.24 लाख रुपये है. वहीं, पत्नी की कोई नौकरी या आय का स्रोत नहीं है और वह अपने परिवार पर निर्भर है.
  •  कोर्ट ने कहा कि जब पत्नी बेरोजगार हो, तब पति की आय, जीवनशैली, बैंक रिकॉर्ड, टैक्स रिटर्न और सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर गुजारा भत्ता तय किया जाना चाहिए.

कैसे शुरू हुआ विवाद?

रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी नवंबर 2019 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. शादी के बाद दोनों पुणे में रहने लगे. पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उस पर बेवजह अवैध संबंधों के आरोप लगाती थी और मानसिक प्रताड़ना देती थी. उसने यह भी कहा कि पत्नी और सास ने दहेज और यौन उत्पीड़न के झूठे केस में फंसाने की धमकी दी. दूसरी तरफ पत्नी ने दावा किया कि पति के कई महिलाओं से संबंध थे. इससे वह मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का शिकार हुई. पत्नी ने यहां तक आरोप लगाया कि उसे मारने की कोशिश भी की गई.

कोर्ट ने क्या कहा?

  • हाई कोर्ट ने कहा कि ‘परमानेंट एलिमनी’ का मकसद पति या पत्नी, जिसकी आय नहीं है, को आर्थिक कठिनाई से बचाना है. इसके लिए कोई तय गणितीय फॉर्मूला नहीं हो सकता, लेकिन दोनों की सामाजिक स्थिति, जरूरतें और आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है.
  • कोर्ट ने पत्नी की उम्र करीब 32 साल मानते हुए कहा कि उसे आने वाले लगभग 38 वर्षों तक इसी राशि के सहारे जीवन चलाना होगा. इसी आधार पर 70 लाख रुपये की राशि को ‘न्यायसंगत और उचित’ माना गया.
  • कोर्ट ने आदेश दिया कि पति 12 महीने के भीतर चार किस्तों में यह रकम अदा करे और पहली किस्त दो महीने के अंदर जमा कराए.

भारत में एलिमनी कैसे तय होती है?

भारत में तलाक के बाद पति या पत्नी में से आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को गुजारा भत्ता दिया जाता है. इसे ‘मेंटेनेंस’ या ‘परमानेंट एलिमनी’ कहा जाता है. कोर्ट एलिमनी तय करते समय कई बातों पर विचार करती है, जिसमें पति-पत्नी की कमाई, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य और उम्र , बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी शामिल है.

अगर पत्नी नौकरी नहीं करती या उसकी आय बहुत कम है, तो आमतौर पर पति की आय के आधार पर गुजारा भत्ता तय होता है. हालांकि अदालतें हर केस के तथ्यों के आधार पर अलग-अलग फैसला देती हैं.