इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाल विवाह को लेक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ समेत देश का कोई भी पर्सनल लॉ, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं कर सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्सनल लॉ, बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता.

कोर्ट ने कहा कि भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र सभी नागरिकों के लिए समान है और किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर बाल विवाह को वैध नहीं ठहराया जा सकता. जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने यह टिप्पणी बुलंदशहर में दर्ज एक FIR को रद्द करने की मांग वाली 19 लोगों की रिट याचिका खारिज करते हुए की.
‘कम उम्र की लड़की का विवाह PCMA का उल्लंघन’
यह FIR पुलिस और चाइल्ड लाइन की रेस्क्यू टीम के साथ मारपीट तथा सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोपों से जुड़ी है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 18 साल से कम उम्र की लड़की का विवाह कराना PCMA का उल्लंघन है और ऐसे विवाह के बाद स्थापित होने वाले शारीरिक संबंध POCSO Act के तहत अपराध की श्रेणी में आएंगे. इसलिए किसी भी पर्सनल लॉ का सहारा लेकर इन कानूनों से बचा नहीं जा सकता.
‘किसी भी समुदाय को छूट नहीं मिल सकती’
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि PCMA और POCSO जैसे कानून जनहित, वैज्ञानिक समझ और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं, इसलिए इनसे किसी भी समुदाय या व्यक्ति को छूट नहीं मिल सकती. साथ ही कोर्ट ने पुलिस और चाइल्ड लाइन की कार्रवाई की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने संभावित अपराध को रोकने के लिए अपना वैधानिक दायित्व निभाया.
FIR को रद्द करने से कोर्ट का इनकार
FIR में प्रथम दृष्टया सरकारी कार्य में बाधा सहित गंभीर अपराधों के पर्याप्त आधार पाए जाने के कारण हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी. यह फैसला जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई के दौरान दिया. बेंच ने 19 आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिन पर बुलंदशहर में एक 16 साल की नाबालिग मुस्लिम लड़की का निकाह रुकवाने गई पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम पर हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप है.
रिपोर्ट मनीष/ इलाहाबाद



