कनक लता बरुआ भारत की आजादी की लड़ाई की बहादुर बेटी थीं. वे असम की रहने वाली थीं. उन्होंने बहुत कम उम्र में देश के लिए अपना जीवन दे दिया. आज की भाषा में उन्हें जेनजी सिपाही कहा जा सकता है. वे युवा थीं. उनके मन में सपने थे. लेकिन देश की गुलामी उन्हें स्वीकार नहीं थी. उन्होंने डर के सामने सिर नहीं झुकाया. हाथ में तिरंगा लिया. और अंग्रेजी शासन को चुनौती दी. उनकी कहानी साहस, देशभक्ति और त्याग की कहानी है. यह कहानी हर युवा को प्रेरणा देती है.

कनक लता बरुआ का जन्म असम के बारंगाबाड़ी गांव में 22 दिसंबर 1926 को हुआ था. यह क्षेत्र उस समय दर्रांग जिले में आता था. उनके पिता का नाम कृष्णकांत बरुआ था. परिवार साधारण था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. कनक लता का बचपन आसान नहीं था. उन्होंने छोटी उम्र में ही दुख देखे. मां का साया भी जल्द ही उनके सिर से उठ गया. घर की जिम्मेदारियां बढ़ गईं. पढ़ाई जारी रखना कठिन हो गया. फिर भी उनके मन में सीखने की इच्छा थी. वे तेज, समझदार और निडर थीं. उन्हें अपने देश से बहुत प्रेम था.
कनकलता ने हाथ में तिरंगा लेकर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी.
बचपन से ही मन में थी देशभक्ति
कनक लता ने बचपन में अंग्रेजों का अत्याचार देखा. उन्होंने लोगों को भय में जीते देखा. भारत के लोग अपने ही देश में आजाद नहीं थे. अंग्रेज सरकार लोगों पर कठोर नियम लगाती थी. कई देशभक्तों को जेल भेज दिया जाता था. कई लोगों पर लाठियां चलाई जाती थीं. इन घटनाओं का असर कनक लता पर पड़ा. उनके मन में सवाल उठने लगे. भारत गुलाम क्यों है?
लोग खुलकर बोल क्यों नहीं सकते? धीरेधीरे उनका मन आजादी की लड़ाई से जुड़ गया. वे कांग्रेस के विचारों से प्रभावित हुईं. महात्मा गांधी के संदेशों ने भी उन्हें प्रेरित किया. वे जानती थीं कि आजादी आसान नहीं मिलेगी.इसके लिए हिम्मत चाहिए. त्याग चाहिए.
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव
साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ. गांधी ने मुम्बई से अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की. उन्होंने नारा दिया. करो या मरो. यह नारा पूरे देश में फैल गया. युवाओं के मन में नई आग जल उठी. असम के गांवों और कस्बों में भी आंदोलन तेज हो गया. कनक लता बरुआ भी इस आंदोलन से जुड़ गईं. वे केवल भाषण सुनने वाली युवती नहीं थीं. वे मैदान में उतरना चाहती थीं. उन्होंने युवाओं के एक संगठन में काम करना शुरू किया. संगठन मृत्यु बहिनी के नाम से जाना जाता था. इसमें ऐसे युवा थे जो देश के लिए बड़े बलिदान को तैयार थे. कनक लता इनमें सबसे कम उम्र की सदस्यों में थीं. लेकिन उनका साहस बहुत बड़ा था. उनकी उम्र भले छोटी थी. लेकिन इरादे बेहद मजबूत थे.
भारत छोड़ो आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन से अंग्रेज सरकार घबरा गई थी.
सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराने का फैसला
सितंबर 1942 में असम में आंदोलन तेज था. देशभक्तों ने फैसला किया कि सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराया जाएगा. इसका उद्देश्य साफ था. लोगों को दिखाना था कि भारत अंग्रेजों की संपत्ति नहीं है. भारत भारतीयों का है. कनक लता ने गोहपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निश्चय किया. यह काम बहुत जोखिम भरा था. थाने पर अंग्रेजी शासन का नियंत्रण था. वहां पुलिस तैनात थी. साथियों ने जुलूस निकालने की योजना बनाई. कई युवा उसमें शामिल हुए. महिलाएं भी आगे आईं.सबके हाथों में तिरंगे थे. कनक लता को जुलूस का नेतृत्व सौंपा गया. यह उनके साहस पर लोगों के भरोसे का प्रमाण था.
पुलिस थाने पर तिरंगा फहराने को चले वीर
20 सितंबर 1942 का दिन इतिहास में अमर हो गया. उस दिन कनक लता अपने साथियों के साथ गोहपुर थाने की ओर चलीं. उनके हाथ में तिरंगा था. जुलूस में देशभक्ति के नारे गूंज रहे थे. लोग वंदे मातरम बोल रहे थे. भारत माता की जय के नारे बोल रहे थे. जुलूस थाने के पास पहुंचा. पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका. अंग्रेजी सरकार के अधिकारियों ने चेतावनी दी.
कहा गया कि जुलूस वापस चला जाए अन्यथा गोली चलाई जाएगी. लेकिन कनक लता नहीं डरीं. उन्होंने अपने साथियों का हौसला बढ़ाया. उन्होंने कहा कि तिरंगा जरूर फहराया जाएगा. उनके लिए तिरंगा केवल कपड़ा नहीं था. वह देश की शान था. स्वतंत्रता का सपना था.
भारतीय तिरंगा.
सनसनाती गोली आयी और फिर वे गिर पड़ीं
कनक लता तिरंगा लेकर आगे बढ़ीं. पुलिस की चेतावनी भी उन्हें रोक नहीं सकी. पुलिस ने फायरिंग की. गोली सीधे आकर कनक लता बरुआ के शरीर में समा गयी. वे वहीं गिर पड़ीं. उस समय उनकी उम्र केवल 17 वर्ष थी.
उन्होंने बहुत छोटी उम्र में देश के लिए प्राण दे दिए. उनके साथ चल रहे मुकुंद काकती भी शहीद हुए. कनक लता के गिरने के बाद भी जुलूस का साहस नहीं टूटा. दूसरे साथी ने तिरंगा संभाल लिया. लोगों का संघर्ष जारी रहा.यह दृश्य बताता है कि एक सच्चा विचार कभी नहीं मरता. देशप्रेम की भावना जीवित रहती है.
कनक लता के जीवन का संदेश
कनक लता बरुआ का जीवन हमें कई बड़ी बातें सिखाता है.
- साहस: खतरा जानते हुए भी कदम बढ़ाया.
- जिम्मेदारी: उन्होंने सोचा कि देश की आजादी में युवाओं की भी भूमिका है. उन्होंने यह जिम्मेदारी दूसरों पर नहीं छोड़ी.
- निस्वार्थ देशप्रेम: उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा. देश के सम्मान को सबसे ऊपर रखा.
- महिला शक्ति: कनक लता ने साबित किया कि बेटियां किसी से कम नहीं हैं. वे नेतृत्व कर सकती हैं. संघर्ष कर सकती हैं. इतिहास बदल सकती हैं.
क्या कर सकते हैं आज के युवा?
आज भारत आजाद है. लेकिन आजादी की रक्षा करना भी जरूरी है. आज अलग चुनौतियां हैं. हमें शिक्षा के लिए मेहनत करनी होगी. समाज में भेदभाव के खिलाफ खड़ा होना होगा. हिंसा, नफरत और झूठ से बचना होगा. कानून और संविधान का सम्मान भी बेहद जरूरी है. कनक लता की तरह हमें भी निडर बनना होगा. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना होगा.



