सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐसे शख्स के खिलाफ दहेज हत्या केस रद्द क दिया, जिसकी पत्नी ने कनाडा के टोरंटो में आत्महत्या कर ली थी. कोर्ट ने कहा कि पत्नी को बेवकूफ या बेकार कहना, किसी भी तरह से क्रूरता या आपराधिक धमकी के अपराध की श्रेणी में नहीं आता. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ने यह भी कहा कि जीवनसाथी के स्वभाव से जुड़ी समस्याओं को आपराधिक धमकी के अपराध के बराबर नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 08 जनवरी 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और एक पति के खिलाफ दर्ज FIR नंबर 212/2023 को भी खारिज कर दिया. उस पति पर दहेज के लिए हत्या और क्रूरता का आरोप लगाया गया था, क्योंकि टोरंटो में उसकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी. कोर्ट को दहेज की मांग या मौत से जुड़ी क्रूरता का कोई ठोस सबूत नहीं मिला. कोर्ट ने माना कि इस मामले को आगे चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.

‘आरोपों और महिला की मौत के बीच कोई संबंध नहीं’

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि अपील करने वाले और उसके परिवार पर लगाए गए आरोपों और महिला की मौत के बीच कोई संबंध साबित नहीं हुआ है. बेंच ने कहा, ‘IPC की धारा 304B के तहत मामला दर्ज करने के लिए, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि महिला की मौत से ठीक पहले, उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार ने दहेज की मांग को लेकर या उससे जुड़ी किसी बात पर महिला के साथ क्रूरता की थी या उसे परेशान किया था’.

‘अभियोजन पक्ष ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा’

बेंच ने आगे कहा, ‘इस मामले में अभियोजन पक्ष कोर्ट के सामने ऐसा कोई ठोस सबूत या सामग्री पेश करने में विफल रहा है, जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता ने दहेज की अवैध मांग की थी और इस मांग का महिला द्वारा की गई आत्महत्या से कोई सीधा संबंध था। दहेज की मांग के आरोप को साबित करने के लिए कोई सबूत न होने के कारण, धारा 304B के तहत अपराध नहीं बनता है’.

‘आरोपों की सावधानी और बारीकी से जांच होनी चाहिए’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी शिकायतों से निपटते समय कोर्ट को बहुत सावधान और सतर्क रहना चाहिए. वैवाहिक मामलों की सुनवाई करते समय, कोर्ट को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखना चाहिए. बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में लगाए गए आरोपों की बहुत सावधानी और बारीकी से जांच होनी चाहिए, ताकि न्याय में कोई चूक न हो और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न किया जा सके.

क्या है पूरा मामला

दरअसल एक शख्स ने 3 जनवरी 2021 को एक महिला से शादी की थी. बाद में फरवरी 2022 में वो दोनों टोरंटो चले गए. 11 जून 2023 को महिला ने उस अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी, जहां वो अपने पति के साथ रह रही थी. उसी अपार्टमेंट से हाथ से लिखा एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें महिला ने लिखा था कि उसे लगता है कि वो जिंदगी में फेल हो गई है, क्योंकि वो एक साल से भी ज्यादा समय से कोई नौकरी नहीं ढूंढ पाई थी.

महिला के पिता ने दर्ज कराई शिकायत

इसके बाद महिला के पिता ने 30 जून 2023 को औरंगाबाद के सतारा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसमें IPC की धारा 304B , 323 , 498A और 504 के साथसाथ धारा 34, और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 लगाई गईं.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृतका के पिता ने जो आरोप लगाए हैं, जिनमें दहेज की मांग के अलावा पति और उसके परिवार द्वारा महिला के साथ मानसिक और शारीरिक क्रूरता करने की बात कही गई है उनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं. कोर्ट ने कहा कि FIR को देखने से पता चलता है कि गंभीर चोट पहुंचाने और आपराधिक धमकी देने के आरोप बहुत अस्पष्ट और सामान्य किस्म के हैं.

कोर्ट ने कहा, ‘यह आरोप कि अपीलकर्ता मृतक पत्नी को बेवकूफ और बेकार कहता था, अगर इसे पहली नज़र में सच मान भी लिया जाए, तो भी इसे किसी भी तरह से क्रूरता या आपराधिक धमकी का अपराध नहीं माना जा सकता. ज़्यादा से ज़्यादा, यह पति के स्वभाव को दर्शाता है, लेकिन इसे इतना गंभीर आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता कि यह पत्नी की आत्महत्या का कारण बन जाए’. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आरोप भी टिकने लायक नहीं है कि पति का स्वभाव चिड़चिड़ा था और वो छोटीछोटी बातों पर पत्नी को डांटता था, क्योंकि रिकॉर्ड पर इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है.

‘चिड़चिड़े स्वभाव की तुलना आपराधिक धमकी से नहीं की जा सकती’

कोर्ट ने कहा ‘किसी जीवनसाथी के चिड़चिड़े स्वभाव की तुलना आपराधिक धमकी या गंभीर चोट पहुंचाने जैसे अपराधों से नहीं की जा सकती. इसलिए, पत्नी की आत्महत्या के लिए पति को आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ऐसा करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, खासकर तब जब इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत ही न हो’

बेंच ने कहा, ‘हम मृतक के परिवार वालों के दुख और दर्द को समझते हैं, जिन्होंने अपनी बेटी को खोने का बड़ा सदमा झेला है. लेकिन, पति और ससुराल वालों को तब तक इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उनकी तरफ से ऐसा कोई काम या चूक साबित न हो जाए, जिसने मृतक को इस हद तक मजबूर कर दिया हो कि आत्महत्या ही उनके पास एकमात्र रास्ता बचा हो’. कोर्ट ने आगे कहा कि केवल यह कह देना कि आरोपी ने मौखिक या शारीरिक क्रूरता की है, यह मानने के लिए काफी नहीं है कि ऐसे कार्यों या चूक के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है.

बेंच ने कहा, ‘क्रूरता और उत्पीड़न के मामलों में, आमतौर पर कुछ विशिष्ट गलत कार्य होने चाहिए। शिकायतकर्ता को इन कार्यों के बारे में विस्तार से बताना होगा ताकि आरोपियों को आपराधिक कार्यवाही में फंसाया जा सके’. कोर्ट ने कहा ‘किसी व्यक्ति के खिलाफ बिना किसी ठोस जानकारी के, केवल सामान्य तौर पर उत्पीड़न का आरोप लगाना आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए काफी नहीं है. यह बात तब भी लागू होती है जब अभियोजन पक्ष आत्महत्या और कथित उत्पीड़न, क्रूरता या आपराधिक धमकी के बीच कोई तार्किक संबंध स्थापित करने की कोशिश करता है’.