Diwali Ajab Gajab Parampara : उत्तर प्रदेश के सोनभद्र के दक्षिणांचल के 47 से अधिक गांवों में आदिवासी समाज देवउठनी एकादशी पर दीपपर्व मनाता है। इस दिन गोरया बाबा, देवगन गुरु और बड़ादेव की पूजा के साथ पशुपक्षियों और प्रकृति के प्रति आभार जताने की परंपरा है।

47 से ज्यादा गांवों में आज भी निभाई जा रही परंपरा
झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा से लगे सोनभद्र के दक्षिणांचल में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। दुद्धी तहसील के खोतोमहुआ, बभनी, घघरी, सैगोड़ा, खैरा, घघरा, करकच्छी, सालेनाग, कुसुम्हा, गोविंदपुर, मनबसा, खैराही, गंभीरपुर, रासपहरी, बलियरी, कुंडाडीह, सुपाचुआ, खेतारी, जामपानी, नवाटोला, परनी, काचन, करहिया, भलही, बभनडीहा, किरविल, आरंगपानी, बरवाटोला, चांगा, लिलासी, नौडिहा, कुदरी, फरीपान, खैरटिया, मधुबन, बरहपान, करछा, सांगोबांध, सांवाकुड़, कुड़पान, अहिरगुड़वा, मनरूटोला, नधिरा, बखरिहवां, पिपरहर, पिसवा और झापर समेत आसपास के कई गांवों में यह पर्व मनाया जाता है।
सोहराई पर्व से भी जुड़ी है दीपोत्सव की परंपरा
आदिवासी समाज में पहले देवउठनी एकादशी के दिन ही दीपपर्व मनाने का चलन था। समय के साथ कार्तिक अमावस्या यानी दिवाली मनाने की परंपरा भी जुड़ गई। इसे सोहराई पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। यह त्योहार नई फसल और घर में नए अनाज के आगमन की खुशी से जुड़ा हुआ है।
आज भी कुछ परिवार कार्तिक अमावस्या पर दिवाली मनाते हैं, जबकि कई परिवार देवउठनी एकादशी को ही अपना दीपपर्व मनाते हैं। जो लोग किसी वजह से दिवाली के दिन उत्सव नहीं मना पाते, वे एकादशी पर दीप जलाकर अपनी पुरानी परंपरा निभाते हैं।
घर का मुखिया रखता है पूरे दिन उपवास
देवउठनी एकादशी के दिन परिवार का मुखिया सुबह से शाम तक व्रत रखता है। शाम को शकरकंद खाने के बाद पूजा की तैयारियां शुरू होती हैं। इस दौरान देवताओं के लिए चावल के आटे से रोट और गुड़ की खीर बनाई जाती है। इसके बाद घर के आंगन और पेनठाना में पूजा की जाती है। पेनठाना वह पारंपरिक देवस्थल है, जहां बड़ादेव, बूढ़ा देव और गोत्रदेव समेत परिवार और समुदाय के आराध्यों की पूजा होती है।
पूजा संपन्न होने के बाद घर और देवस्थल पर दीप जलाए जाते हैं। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कई परिवार अपने घर के दरवाजों के साथ आसपास के रास्तों को भी तेल के दीयों से रोशन करते हैं। इस तरह पूरा इलाका दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है।
सफेद और लाल कपड़े पहनकर करते हैं पूजा
आदिवासी समाज में पूजा की अलगअलग पद्धतियों के अनुसार कपड़ों और पूजन सामग्री का भी खास महत्व है। सात्विक पूजा करने वाले परिवार सफेद कपड़े पहनते हैं और नारियल अर्पित करते हैं। वहीं, तामसिक पूजा की परंपरा में लाल वस्त्र पहने जाते हैं। इस पद्धति में लाल या काले मुर्गे की बलि देने की परंपरा भी बताई जाती है।
इस दिन परिवार अपने पालतू पशुओं को भी विशेष महत्व देते हैं। गाय, बैल और बकरियों को नहलाकर उन्हें खास भोजन कराया जाता है। राजगोंड समुदाय के लोग अपने अस्त्रशस्त्रों की पूजा भी करते हैं। देवताओं को घी चढ़ाने के बाद बचा हुआ घी गाय, भैंस और बकरियों के सींगों पर लगाने की परंपरा है।
महुआ के फूल चढ़ाकर प्रकृति के प्रति जताते हैं आभार
इस पर्व में महुआ के फूल, जिन्हें स्थानीय भाषा में कोया कहा जाता है, देवताओं को अर्पित करने की भी खास परंपरा है। आदिवासी समाज प्रकृति को जीवन का आधार मानता है। जंगल, पेड़पौधों, फलफूल, अनाज और औषधियों से मिलने वाले लाभ के साथ पशुपक्षियों के योगदान को भी याद किया जाता है।
यही वजह है कि सोनभद्र के आदिवासी परिवारों के लिए यह पर्व सिर्फ दीप जलाने और पूजा करने तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति, पशुपक्षियों और अपने आराध्यों के प्रति आभार जताने का भी अवसर है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है।



