मुगल बादशाह अकबर के दरबार का जिक्र हो तो “नवरत्न” शब्द जेहन में आता है. ये नौ लोग सिर्फ दरबार की शोभा नहीं थे. इनमें कोई सेनापति था, कोई वित्त संभालता था, कोई इतिहास लिखता था और कोई राग गाता था. एक बात पहले समझ लें. इतिहासकार बताते हैं कि अकबर के दौर के दस्तावेजों में “नवरत्नों” की कोई आधिकारिक सूची नहीं मिलती.

यह परंपरा बाद में लोकप्रिय हुई, इसलिए अलगअलग सूचियों में एकदो नाम बदल जाते हैं. जानिए, कौन थे नवरत्न और किसके पास कौन सी जिम्मेदारी थी.

अबुल फजल: दरबारी इतिहासकार

सबसे पहले अबुल फजल. वे अकबर के सबसे भरोसेमंद सलाहकार और दरबारी इतिहासकार थे. “अकबरनामा” और “आइनएअकबरी” उन्हीं की रचनाएं हैं, जिनसे अकबर के शासन, प्रशासन और साम्राज्य की व्यवस्था की जानकारी मिलती है. वे अकबर की सुलहएकुल यानी सबके साथ शांति की नीति के बड़े समर्थक थे. 1602 में दक्कन से लौटते समय उनकी हत्या हो गई, जिसके पीछे शहजादे सलीम की भूमिका मानी जाती है.

फैजी: राजकवि का दर्जा

अबुल फैज़ फैजी अकबर के दरबार के राजकवि थे. वे फारसी के बड़े कवि, विद्वान और अनुवादक थे. परिवार और शुरुआती जीवन जन्म आगरा में हुआ. पिता शेख मुबारक नागौरी अपने समय के जानेमाने विद्वान थे. छोटे भाई अबुल फज़ल थे, जिन्होंने अकबरनामा और आइनएअकबरी लिखी. अबुल फज़ल अकबर के नवरत्नों में गिने जाते हैं. फैजी ने बचपन से ही अरबी, फारसी, दर्शन, चिकित्सा और धर्मशास्त्र की गहरी पढ़ाई की. दरबार में प्रवेश लगभग 1567 में वे अकबर के दरबार में आए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 1588 में अकबर ने उन्हें राजकवि का पद दिया. वे अकबर के बेटे शहजादा मुराद के शिक्षक भी रहे. अकबर ने उन्हें कई कूटनीतिक मिशनों पर भी भेजा, जैसे दक्कन के राज्यों में.

राजा टोडरमल.

राजा टोडरमल: वित्त और राजस्व की जिम्मेदारी

वित्त और राजस्व का सबसे बड़ा जिम्मा राजा टोडरमल के पास था. उन्होंने जमीन की पैमाइश और पिछले करीब दस सालों की उपज व कीमतों के आधार पर लगान तय करने की व्यवस्था बनाई, जिसे “दहसाला” प्रणाली कहा जाता है. इससे किसानों से कर वसूली ज्यादा नियमित और पारदर्शी हो सकी. वे इससे पहले शेरशाह सूरी के प्रशासन में भी काम कर चुके थे. 1589 में उनका निधन हुआ.

राजा मानसिंह.

राजा मानसिंह: सेना का मोर्चा

सेना का मोर्चा आमेर के राजा मान सिंह के पास था. 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना की कमान उन्हीं के हाथ में थी. वे काबुल, बिहार और बंगाल जैसे इलाकों में सूबेदार भी रहे और मुगल मनसबदारों में शीर्ष स्तर पर गिने गए. वह आमेर के कछवाहा राजपूत शासक थे और अकबर के सबसे भरोसेमंद सेनापतियों में गिने जाते थे. मानसिंह की बुआ अकबर की पत्नी थीं और जहांगीर की मां बनीं. पिता की मृत्यु के बाद 1589 में वे आमेर की गद्दी पर बैठे. मुगल सेवा में पद अकबर ने उन्हें सात हज़ारी मनसबदार का सर्वोच्च पद दिया, जो उस समय बहुत कम लोगों को मिला था. वे काबुल, बिहार, बंगाल और उड़ीसा के सूबेदार रहे.

अब्दुर्रहीम खानएखाना: सेनपति, कूटनीतिज्ञ और विद्वान

अब्दुर्रहीम खानएखाना बैरम खां के बेटे थे. वे एक साथ सेनापति, कूटनीतिज्ञ, विद्वान और हिंदी के भक्तिकालीन कवि थे. गुजरात और दक्कन के अभियानों में उन्होंने सेना का नेतृत्व किया और “खानएखाना” की उपाधि पाई. साथ ही वे कवि भी थे, जिनके दोहे आज भी स्कूली किताबों में पढ़ाए जाते हैं. उन्होंने बाबरनामा का फारसी में अनुवाद भी किया. मुगल सेवा में पद अकबर ने उन्हें मिर्जा खां की उपाधि दी. गुजरात विजय के बाद 1584 के आसपास उन्हें खानएखाना का खिताब मिला.

बीरबल: कवि और हाजिरजवाब दरबारी

बीरबल का असली नाम महेश दास था. वे अकबर के करीबी सलाहकार, कवि और हाजिरजवाब दरबारी थे, और अकबर ने उन्हें “राजा” की उपाधि दी. उनके चुटकुले और किस्से मशहूर हैं, पर इनमें कई कहानियां बाद की लोककथाएं हैं. 1586 में यूसुफजई कबीलों के खिलाफ अभियान में उनकी मौत हुई, जो मुगल सेना के लिए बड़ा झटका था.

तानसेन.

तानसेन: संगीत की जिम्मेदारी

संगीत की जिम्मेदारी तानसेन के पास थी. ग्वालियर के तानसेन ध्रुपद के सबसे बड़े गायकों में गिने जाते हैं और माना जाता है कि वे रीवा के दरबार से अकबर के यहां आए. “मियां की तोड़ी” और “मियां की मल्हार” जैसे राग उनके नाम से जुड़े हैं. अकबर के दरबार में संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, शाही प्रतिष्ठा का भी हिस्सा था.

मुल्ला दोप्याजा: बादशाह का चतुह सलाहकार

मुल्ला दोप्याजा को नवरत्नों में गिना जाता है, लेकिन उनके ऐतिहासिक अस्तित्व को लेकर इतिहासकारों में संदेह रहा है. उनका ज्यादातर हिस्सा किस्सेकहानियों पर आधारित है. ऐतिहासिक प्रमाणों की स्थिति अबुल फज़ल की आइनएअकबरी और अकबरनामा में मुल्ला दोप्याजा का नाम नहीं मिलता. बदायूंनी जैसे समकालीन इतिहासकारों के दस्तावेजों में भी उनका कोई ठोस ज़िक्र नहीं है. लोककथाओं में उन्हें अरब या फारस मूल का बताया जाता है, जो भारत आकर मुगल दरबार से जुड़े. कुछ कथाओं में उनका संबंध अकबर के पिता हुमायूं से भी जोड़ा जाता है. कुछ जगह उनका असली नाम अबुल हसन या अब्दुल हसन बताया जाता है, पर इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है. वे हाजिरजवाब, चतुर और हंसोड़ दरबारी के रूप में दिखाए जाते हैं.

फकीर अजियाओदीन: धार्मिक मामलों के जानकार

फकीर अजियाओदीन को भी नवरत्नों की लोकप्रिय सूचियों में गिना जाता है, लेकिन मुल्ला दोप्याजा की तरह उनके बारे में भी भरोसेमंद ऐतिहासिक जानकारी बहुत कम है. आइनएअकबरी, अकबरनामा और बदायूंनी की मुन्तख़बउततवारीख़ जैसे समकालीन स्रोतों में इस नाम से किसी दरबारी का स्पष्ट ज़िक्र नहीं मिलता. “फकीर” शब्द बताता है कि उन्हें सूफ़ी या संतप्रवृत्ति का व्यक्ति माना गया है. परंपरा में उन्हें धार्मिक मामलों के जानकार या सलाहकार के रूप में रखा जाता है.