
नई दिल्ली: रुपये की कीमत में गिरावट की वजह से मिडिल क्लास भारतीय परिवारों के लिए बच्चों को विदेश में पढ़ाना अब काफी महंगा हो गया है। कई छात्रों ने पहले ही लोन ले रखा है और अब बढ़ती फीस, विदेशी मुद्रा शुल्क और रुपये की गिरावट की वजह से उनका कुल खर्च शुरुआती अनुमान से काफी ज्यादा हो सकता है। वहीं, रुपये में गिरावट का असर विदेश घूमने पर भी पड़ा है।
कितना बढ़ा खर्च?
विदेश में पढ़ाई के प्लेटफॉर्म Leap के को-फाउंडर अर्णव कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जो कोर्सेस ज्यादा पॉपुलर हैं, उनका कुल खर्च पिछले एक साल में करीब 3.5 से 4 लाख रुपये तक बढ़ गया है। इससे परिवारों का बजट बिगड़ रहा है और उन पर बोझ बढ़ता जा रहा है।
पढ़ाई कितनी महंगी?
आंकड़ों के मुताबिक, इस साल डॉलर के मुकाबले रुपया 4.9%, यूरो के मुकाबले 2.5% और पाउंड के मुकाबले 3.3% तक गिर चुका है।
वित्त वर्ष 2024-25 में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 5% से 6% कमजोर हुआ है।
अगर इसमें विदेशी कॉलेजों की बढ़ती फीस को भी जोड़ दिया जाए तो रुपये के हिसाब से पढ़ाई का खर्च हर साल 7% से 11% तक बढ़ रहा है।
लोन में दिक्कत?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारतीय बैंकों से लिया जाने वाला एजुकेशन लोन उस वक्त की करेंसी रेट (रुपये की कीमत) के हिसाब से तय होता है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि विदेशी बैंकों से लोन लेने का विकल्प भी होता है, लेकिन ज्यादातर लोग भारत से ही लोन लेना पसंद करते हैं। वजह ये है कि विदेश में लोन लेने के लिए वहां के किसी लोकल गारंटर या प्रॉपर्टी (कोलैटरल) की जरूरत पड़ती है।
क्या है रणनीति?
IDP एजुकेशन के रीजनल डायरेक्टर पीयूष कुमार का कहना है कि भारतीय छात्र अब अपनी रणनीति बदल रहे हैं। वे या तो अपने प्लान को एक-दो साल के लिए आगे बढ़ा रहे हैं या फिर लोन और स्कॉलरशिप जैसे रास्तों को तलाश रहे हैं।
क्या हो रहा है असर?
NMIMS स्कूल ऑफ कॉमर्स के प्रोफेसर पंकज कपूर ने बताया कि छात्र किस देश और किस कोर्स को चुन रहे हैं, उसके आधार पर उन्हें साल 2023 के मुकाबले अब हर साल 5 से 10 लाख रुपये ज्यादा देने पड़ सकते हैं।
फॉरेन टूर पर असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक रुपये के कमजोर होने की वजह से अचानक बनाई गई ट्रिप प्लान अब 10-15% तक महंगी हो सकती है।
जिन्होंने पहले से बुकिंग कर ली है, उन्हें भी अब वहां जाकर होने वाले अन्य खर्चों पर लगाम लगानी पड़ रही है।
इस वजह से लोग अब या तो अपनी ट्रिप छोटी कर रहे है या फिर पास के देशों में घूमने जा रहे है।
क्या आया है बदलाव?
कंसल्टेंट मीनल दमानी के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस साल विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी आई है। कई छात्र अब अमेरिका के बजाय यूरोप को ज्यादा पसंद कर रहे है। Leverage Edu के सीईओ अक्षय चतुर्वेदी ने कहा कि छात्रों के लिए अब बड़ी यूनिवर्सिटी के बैंड नाम से ज्यादा जरूरी यह हो गया है कि वे जितना पैसा लगा रहे हैं, उसके बदले उन्हें भविष्य में कितना फायदा मिलेगा।






