Himachal Se: पहले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प फिर पीछेपीछे रूस के राष्ट्रपति पुतिन भी चीन पहुंचे. पड़ोसी देश होने के नाते चीन की हर गतिविधि पर भारत की नजर होती है. ऐसा होना भी चाहिए. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से दुनिया के ताकतवर राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात अहम होती है. BRICS का अगला सम्मेलन 1213 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रस्तावित है. इसमें शी जिनपिंग एवं पुतिन के शामिल होने की संभावना ज्यादा है. दुनिया भर में चल रहे तनाव के बीच अब भारत, रूस, चीन और अमेरिका चर्चा में हैं.

आइए, इसी बहाने समझने का प्रयास करते हैं कि भारत के लिए सबसे ज्यादा जरूरी कौन है? चीन, रूस या अमेरिका.भारत के लिए यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. क्या चीन ज्यादा जरूरी है? क्या अमेरिका सबसे अहम है? या रूस अब भी भारत का सबसे भरोसेमंद साथी है? इस प्रश्न का सीधा उत्तर देना एकदम आसान नहीं है. क्योंकि तीनों देशों का महत्व अलगअलग क्षेत्रों में है. किसी एक देश को पूरी तरह सबसे जरूरी कहना उचित नहीं होगा.
फिर भी, अगर आज के समय की बड़ी तस्वीर देखें, तो कहा जा सकता है कि भारत के लिए अमेरिका का महत्व सबसे तेजी से बढ़ा है, रूस अब भी सुरक्षा और सामरिक संतुलन में बहुत जरूरी है, और चीन भारत के लिए सबसे बड़ी भौगोलिक और रणनीतिक चुनौती होने के कारण अनदेखा नहीं किया जा सकता. इसलिए कहा जा सकता है कि भारत के लिए सबसे जरूरी कोई एक देश नहीं, बल्कि संतुलित विदेश नीति है. भारत को तीनों के साथ अपने हित के अनुसार संबंध रखने होंगे.
भारत की विदेश नीति का आधार
भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है रणनीतिक स्वायत्तता. इसका मतलब है कि भारत किसी एक गुट का स्थायी हिस्सा नहीं बनना चाहता. भारत अपने फैसले अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर लेना चाहता है. पहले शीत युद्ध के दौर में भी भारत ने यही रास्ता अपनाया था. आज भी दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है. ऐसे समय में भारत के लिए लचीली नीति जरूरी है. भारत को दोस्ती भी रखनी है, प्रतिस्पर्धा भी संभालनी है, और अपनी स्वतंत्रता भी बचानी है.
शी जिनपिंग
चीन: पड़ोसी, कॉम्पिटीटर और आर्थिक शक्ति
चीन भारत का पड़ोसी है, इसलिए उसका महत्व बहुत बड़ा है. पड़ोसी देश को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. भारत और चीन के बीच लंबी सीमा है. कुछ सीमा विवाद भी है. गलवान जैसी घटनाओं ने यह दिखाया कि चीन सिर्फ व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि सुरक्षा चुनौती भी है. इस कारण भारत की सेना, कूटनीति और आर्थिक नीति पर चीन का सीधा असर पड़ता है. चीन दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत है.
वैश्विक सप्लाई चेन में उसका दबदबा है. भारत के बाजार में भी लंबे समय तक चीनी सामान की बड़ी मौजूदगी रही है. अभी भी है. मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कई कच्चे माल में चीन की भूमिका मौजूद है. लेकिन चीन का महत्व सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है. वह एशिया में प्रभाव बढ़ाना चाहता है. हिंद महासागर, दक्षिण एशिया और भारत के पड़ोस में उसकी सक्रियता बढ़ी है. पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते भारत के लिए चिंता का विषय हैं. इसलिए भारत के लिए चीन जरूरी भी है और चुनौती भी. भारत को चीन से संवाद भी रखना है और सतर्क भी रहना है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन.
रूस: भरोसा, रक्षा और ऊर्जा
रूस का भारत के साथ संबंध बहुत पुराना है. सोवियत संघ के समय से ही दोनों देशों में गहरा विश्वास रहा है. जब कई पश्चिमी देश भारत से दूरी रखते थे, तब रूस ने कई मामलों में भारत का साथ दिया. रूस की सबसे बड़ी भूमिका रक्षा क्षेत्र में रही है. भारत की सेना के कई प्रमुख प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं.लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, मिसाइल प्रणालियां और कई रक्षा उपकरण लंबे समय तक रूस से जुड़े रहे हैं.
इस कारण रूस भारत की सुरक्षा संरचना में अभी भी महत्वपूर्ण है. ऊर्जा के क्षेत्र में भी रूस उपयोगी है. तेल और गैस के मामले में रूस भारत के लिए एक अहम स्रोत बना है. वैश्विक संकट के समय सस्ती ऊर्जा की उपलब्धता भारत के लिए आर्थिक राहत दे सकती है. रूस का एक और महत्व है. वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक संतुलनकारी शक्ति है. भारत के लिए यह उपयोगी है कि वह पश्चिम और रूस दोनों के साथ संबंध बनाए रखे. इससे भारत के विकल्प खुले रहते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि, रूस की सीमाएं भी हैं.
उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका और चीन की तुलना में कमजोर है. तकनीकी सहयोग का दायरा भी सीमित है. फिर भी, रूस को भारत आसानी से छोड़ नहीं सकता. क्योंकि रक्षा और रणनीतिक भरोसे में उसकी भूमिका अब भी गहरी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
अमेरिका: तकनीक, निवेश और वहां की भारतीय आबादी
आज के दौर में भारतअमेरिका संबंध बहुत तेजी से मजबूत हुए हैं. इसकी कई वजहें हैं. पहली वजह है अर्थव्यवस्था. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. भारत के लिए व्यापार, निवेश, सेवा क्षेत्र और निर्यात के लिहाज से अमेरिका बहुत महत्वपूर्ण है. आईटी क्षेत्र में भारत की बड़ी ताकत का एक बड़ा बाजार अमेरिका है. दूसरी वजह है तकनीक. आज की दुनिया में शक्ति सिर्फ सेना से तय नहीं होती. तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और रक्षा नवाचार भी उतने ही जरूरी हैं.
इन क्षेत्रों में अमेरिका अग्रणी है. भारत के विकास और आधुनिकीकरण के लिए यह साझेदारी बहुत उपयोगी है. तीसरी वजह है शिक्षा और मानव संबंध. बहुत बड़ी भारतीय आबादी अमेरिका में काम करती है. भारतीय मूल के पेशेवर, वैज्ञानिक, डॉक्टर और उद्यमी वहां मजबूत स्थिति में हैं. यह संबंध सिर्फ सरकारों का नहीं, समाजों का भी है. चौथी वजह है रणनीतिक सहयोग. हिंदप्रशांत क्षेत्र में भारत और अमेरिका के हित कई जगह मिलते हैं. दोनों देश चाहते हैं कि समुद्री रास्ते खुले रहें. दोनों एक संतुलित एशिया चाहते हैं. क्वाड जैसे मंच भी इसी सोच को मजबूत करते हैं. यही कारण है कि आज भारत के लिए अमेरिका का महत्व बहुत तेजी से बढ़ा है. अगर आने वाले समय की अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रभाव को देखें, तो अमेरिका भारत के लिए सबसे व्यापक साझेदार के रूप में उभरता है.
PM नरेंद्र मोदी
भारत के लिए तीनों महत्वपूर्ण
अगर सिर्फ भूगोल देखें, तो चीन सबसे महत्वपूर्ण है. क्योंकि वह पड़ोसी है और सीमा पर सीधा असर डालता है. अगर सिर्फ भविष्य की अर्थव्यवस्था और तकनीक देखें, तो अमेरिका सबसे महत्वपूर्ण है. भारत की विकास यात्रा में उसकी भूमिका ज्यादा व्यापक दिखती है. अगर सिर्फ रक्षा भरोसा और परंपरागत रणनीतिक सहयोग देखें, तो रूस अब भी बहुत अहम है. यानी तीनों का महत्व अलग है. इसीलिए भारत किसी एक पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता.
भारत के लिए क्या है सही रास्ता?
भारत को तीन काम साथसाथ करने होंगे. अमेरिका के साथ तकनीक, निवेश और वैश्विक सहयोग बढ़ाना होगा. रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध संतुलित रूप से बनाए रखने होंगे. चीन के साथ सीमा पर सख्ती और संवाद दोनों रखने होंगे. इसके साथ भारत को अपनी घरेलू शक्ति भी बढ़ानी होगी. मजबूत अर्थव्यवस्था, आधुनिक सेना, तकनीकी आत्मनिर्भरता और स्थिर कूटनीति ही भारत की असली ताकत हैं.
इस तरह सरल शब्दों में कहें तो चीन, अमेरिका और रूस, तीनों भारत के लिए जरूरी हैं. यह और बात है कि तीनों की भूमिका अलग है. भारत के सामने असली चुनौती यह नहीं है कि किसे चुना जाए. असली चुनौती यह है कि किसके साथ कितना और कैसे चला जाए. आज की दुनिया में वही देश सफल होगा जो संतुलन रखेगा. भारत के लिए भी यही सही रास्ता है. उसे अपने हित में, अपने आत्मविश्वास के साथ, तीनों से संबंध रखने चाहिए. भारत के लिए सबसे जरूरी देश वही है, जो किसी खास मुद्दे पर भारत के हित को सबसे बेहतर ढंग से आगे बढ़ाए.



