
क्या आप भी ‘साइनाइड मल्लिका’ (Cyanide Mallika) को भारत की पहली महिला सीरियल किलर मानते हैं? अगर आपका जवाब हाँ है, तो आप पूरी तरह गलत हैं! कर्नाटक की उस खूंखार महिला कातिल से भी कई साल पहले, 19वीं सदी के कलकत्ता में एक ऐसी शातिर और खतरनाक महिला का आतंक था, जिसके खौफ से पूरा शहर कांप उठता था. उस खूंखार औरत का नाम त्रैलोक्य (Troilokya) था, जिसे ब्रिटिश अदालतों के दस्तावेजों में ‘त्रैलोक्य द प्रोस्टीट्यूट’ के रूप में दर्ज किया गया है. कलकत्ता के काकुरगाची और चित्पुर इलाकों से जुड़े इस सनसनीखेज इतिहास को ‘दरोगा दफ्तर’ (Darogar Daptar) में बेहद बारीकी से दर्ज किया गया है, जो भारत के सबसे शुरुआती दर्ज सीरियल किलिंग मामलों में से एक है. लंदन के मशहूर ‘जैक द रिपर’ (Jack the Ripper) के आतंक से भी सात साल पहले त्रैलोक्य ने अपनी काली करतूतों से बंगाल को दहला दिया था.
एक साधारण गांव की लड़की से शुरू हुआ उसका सफर वेश्यावृत्ति, शातिर ठगी और फिर खून-खराबे के खौफनाक रास्ते पर जा निकला. कलकत्ता की गलियों में उसने अपने गुनाहों का ऐसा जाल बुना था कि अच्छे-अच्छे अमीरजादे उसके झांसे में फंसकर बर्बाद हो गए.
वेश्या से शातिर ठग, फ्रॉड-क्वीन बनने का सफर
त्रैलोक्य की जिंदगी बहुत कम उम्र में ही पटरी से उतर गई थी. बाल विवाह के बाद वह विधवा हो गई और फिर एक वैरागिन महिला के जरिए कलकत्ता के सोनागाछी के बदनाम रेड-लाइट इलाके में पहुंच गई. शुरुआत में जवानी और खूबसूरती के दम पर उसकी कमाई खूब हुई, जिससे उसने कोठी और घोड़े-गाड़ी तक खरीद लिए. लेकिन जैसे-जैसे उसकी उम्र ढलने लगी, उसकी कमाई घटने लगी और भविष्य की चिंता ने उसे अपराधी बना दिया.
पैसा कमाने के लिए उसने और उसके प्रेमी काली बाबू ने ऐसे नायाब और शातिर फ्रॉड प्लान बनाए कि लोग दंग रह गए. वे अमीर घर के बिगड़ैल लड़कों को अपनी जाल में फंसाते, उनकी शराब में सिगार की राख मिला देते जिससे वे पूरी तरह बेहोश हो जाते और फिर उनका सारा कीमती सामान लूटकर उन्हें सड़क पर फेंक देते थे.
इसके अलावा, उन्होंने बंगाल की कुप्रथाओं का फायदा उठाकर फर्जी शादियां रचाने और अमीर घरानों को चूना लगाने का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट चला रखा था, जिसके जरिए वे दुल्हनों के गहने लेकर बीच रास्ते में ही गायब हो जाते थे.
खजाना और अंधविश्वास का लालच देकर कत्ल
जब ठगी के धंधे में मुश्किलें बढ़ने लगीं, तब त्रैलोक्य के कदम जुर्म की एक और खौफनाक दुनिया यानी कत्ल की तरफ बढ़े. सोनागाछी की ही कई उम्रदराज और बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी औरतें पैसों को लेकर परेशान रहती थीं. त्रैलोक्य ने उनके डर का फायदा उठाया और उन्हें एक ऐसे ‘तांत्रिक’ और चमत्कारी बाबा की कहानी सुनाई जो पूजा-पाठ करके उनके गहनों को दुगुना कर सकता था.
वह एक-एक करके उन महिलाओं को कलकत्ता के मानिकतला के पास एक वीरान बाग और सूनसान तालाब के पास ले जाती थी. वहां महिलाओं को नहाने के बहाने अपने सारे सोने के गहने उतारने को कहा जाता था. जैसे ही महिलाएं पानी में उतरती थीं, शातिर त्रैलोक्य पीछे से उनके सिर को पानी में डुबोकर तब तक दबाए रखती थी जब तक उनकी सांसें नहीं थम जाती थीं. इस तरह उसने एक-एक करके कई महिलाओं को सिर्फ उनके गहने लूटने के लिए पानी में डुबोकर बेरहमी से मार डाला.
दरोगा प्रियनाथ मुखोपाध्याय का जाल और अंत
इन खौफनाक वारदातों के अंत के पीछे बंगाल के पहले क्राइम पीरियोडिकल ‘दरोगा दफ्तर’ के लेखक और पुलिस अधिकारी प्रियनाथ मुखोपाध्याय का हाथ था. त्रैलोक्य इतनी चालाक थी कि एक बार कत्ल करते हुए पकड़े जाने के बावजूद उसने अपने चंगुल में एक पुराने पुलिस अधिकारी को फंसाकर खुद को छुड़वा लिया था. लेकिन जब उसने अपने ही घर में रहने वाली एक अन्य महिला ‘राजकुमारी’ के पास मौजूद सोने के गहनों के लालच में उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी, तो अधिकारी मुखोपाध्याय ने उसके खिलाफ ऐसा पक्का शिकंजा कसा कि वह बच नहीं सकी.
पुलिस ने उसके घर की लकड़ी की अलमारी के पीछे बने एक गुप्तखाने से लूटे गए सारे गहने बरामद कर लिए. अदालत में सुनवाई के बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई. साल 1884 में अपनी फांसी की रात को जब दरोगा उससे मिलने सेल में पहुंचे, तो उसने अपने पाले हुए बेटे ‘हरी’ की देखभाल करने की आखिरी गुजारिश की थी. इस तरह कलकत्ता को अपनी उंगलियों पर नचाने वाली भारत की इस शुरुआती सीरियल किलर का खौफनाक अंत हो गया.
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