Varanasi News: धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में गंगाजमुनी तहजीब और कौमी एकता की मिसाल मानी जाने वाली 483 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा इस बार टूट गई है. काशी के प्रसिद्ध लाट भैरव मंदिर परिसर में आयोजित होने वाली रामलीला के दौरान जहां एक तरफ रामायण की चौपाइयों का पाठ गूंजता था, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के लोग मगरिब की नमाज अदा करते थे. एक ही परिसर में दोनों धर्मों के लोगों का एक साथ अपनेअपने धार्मिक रीतिरिवाजों का पालन करना काशी की अनूठी पहचान रहा है. हालांकि, इस बार नमाज के समय मुस्लिम समाज के लोगों के नहीं पहुंचने से रामलीला आयोजन समिति के सदस्यों में गहरी निराशा और नाराजगी देखी जा रही है.

रामलीला आयोजन समिति के सदस्यों का कहना है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही थी और पूरे देश में आपसी भाईचारे का संदेश देती थी. समिति के पदाधिकारियों ने इस घटनाक्रम को रामलीला के सांकेतिक बहिष्कार के रूप में देखा और गहरा दुख व्यक्त किया. समिति के सदस्यों का मानना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं था, बल्कि काशी की साझा संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता की रीढ़ था.

6 साल की उम्र से जुड़े प्रधान व्यास दयाशंकर त्रिपाठी ने सुनाई दास्तान

श्री लाट भैरव मंदिर के महंत और रामलीला के प्रधान व्यास दयाशंकर त्रिपाठी ने इस परंपरा के ऐतिहासिक और भावनात्मक पहलुओं को साझा किया. दयाशंकर त्रिपाठी छह वर्ष की उम्र से इस रामलीला से जुड़े हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उन्होंने 47 वर्षों तक लाट भैरव मंदिर के महंत के रूप में सेवा दी है और रामलीला में भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की भूमिकाएं भी निभाई हैं. उन्होंने बताया कि 483 साल पुरानी इस रामलीला में चौपाइयों के पाठ के साथसाथ मगरिब की नमाज का आयोजन दोनों समुदायों के बीच अटूट विश्वास का प्रमाण था. उन्होंने आशंका जताई कि मुस्लिम समाज का न पहुंचना रामलीला के बहिष्कार की ओर इशारा करता है. हालांकि, किसी मौलाना द्वारा निर्देश जारी किए जाने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.

अदालती फैसले के बाद तय हुई थी नमाज की व्यवस्था

लाट भैरव मंदिर परिसर के प्राचीन इतिहास और कानूनी पहलुओं का जिक्र करते हुए दयाशंकर त्रिपाठी ने अहम जानकारियां दीं. उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर से जुड़े पुराने विवाद में अदालत द्वारा दिए गए फैसले के तहत मुस्लिम समाज को ईद, बकरीद और विशिष्ट अवसरों पर परिसर में नमाज अदा करने की व्यवस्था दी गई थी. उन्होंने उल्लेख किया कि औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मंदिर के चारों ओर बने आठ खानों में स्थापित भैरव प्रतिमाओं को क्षति पहुंचाई गई थी, जिसके बाद से यह स्थान कानूनी और ऐतिहासिक रूप से चर्चा में रहा है.

साझा संस्कृति और आपसी विश्वास पर उठे सवाल

लाट भैरव परिसर में रामायण पाठ और नमाज का एक साथ होना लंबे समय से बनारस की पहचान ‘तानाबाना’ का हिस्सा रहा है. आयोजन समिति का मानना है कि इस प्रकार की परंपराओं के टूटने से समाज में सदियों से बने आपसी विश्वास और सम्मान के तानेबाने को ठेस पहुंचती है. काशी के प्रबुद्ध जनों और रामलीला समिति ने उम्मीद जताई है कि आपसी संवाद के जरिए इस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित किया जाएगा ताकि कौमी एकता का संदेश आगे भी बना रहे.