अभिनेता नाना पाटेकर नहीं रहे. वो गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर में बेहोश मिले. अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. मौत की वजह कार्डियक अरेस्ट बताई गई. पांच दशक लंबे करियर में नाना ने अभिनय से हिंदी और मराठी सिनेमा में अलग पहचान बनाई. महाराष्ट्र में पुणे के डोंजे गांव में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. महाराष्ट्र सरकार ने उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान के साथ करने का ऐलान किया है.

अब सवाल है कि क्या होता है राजकीय सम्मान, क्या है इसका प्रोटोकॉल और यह राजकीय शोक से कितना अलग है. जानें इनके जवाब.
क्या है राजकीय सम्मान?
देश की किसी बड़ी हस्ती के निधन पर अक्सर खबर आती है कि उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ होगा. तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर, बंदूकों की सलामी और बिगुल की धुन इस सम्मान की पहचान हैं. कई बार लोग इसे राजकीय शोक कह देते हैं, लेकिन दोनों अलगअलग हैं. आइए दोनों को जान लेते है.
महाराष्ट्र में पुणे के डोंजे गांव में नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार किया जाएगा.
राजकीय सम्मान सरकार की ओर से किसी दिवंगत व्यक्ति को दी जाने वाली आधिकारिक अंतिम विदाई है. इसमें अंतिम संस्कार का पूरा आयोजन सरकारी प्रोटोकॉल के तहत होता है. इसे सरकारी अंत्येष्टि या स्टेट फ्यूनरल भी कहा जाता है. यह व्यक्ति के योगदान और पद के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है.
किसे मिलता है यह सम्मान?
इसके लिए कोई एक आधिकारिक कानून नहीं है. यह सरकारी दिशानिर्देशों और परंपराओं पर आधारित है.
- केंद्र स्तर पर: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों के निधन पर राजकीय सम्मान दिया जाता है. पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी यह मिलता है.
- राज्य स्तर पर: राज्यपाल और मुख्यमंत्री जैसे पदों पर रहे लोगों को संबंधित राज्य सरकार सम्मान देती है.
- विशेष मामलों में: कला, साहित्य, विज्ञान, खेल या समाज सेवा में असाधारण योगदान देने वालों को भी सरकार अपने विवेक से यह सम्मान दे सकती है. लता मंगेशकर और श्रीदेवी के अंतिम संस्कार इसके उदाहरण हैं. रतन टाटा को भी महाराष्ट्र सरकार ने राजकीय सम्मान दिया था.
पद से जुड़े मामलों में यह लगभग तय रहता है, जबकि बाकी मामलों में निर्णय सरकार का होता है. कई बार इस पर विवाद भी उठता है कि किसे दिया जाए और किसे नहीं.
नाना पाटेकर के निधन से शोक की लहर
क्या होता है प्रोटोकॉल?
राजकीय सम्मान की रस्में सेना और पुलिस की देखरेख में पूरी होती हैं.
- तिरंगे में लपेटना: पार्थिव शरीर को राष्ट्रध्वज में लपेटा जाता है. ध्वज का केसरिया हिस्सा सिर की ओर रखा जाता है.
- गार्ड ऑफ ऑनर: सशस्त्र बलों या पुलिस की टुकड़ी शस्त्र झुकाकर सलामी देती है.
- बंदूकों की सलामी:हवा में तीन बार गोलियां चलाई जाती हैं, जिसे आम बोलचाल में 21 तोपों की सलामीं कहते हैं. मूल रूप से यह सात जवानों की टुकड़ी का तीन राउंड फायर होता है.
- बिगुल की धुन: लास्ट पोस्ट बजाई जाती है, जो अंतिम विदाई का सैन्य प्रतीक है.
- ध्वज हटाना: अंतिम संस्कार से ठीक पहले तिरंगे को शरीर से हटाकर तह किया जाता है और परिवार को सौंप दिया जाता है. तिरंगा कभी चिता या कब्र में नहीं जाता।
- अंतिम संस्कार: इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार संस्कार होता है. इस दौरान वरिष्ठ नेता, अधिकारी और सैन्य अफसर उपस्थित रहते हैं और अंतिम संस्कार का स्थान और समय सरकार तय करती है.
क्या हैं शर्तें और नियम?
- सम्मान देने का फैसला सरकार करती है, परिवार को इसकी मांग का कानूनी अधिकार नहीं है.
- परिवार की सहमति के बिना राजकीय सम्मान नहीं दिया जाता, क्योंकि धार्मिक रीतिरिवाज सर्वोपरि रहते हैं.
- तिरंगे के इस्तेमाल में राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 का पालन जरूरी है.
- राज्य सरकार केवल अपने स्तर पर सम्मान की घोषणा कर सकती है, राष्ट्रीय स्तर के नियम केंद्र तय करता है.
राजकीय शोक क्या है?
राजकीय शोक सरकार की ओर से घोषित शोक की अवधि है. इसमें निर्धारित अवधि के लिए राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर शोक मनाया जाता है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके दौरान कई चीजें ध्यान में रखी जाती हैं. जैसे
- सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है.
- सरकारी मनोरंजन और उत्सव कार्यक्रम रद्द या स्थगित होते हैं.
- सरकार चाहे तो एक दिन का सार्वजनिक अवकाश भी घोषित कर सकती है, पर यह अनिवार्य नहीं है.
शोक की अवधि अलगअलग हो सकती है. मसलन, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन पर सात दिन का राजकीय शोक घोषित हुआ था. लता मंगेशकर के निधन पर दो दिन का राष्ट्रीय शोक रहा.



