दोस्तों से मिलने जा रही कियारा को उसके मामा ने पूछा कहां जा रही हो कब तक आओगी और कौन कौन से दोस्त होंगे पार्टी में. मायरा का क्विक रिएक्शन था ओहो मामू कितने टॉक्सिक हो रहे हैं आप. आजकल की जेनरेशन को जज किया जाना पसंद नहीं. लेकिन कमाल की बात ये, आजकल ही लोगों को तुरंत रेड फ्लैग, ग्रीन फ्लैग, टॉक्सिक के खांचे में टांग दिया जाता है. सोशल मीडिया का लोगों में इस कदर क्रेज है कि वो रियल लाइफ को रील वाली बनाने में लगे हुए हैं.

सुबह उठने से रात को सोने तक लोग घंटों रील्स को देखने में लगे रहते हैं. हर वीडियो के बाद दूसरी वीडियो में नयापन दिमाग में अलगअलग ख्याल बनाता है. रील्स की लत ही नहीं इनका हमारी पर्सलन जिंदगी पर क्या असर पड़ रहा है, चलिए आपको समझाते हैं?
क्या है रेड और ग्रीन फ्लैग?
रेड फ्लैग यानि वो रिश्ता जो टोटल नो नो है. इस रिश्ते में आगे बढ़ना खतरा है.
टॉक्सिक रिलेशनशिप यानी वो रिश्ता जहां आपका दम घुटे, आपकी भावनाओं की कदर नहीं.
ग्रीन फ्लैग वो रिश्ता जिसे फौरन हां कहा जा सकता है. एक हेल्थी रिलेशनशिप या एप्रूव्ड पर्सन.
वायरल रील तय कर रही कैसे होंगे रिश्ते?
घर परिवार के लोगों के साथ ही नहीं जीवनसाथी के साथ ये लेबलिंग वाला फलसफा अब थेरेपी, काउंसलिंग के द्वार पहुंच गया हैं. क्योंकि आपकी एक लड़ाई को किसी वायरल रील ने बता दिया टॉक्सिक रिश्ता और आपके पार्टनर को रेड फ्लैग. 5 लक्षणों से पहचाने, रैड फ्लैग या ग्रीन फ्लैग. कहीं ऐसे 30 सैकेंड के वीडियो के चक्कर में आप आगे की तीस साल की गृहस्थी या रिलेशनशिप में आग तो नहीं लगाए ले रहें.
समस्या ये हैं आजकल लोगों के रिफरेंस दोस्त और ज्ञान का भंडार सब इंटरनेट और सोशल मीडिया ही हैं. ऐसे में रिलेशनशिप स्ट्रेस बढ़ रहा है. समीर मल्होत्रा कहते हैं अपने तीन दशकों की प्रैक्टिस में पिछले एक दशक में जिस तेजी से लोग रिश्तों में तनाव और ट्रामा की बात लेकर आ रहे हैं वो हैरत में डालता है.
रिलेशनशिप का एडवाइजर है इंटरनेट
लोग अपने रिश्तों को समझने के लिए दोस्तों से ज्यादा इंटरनेट और सोशल मीडिया पर निर्भर हो रहे हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी में सब्र भी कम हुआ है. नतीजा यह है कि छोटीछोटी बातों पर लोग जल्दी ओवररिएक्ट करते हैं और रिश्तों को तुरंत जज कर देते हैं.
हर लड़ाई नहीं होती टॉक्सिक
साइकॉलजिस्ट आशिमा श्रीवास्तव कहती हैं कि हर लड़ाई टॉक्सिक रिश्ते का संकेत नहीं होती. हेल्दी रिश्तों में भी असहमति, इरिटेशन और गलतफहमियां होती हैं. फर्क इस बात से पड़ता है कि लड़ाई के बाद क्या होता है. दोनों एकदूसरे को सुनते हैं, गलती होने पर माफी मांगते हैं और समस्या सुलझा कर आगे बढ़ते हैं, तो यह सामान्य कॉन्फ्लिक्ट है.
इसके उलट लगातार अपमान, मैनिपुलेशन, कंट्रोलिंग बिहेवियर, बेवजह शक, बाउंड्री का उल्लंघन या मानसिकशारीरिक नुकसान रेड फ्लैग हो सकता है. आशिमा के मुताबिक, किसी एक घटना से ज्यादा व्यवहार का लगातार दोहराया जाना महत्वपूर्ण है.
सोशल मीडिया का 30 सेकंड वाला फैसला
समीर मल्होत्रा बताते हैं कि सोशल मीडिया की रिलेशनशिप एडवाइस रिश्तों को देखने का नजरिया बदल रही है. 30 सेकंड की रील अक्सर पूरे संदर्भ के बिना किसी व्यवहार को रेड फ्लैग घोषित कर देती है. लोग वही पैमाना अपने रिश्ते पर लगाने लगते हैं. इंटरनेट पर दिखने वाले परफेक्ट कपल्स भी वास्तविक रिश्तों से अवास्तविक उम्मीदें पैदा करते हैं.
इसका मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया या डिजिटल दुनिया ही रिश्तों की समस्या है. असली समस्या तब है, जब ऑनलाइन सलाह वास्तविक रिश्ते के संदर्भ, बातचीत और समझ की जगह लेने लगे.
समझौता कितना और कब?
डॉ आशिमा कहती हैं कि हर रिश्ते में एडजस्टमेंट जरूरी है. अलग आदतों, पसंद और कम्युनिकेशन स्टाइल के बावजूद साथ चलने के लिए सब्र और समझ चाहिए. लेकिन एडजस्टमेंट का मतलब अपमान, शोषण या लगातार चोट सहना नहीं है. जब आत्मसम्मान, मानसिक शांति या सुरक्षा प्रभावित होने लगे और बदलाव की जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति उठा रहा हो, तो यह गंभीर संकेत है.
समीर मल्होत्रा भी मानते हैं कि सेल्फरिस्पेक्ट की समझ बढ़ना सकारात्मक बदलाव है. पहले कई लोग लोग क्या कहेंगे के डर से खराब रिश्तों में बने रहते थे. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि कभीकभी अहंकार को भी सेल्फरिस्पेक्ट का नाम दे दिया जाता है. छोटी बहस के बाद रिश्ता सुधारने की कोशिश करने के बजाय लोग अलग होने का फैसला कर लेते हैं.
‘मुझे कितना टोलरेट करना चाहिए?’
डॉ आशिमा श्रीवास्तव के मुताबिक, सही सवाल यह नहीं कि मुझे कितना टोलरेट करना चाहिए? बल्कि यह है कि क्या हम असहमति के बावजूद एकदूसरे का सम्मान, भरोसा और सुरक्षा बनाए रख सकते हैं? डॉ समीर मल्होत्रा यह भी बताते हैं कि कई बार रिश्तों का तनाव सिर्फ रिश्ते की समस्या नहीं होता. मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां, नशे की समस्या, मूड से जुड़ी दिक्कतें या अत्यधिक शक जैसी स्थितियां भी रिश्ते को प्रभावित कर सकती हैं. ऐसे मामलों में समस्या को सिर्फ टॉक्सिक बिहेवियर का नाम देने के बजाय विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी हो सकता है.
आखिरकार, हर असहमति रेड फ्लैग नहीं और हर समझौता कमजोरी नहीं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। रिश्ते को समझने के लिए वायरल रील के पांच लक्षणों से ज्यादा जरूरी है—बिहेवियर पैटर्न,संदर्भ, डिस्कशन रिस्पेस्ट और दोनों की खुद को बदलने या स्थितियां बदलने की इच्छा.



