Himachal Se: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा कि अगर मातापिता दोनों IAS अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? जस्टिस बीवी नागरत्ना एवं जस्टिस उजल भुयन ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन परिवारों को ऊपर उठाना है, जो अभी भी पिछड़े हैं. अगर कोई परिवार पहले ही शिक्षा, नौकरी, सम्मान और संसाधनों के स्तर पर आगे निकल चुका है, तो उसके बच्चों को उसी तरह आरक्षण देना क्या उचित है?

क्या हर IAS-डॉक्टर को OBC आरक्षण का फायदा नहीं मिलता? सुप्रीम कोर्ट के सवाल से उठा क्रीमी लेयर का मुद्दा​
क्या हर IAS-डॉक्टर को OBC आरक्षण का फायदा नहीं मिलता? सुप्रीम कोर्ट के सवाल से उठा क्रीमी लेयर का मुद्दा​

ने अभी इस मामले में कोई फैसला नहीं सुनाया है लेकिन एक बार क्रीमी लेयर को लेकर सवाल फिर ताजा हो गया है. आइए इसी बहाने जानते हैं कि क्रीमी लेयर क्या है? ओबीसी आरक्षण में किसे मिलता है फायदा और किसे नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाया सवाल?

क्या है क्रीमी लेयर का मतलब?

भारत में आरक्षण का उद्देश्य केवल सीटें बांटना नहीं है. इसका असली मकसद उन वर्गों को आगे लाना है, जो लंबे समय तक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पीछे रहे. ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग को इसी सोच के तहत आरक्षण दिया गया. लेकिन ओबीसी के भीतर भी एक ऐसी श्रेणी मानी गई, जो बाकी लोगों की तुलना में काफी आगे निकल चुकी है.

सुप्रीम कोर्ट

क्रीमी लेयर का मतलब है OBC वर्ग के भीतर वह हिस्सा, जो आर्थिक, सामाजिक या प्रशासनिक रूप से मजबूत हो चुका है. ऐसे परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता. आरक्षण का फायदा उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो अभी भी पीछे हैं. यानी हर ओबीसी व्यक्ति अपने आप आरक्षण का हकदार नहीं होता. अगर परिवार की स्थिति बहुत मजबूत है, तो वह क्रीमी लेयर में माना जा सकता है. ऐसे में उसे आरक्षण नहीं मिलेगा.

क्रीमी लेयर की जरूरत क्यों पड़ी?

जब ओबीसी आरक्षण लागू हुआ, तब यह डर भी सामने आया कि इसका लाभ बारबार वही परिवार न उठा लें जो एक बार आगे बढ़ चुके हैं. अगर ऐसा होता, तो ओबीसी के सबसे कमजोर समुदाय पीछे ही रह जाते. इसी कारण क्रीमी लेयर की अवधारणा लाई गई. इसका सीधा उद्देश्य था कि आरक्षण का फायदा ओबीसी के गरीब, वंचित और कम प्रतिनिधित्व वाले तबकों तक पहुँचे. यानी जो परिवार पहले से मजबूत हो चुके हैं, उन्हें इस सुविधा से बाहर किया जाए.

ओबीसी आरक्षण में किसे मिलता है फायदा?

ओबीसी आरक्षण का लाभ सामान्य रूप से उन लोगों को मिलता है जो ओबीसी सूची में आते हों. नॉनक्रीमी लेयर में हों. तय नियमों और प्रमाणपत्रों को पूरा करते हों. सरकारी नौकरियों और कई शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. लेकिन यह लाभ सिर्फ नॉनक्रीमी लेयर ओबीसी को मिलता है. यही सबसे महत्वपूर्ण बात है.

बहुत से लोग सोचते हैं कि क्रीमी लेयर केवल आय से तय होती है, यह पूरी तरह सही नहीं है.

किसे नहीं मिलता फायदा?

ओबीसी के भीतर वे लोग आरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जिनके परिवार की सामाजिक, प्रशासनिक या आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो चुकी हो. आम तौर पर ऐसे मामलों में क्रीमी लेयर लागू होती है. सरकारी नियमों के अनुसार, कुछ स्थितियों में मातापिता की पोस्ट बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. केवल आय ही नहीं देखी जाती. उदाहरण के लिए अगर माता या पिता संवैधानिक पद पर रहे हों, मातापिता सीधे ग्रुपए सेवा में रहे हों, पैरेंट्स ग्रुपबी सेवाओं में हों, अगर परिवार उच्च प्रशासनिक स्तर तक पहुंच चुका हो, ऐसे मामलों में बच्चों को क्रीमी लेयर में माना जा सकता है. यानी ओबीसी होने के बावजूद उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.

क्या केवल आय से तय होती है क्रीमी लेयर?

बहुत से लोग सोचते हैं कि क्रीमी लेयर केवल आय से तय होती है. यह पूरी तरह सही नहीं है. आय एक महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन हर मामले में यही अकेला आधार नहीं होता. आम चर्चा में 8 लाख रुपये सालाना की सीमा का जिक्र होता है. लेकिन सरकारी नौकरी वाले परिवारों के मामलों में कई बार मातापिता की नौकरी की श्रेणी और पद भी देखे जाते हैं. यानी कोई व्यक्ति केवल कम या ज्यादा वेतन के आधार पर ही क्रीमी लेयर में नहीं आता. उसका सामाजिक और प्रशासनिक दर्जा भी मायने रखता है.

8 लाख या उससे ज्यादा सालाना आय है तो क्या?

इस ताजी बहस के बीच ओबीसी के अलावा अन्य वर्गों के लिए भी यह जानना जरूरी है कि सरकारी सेवा के बाहर जो लोग हैं, उनका कैसे तय होगा कि वे गरीब हैं या अमीर? ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे कहते हैं कि इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने पहले से ही स्पष्ट व्यवस्था कर रखी है. आठ लाख रुपये या उससे ऊपर की सालाना आय वाला कोई भी व्यक्ति न तो ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लाभ ले सकता है और न ही किसी और तरीके का सरकारी लाभ. चाहे वह डॉक्टर हो, इंजीनियर हो या निजी क्षेत्र में काम करने वाला अधिकारीकर्मचारी. आठ लाख या उससे ज्यादा सालाना आय का मतलब हुआ कि आप की स्थिति ठीक है.

कोर्ट की टिप्पणी के क्या हैं मायने?

यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है. लेकिन अदालत की टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है. इससे तीन बड़े सवाल उठते हैं. क्या आरक्षण का लाभ एक ही परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहना चाहिए? क्या ओबीसी के भीतर ज्यादा मजबूत परिवारों को बाहर करना चाहिए? क्या सबसे कमजोर ओबीसी समूहों तक लाभ सही ढंग से पहुंच रहा है? यही वजह है कि यह बहस केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बहस बन गई है.

IAS वाले परिवार पर सवाल क्यों?

भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में गिनी जाती है. अगर मातापिता दोनों इस स्तर तक पहुंच चुके हैं, तो यह माना जाता है कि परिवार को शिक्षा, अवसर, सामाजिक सम्मान और सरकारी तंत्र की समझ का लाभ मिल चुका है. ऐसे परिवार के बच्चों की स्थिति उस ओबीसी परिवार जैसी नहीं मानी जा सकती, जो आज भी गांव, गरीबी, कम शिक्षा और सीमित अवसरों से जूझ रहा है. सुप्रीम कोर्ट का सवाल इसी अंतर पर आधारित है.

EWS और OBC क्रीमी लेयर में अंतर

बहस के दौरान यह बात भी सामने आई कि EWS और OBC क्रीमी लेयर एक जैसे नहीं हैं. EWS यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का आधार मुख्य रूप से आर्थिक है. लेकिन ओबीसी आरक्षण केवल गरीबी पर आधारित नहीं है. इसमें सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन भी शामिल है. यही कारण है कि ओबीसी क्रीमी लेयर का सवाल अधिक जटिल है. इसमें केवल आय नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति और परिवार की उन्नति भी देखी जाती है.

इस बहस का समाज पर क्या असर पड़ेगा?

अगर क्रीमी लेयर के नियम सख्ती से लागू होते हैं, तो ओबीसी आरक्षण का लाभ उन लोगों तक ज्यादा पहुँच सकता है, जो वास्तव में जरूरतमंद हैं. इससे छोटे और उपेक्षित समुदायों को मौका मिल सकता है. दूसरी तरफ, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि केवल नौकरी या आय देखकर किसी परिवार का सामाजिक भेदभाव खत्म नहीं माना जा सकता. यानी बहस दो तरफ है. एक पक्ष कहता है कि मजबूत परिवारों को बाहर करो. दूसरा पक्ष कहता है कि सामाजिक पहचान और भेदभाव केवल पैसे से खत्म नहीं होते. इसलिए नीति बनाते समय बहुत सावधानी जरूरी है.

आगे क्या हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि आने वाले समय में ओबीसी क्रीमी लेयर के नियमों पर नई चर्चा होगी. संभव है कि सरकार और अदालतें इस बात पर और स्पष्टता लाएं कि कौन वास्तव में नॉनक्रीमी लेयर में आता है और कौन नहीं. यह भी हो सकता है कि क्रीमी लेयर तय करने के नियमों में भविष्य में बदलाव हो. लेकिन अभी सबसे जरूरी बात यह है कि आरक्षण का असली लाभ सही लोगों तक पहुंचे. यही सामाजिक न्याय की मूल भावना है.