जिस बेटे को बचाने के लिए मातापिता ने हर दरवाजा खटखटाया, अस्पतालों के चक्कर लगाए और अपनी पूरी उम्मीद लगा दी, आखिरकार उसे बचाया नहीं जा सका. सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल 16 वर्षीय मोनू कुमार जिंदगी की जंग हार गया. लेकिन बेटे को खोने के असहनीय दुख के बीच उसके मातापिता ने ऐसा फैसला लिया, जिसने तीन परिवारों की जिंदगी में फिर से उम्मीद जगा दी. बेटे को तो वे नहीं बचा सके, लेकिन उसके अंगदान से तीन मरीजों को नया जीवन मिल गया. इसी अंगदान की बदौलत बिहार में पहली बार सरकारी खर्च पर लिवर ट्रांसप्लांट भी सफलतापूर्वक किया गया.

पटना के पुनाईचक स्थित हनुमाननगर निवासी सुभाष कुमार का 16 वर्षीय बेटा मोनू कुमार 19 अक्टूबर को सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गया था. हादसे के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. पिता सुभाष कुमार बेटे को बचाने के लिए तुरंत अस्पताल पहुंचे. पहले उसे मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 19 से 21 अक्टूबर तक उसका इलाज चला. हालत में सुधार नहीं होने पर डॉक्टरों ने उसे इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान , पटना रेफर कर दिया.
आईजीआईएमएस में जांच के दौरान मोनू के सिर में गंभीर अंदरूनी चोट की पुष्टि हुई. चोट इतनी गंभीर थी कि उसका मस्तिष्क काम करना बंद कर चुका था. उसे वेंटिलेटर पर रखा गया. विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने तमाम चिकित्सकीय जांच के बाद उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया.
मातापिता के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी. जिस बच्चे को बचाने के लिए वे दिनरात अस्पताल में उम्मीद लगाए बैठे थे, डॉक्टरों ने बता दिया कि उसका मस्तिष्क अब काम नहीं कर रहा है.
ब्रेन डेड की पुष्टि के लिए गठित चिकित्सकीय समिति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद डॉक्टरों ने परिजनों को अंगदान के बारे में समझाया. यह फैसला लेना किसी भी मातापिता के लिए आसान नहीं था. एक तरफ बेटे को हमेशा के लिए खोने का दर्द था, तो दूसरी तरफ उसके अंगों से दूसरे लोगों को जीवन देने का अवसर.
आखिरकार सुभाष कुमार और परिवार ने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर बेटे के अंगदान की सहमति दे दी. जिस बेटे को वे अपने साथ घर वापस ले जाना चाहते थे, उसी के अंगदान से दूसरे परिवारों के घरों में खुशियां लौटने वाली थीं.
मोनू के अंगों से तीन मरीजों को मिली नई जिंदगी
मोनू के अंगदान से तीन गंभीर मरीजों का ट्रांसप्लांट किया गया. इनमें एक लिवर और दो किडनियां शामिल थीं. तीनों प्रत्यारोपण की प्रक्रिया गुरुवार को सफलतापूर्वक पूरी की गई.
19 वर्षीय युवती को मिला लिवर
आईजीआईएमएस के गैस्ट्रो सर्जरी एवं लिवर ट्रांसप्लांट विभाग में 19 वर्षीय युवती का लिवर ट्रांसप्लांट किया गया. विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष मंडल के नेतृत्व में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने यह जटिल सर्जरी की. टीम में डॉ. संजय कुमार, डॉ. कुमार, डॉ. राकेश कुमार सिंह, डॉ. अमरजीत कुमार राज, डॉ. दिनेश और डॉ. मोनाल पटेल समेत अन्य चिकित्सक शामिल रहे.
आईजीआईएमएस में किडनी ट्रांसप्लांट
मोनू की एक किडनी आईजीआईएमएस में भर्ती मरीज को प्रत्यारोपित की गई. इस ऑपरेशन में यूरोलॉजी विभाग के डॉ. रोहित उपाध्याय, डॉ. एहसान अहमद, डॉ. प्रद्युम्न शाही और डॉ. निखिल रंजन की टीम शामिल रही.
ईएसआईसी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट
मोनू की दूसरी किडनी पटना के ईएसआईसी अस्पताल में भर्ती मरीज को लगाई गई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इस प्रत्यारोपण में भी आईजीआईएमएस के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने तकनीकी सहयोग दिया. इस तरह एक किशोर के अंगदान से तीन अलगअलग मरीजों को जीवन बचाने का अवसर मिला.
बिहार में पहली बार सरकारी खर्च पर हुआ लिवर ट्रांसप्लांट
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि बिहार में पहली बार सरकारी खर्च पर आईजीआईएमएस में लिवर ट्रांसप्लांट किया गया. यह राज्य की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.
लिवर ट्रांसप्लांट बेहद जटिल और विशेषज्ञता वाला उपचार है. इसमें विशेषज्ञ सर्जन, एनेस्थीसिया टीम, गहन चिकित्सा व्यवस्था, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ और प्रत्यारोपण के बाद लगातार निगरानी की जरूरत होती है. सरकारी अस्पताल में इस प्रक्रिया का सफल होना बिहार में उन्नत चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इस उपलब्धि ने यह भी दिखाया कि अंगदान के प्रति जागरूकता और सरकारी चिकित्सा संस्थानों की विशेषज्ञता मिलकर कितनी जिंदगियां बचा सकती हैं.
बेटे को खोने का दर्द रहेगा, लेकिन तीन परिवारों के लिए मोनू हमेशा जिंदा रहेगा
मोनू के मातापिता के लिए बेटे को खोने का दुख कभी कम नहीं होगा. जिस घर में उसकी आवाज गूंजती थी, वहां अब उसकी यादें रह जाएंगी. लेकिन उनके साहसिक फैसले ने तीन ऐसे परिवारों को उम्मीद दी है, जिनके अपने गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.



