उनकी बारह लाख सालाना पेंशन ब्रिटिश महारानी को मिलने वाले प्रिवीपर्स से दोगुनी थी. लेकिन उनके बेहिसाब खर्चों के लिए यह रकम नाकाफी थी. अवध के आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह ने साहूकारों से लेकर अपने सेवकों तक से कर्ज़ लेने में परहेज़ नहीं किया. 1857 के विद्रोह से ताजाताजा उबरी ब्रिटिश हुकूमत नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा बेदखल बादशाह सड़कों पर जाएं और उनकी बदहाली का प्रचार किसी नए विद्रोह की वजह बने. एक साहूकार से लिए कर्ज मामले में अदालत से जारी वसूली डिक्री के बाद वाज़िद अली शाह गार्डन रिज के घर सुल्तान ख़ाना को रेहन रखने की कोशिश में थे. इस ख़बर ने सरकार को परेशान किया.

सरकार ने 1862 में एक कानून बना कर बादशाह को सिवाय ऐसे अपराध जिनमें मौत की सजा हो सकती है, अदालतों के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर दिया. कर्ज़ देने वालों के साथ यह अन्याय था. लेकिन फिजूलखर्ची से बादशाह को रोकने में नाकाम सरकार ने सोचा कि जब अदालत के जरिए भी वसूली की गुंजाइश नहीं रहेगी तो सेठसाहूकार उन्हें कर्ज़ देने से परहेज़ करेंगे? क्या ऐसा मुमकिन हुआ?

कर्ज़ हासिल करने के नए रास्ते ने बादशाह के कुछ मुंहलगों को मालामाल कर दिया. दूसरी ओर खिदमत में रहने वाले एक किन्नर दियानतउद्दौला ने बादशाह को उधार दिए चौंतीस हजार रुपए माफ़ कर दिए. जरिए वसीयत अपनी घरदौलत भी उन्हें दे दी. पढ़िए वाज़िद अली शाह से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.

घर रेहन रखने की नौबत!

काफी कोशिशों के बाद भी वाज़िद अली शाह से क़र्ज़ वसूली में असफल रहे साहूकार मनोहर दास ने अदालत की शरण ली. हाईकोर्ट से माफिक फैसले के बाद उसने अदायगी के लिए दबाव बनाया. रकम कहां से जुटे? अवध की हुकूमत से बेदखल किए जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने वाज़िद अली शाह को कलकत्ता के गार्डन रिज में तीन इमारतें दी थीं. सलाहकार सफ़दर अली और साले ज़ुल्फ़िक़ारुद्दौला ने राय दी कि इनमें से एक सुल्तान ख़ाना को रेहन रख पैसे का इन्तजाम कर लिया जाए.

वाजिद अली शाह.

इमारत के दस्तावेज तीन लोगों को सिपुर्द कर दिए गए. जनवरी 1862 में जब इसकी जानकारी तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को हुई तो उसने बादशाह को अपने नौकरों से सचेत रहने को कहा. इस बात के लिए दुःख और आश्चर्य व्यक्त किया कि पेंशन की बड़ी धनराशि के बाद भी वे आर्थिक परेशानियों में फंस चुके हैं. कैनिंग ने याद दिलाया कि पेंशन के अलावा वे सरकार से कुछ और उम्मीद न करें. दोहराया कि रवैया नहीं बदला तो आप और परिवार की मुसीबतें और बढ़ेंगी.

कर्ज़ लेने नहीं बल्कि देने वालों को रोको

कैनिंग की इस दो टूक के बाद भी सरकार कोई रास्ता निकालना चाहती थी. इसकी वजह थी. 1857 के संघर्ष की यादें अभी ताजा थीं. दिल्ली और अवध का राज हड़प लेने की बदनामी अंग्रेजों का पीछा कर रही थी. ऐसे में पैसों की किल्लत के चलते बादशाह वाज़िद अली शाह के सड़क पर आने से लोग उनके हक़ में जुट सकते थे. बादशाह से जुड़े मामले देखने वाले ब्रिटिश अफसर मान चुके थे कि बादशाह की फिजूलखर्ची और कर्ज़ लेने की आदत लाइलाज है. दूसरा रास्ता सोचा गया कि ऐसे हालत पैदा किए जाएं कि साहूकार उन्हें कर्ज़ ही न दें. मनोहर दास ने बादशाह से वसूली के लिए अदालत का सहारा लिया था. राय बनी कि अगर बादशाह को अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया जाए तो बादशाह को कर्ज़ देने से लोग पीछे हट जायेंगे. कानून में इंतजाम इस बात का भी था कि पुराने कर्ज़ की भी बादशाह से वसूली न हो सके.

बादशाह नहीं बदले तो कानून बदला

कैनिंग की विदाई के हफ्ते भर के भीतर ही नए गवर्नर जनरल अर्ल ऑफ़ एल्गिन ने अवध के बादशाह अधिनियम 1862 को मंजूरी दे दी. 27 मार्च 1862 को पारित इस अधिनियम में उन मामलों को छोड़कर जिनमें मौत की सजा हो सकती है बादशाह को दीवानीफौजदारी अदालतों के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर दिया गया. अदालतें न ही उन्हें तलब कर सकती थीं और न ही वारंट जारी कर सकती थीं. घर तक में भी वे नजरबंद नहीं किए जा सकते थे. अदालतें उनसे ब्रिटिश एजेंट के जरिए ही कुछ पूछ सकती थीं. फिर भी दीवानी, राजस्व अथवा फौजदारी मामलों में अगर कोई अदालत आदेश देने का प्रयास करती तो उसके लिए पहले गवर्नर जनरल का अनुमोदन और फिर भारत सरकार के सचिव की पुष्टि जरूरी थी.

गवर्नर जनरल अर्ल ऑफ़ एल्गिन ने अवध के बादशाह अधिनियम 1862 को मंजूरी दे दी थी.

बादशाह जिनके कर्ज़दार थे, उनके लिए निश्चय ही यह कानून अन्यायपूर्ण था. लेकिन सरकार के अपने तर्क थे. ब्रिटिश एजेंट हरबर्ट के अनुसार, “आशा की जाती है कि भविष्य में लोग महामहिम को बेहिसाब उधार देने और फिर आगे की वसूली की परेशानियों से बचेंगे. चूंकि बादशाह तो खुद को नहीं बदल पाएंगे , इसलिए उन्हें कर्ज़ देने वालों को सचेत कर दिया जाए कि अदालतों के जरिए भी वसूली मुमकिन नहीं होगी.”

बिचौलियों की चांदी

इस कानून का बादशाह ने पूरा फायदा उठाया. बैंकरों, साहूकारों और सौदागरों के बकाये से उन्होंने किनारा कर लिया. अब उनके शौक और जरूरतों का जरिया उनके कर्मचारी थे. मुंशी सफदर अली इनका मुखिया था. ये कर्मचारी बाजार से सामान उठाते और फिर मनमाने दामों पर बादशाह को बेचते. जहां से सामान लाते, उन्हें भी फायदा नज़र आता, इसलिए इन कर्मचारियों को उधार देने में गुरेज नहीं रहता था. देने वाले व्यापारियों को पता था कि सामान किसके लिए जाता है लेकिन वे कर्मचारियों पर पकड़ आसान मानते थे, इसलिए खास फिक्र नहीं करते थे.

दिलचस्प है कि बादशाह को जिन सफदर अली की अगुवाई में सामान सप्लाई होता था, वही सफदर बादशाह के भुगतान का भी हिसाब रखता था. हिसाबकिताब की कोई जांच न कर सके, इसका सफदर पुख्ता इंतजाम किए हुए था. जून 1866 में सफदर की मौत के बाद उसके गोरखधंधों के राज खुलने शुरू हुए. बादशाह से मामूली तनख्वाह पाने वाला सफदर अपनी मौत से पहले बड़ी दौलत का मालिक बन चुका था. बादशाह से भी कथित तौर पर उसे लगभग चालीस लाख मिलना था.

बीस रुपए पाने वालों का लाखों का दावा!

1862 के कानून ने बादशाह को अदालत के दायरे से बाहर किया था लेकिन वकीलों ने रास्ता निकाल लिया. सफदर के वारिसों और कुछ अन्य ने बादशाह के खिलाफ चालीस लाख का दावा पेश किया. हाईकोर्ट ने माना कि बादशाह को तलब नहीं किया जा सकता लेकिन उन पर मुकदमा दायर किया जा सकता है. इस अदालती कार्यवाही के दौरान सरकार की सहानुभूति बादशाह के साथ थी. उसके अधिकारी बादशाह की आदतों से खिन्न थे लेकिन वे मानते थे कि अपनी उदारता के कारण वे उन लोगों द्वारा ठगे जाते हैं, जिन पर वे आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं.

इस बीच एजेंट मेजर हरबर्ट ने सुयोग्य और ईमानदार अमीर अली को बादशाह के कानूनी मसलों की देखभाल के लिए नियुक्ति दिलाई. दोनों ने चौदह मुख्य लेनदारों की सूची बनाई. उनसे बकाए के समर्थन में कागज पेश करने के लिए कहा. इनमें कई बादशाह के कर्मचारी थे, जिनकी तनख्वाहें बीस से पचास रुपए के बीच थीं. उनका भी बादशाह पर लाखों का दावा था. उधर बादशाह का कहना था कि वे मातहतों पर भरोसा करते हुए एक से ज्यादा बार भुगतान कर चुके हैं. 1867 के अंत तक हरबर्ट और अमीर अली की जांचपड़ताल के बाद लगभग पचास लाख का बकाया घटकर सात लाख अस्सी हजार पर पहुंच गया. बादशाह ने इसकी किस्तों में अदायगी की रजामंदी दे दी.

किन्नर दियानुतद्दौला ने बादशाह के नाम जमीनजायदाद कर दी थी.

उसने सब कुछ किया बादशाह के नाम

अनेक कर्मचारी थे, जिन्होंने बादशाह की उदारता का गलत फायदा उठाया और उन्हें ठगा. दूसरी तरफ एक कर्मचारी दियानुतद्दौला था जो अपना सब कुछ बादशाह के नाम कर गया. 1831 में तत्कालीन बादशाह नसीरुद्दीन हैदर द्वारा खरीदे गए 18 अफ्रीकी गुलामों में दियानुतद्दौला भी शामिल था. वह किन्नर था. जिंदगी भर दरबार के प्रति वफादार रहा और तरक्की करता रहा. 23 जून 1867 को गार्डन रिज स्थित घर में उसकी मौत हुई.

अमीर अली ने एजेंट हरबर्ट को खबर दी कि दियानुतद्दौला के मरने के बाद उसके घर से जेवरनकदी के साथ ही 67 हजार के बॉन्ड गायब कर दिए गए हैं. गार्डन रिज के भीतर कलकत्ता पुलिस का प्रवेश वर्जित था. हरबर्ट ने बैंक ऑफ बंगाल को खबर कर बॉन्डों के भुगतान पर रोक लगवा दी. किन्नर दियानुतद्दौला ने हालांकि फिदा हुसैन नामक एक किशोर को गोद लिया था , लेकिन अपनी जमीनजायदाद उसने बादशाह को वसीयत की थी. बादशाह उसका चौंतीस हजार नकद भी बाकी थे. वसीयत में इसकी माफी का भी जिक्र था.