कभी हमारे घरों में रसोई की शेल्फ पर एक डिब्बा होता था, जिसे पूरा खाली नहीं किया जाता था. थोड़ा अनाज, अगली बुआई के लिए कुछ बीज बचाकर रखे जाते थे. हमारी दादियां जानती थीं कि आज जो खा रहे हैं, उसे कल उगाना भी है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अब हम ज़रूरत का सामान खरीदते हैं और खत्म होने पर फिर खरीद लेते हैं. ओडिशा के कोरापुट ज़िले की एक महिला ने देखा कि उनका गांव बीज बचाना भूल रहा है. वह सबके लिए उन्हें बचाने में जुट गईं.

उनका नाम था कमला पुजारी. देश उन्हें जानता, उससे चालीस साल से भी पहले वह दुल्हन बनकर जेयपोर के पास लगभग 119 घरों वाले पातरपुट आई थीं. उन्हें याद था, गांव में कालाजीरा, गोठिया, हलदीचुड़ी जैसी धान की करीब पंद्रह देसी किस्में उगती थीं. हर परिवार दोतीन किस्में बोता. फसल के बाद पड़ोसी बीज और अनाज बांटते. यह कोई योजना नहीं थी. साथ रहने का ढंग था.

1990 के दशक के बीच कमला ने देखा कि पुरानी किस्में घट रही हैं. संयुक्त परिवार बंट रहे थे. छोटी ज़मीन और कम आमदनी वाले परिवार अधिक उपज देने वाला संकर धान अपनाने लगे. सरकारी मंडी कई पुरानी किस्में नहीं खरीदती थी, क्योंकि वे उसके तय मानकों पर खरी नहीं उतरती थीं. पीढ़ियों से उगता धान धीरेधीरे खेतों से गायब होने लगा. उसे छोड़ने का कोई फैसला नहीं हुआ. वह चुपचाप छूटता गया.

कमला ने उसे बचाने की ठानी. न प्रशिक्षण था, न अलग से पैसा. वह पातरपुट के आसपास करीब बीस किलोमीटर के दायरे में पैदल जातीं. पुराने बीज उगाने वाले परिवारों को खोजतीं और थोड़े बीज मांगतीं. कठिन रास्ते जंगलों से गुज़रते थे. कभी रात किसी गांव में बितानी पड़ती. लौटकर बीज संभालतीं या अपनी ज़मीन के छोटे हिस्सों में बोतीं. उनका विश्वास था कि बीज खेत में बारबार उगने से ही बचता है.

2002 में जोहान्सबर्ग गईं

इन यात्राओं की कोई तनख्वाह नहीं थी. रास्ते के अंत में तालियां भी नहीं थीं. एक महिला घरघर जाकर वह चीज़ मांग रही थी, जिसकी कद्र घट गई थी, ताकि आने वालों के लिए वह बची रहे. हम बचत अक्सर पैसों में गिनते हैं. कमला बीज बचाने के लिए पैदल चल रही थीं. बाद में जेयपोर के एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन से मदद मिली. वहां उन्होंने बीज संरक्षण और जैविक खेती के तरीके सीखे. 2001 में संस्था ने पातरपुट में सामुदायिक बीज बैंक बनाया. उन्होंने किसानों को रासायनिक खाद छोड़ने के लिए प्रेरित किया. कई किसानों ने उनकी बात अपनाई. 2002 में वह जेयपोर के आदिवासी समुदायों की ओर से अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार लेने जोहान्सबर्ग गईं.

2018 में ओडिशा राज्य योजना बोर्ड की सदस्य बनीं और 2019 में पद्मश्री मिला. जीवन के अंत तक सौ से अधिक बीज किस्में बचाने का श्रेय उन्हें मिला, लेकिन अपने घर में भी मुश्किल थी. 2019 में उनके बेटे टंकधर ने एक पत्रकार को परिवार के दो एकड़ खेत दिखाए. अधिकांश में मंडी के लिए संकर धान था. पुरानी किस्में छोटे हिस्सों में थीं. उन्होंने बताया कि पुराना धान लगभग आधी उपज देता है. कम पैदावार में परिवार कैसे चले? उन्हें दोष देना गलत होगा. यही मजबूरी पूरे इलाके से पुराने बीज हटा रही थी. किसी अनमोल चीज़ को बचाना कठिन है, जब उससे घर चलाने भर की आमदनी न मिले.

सम्मान मिलने से हर हक भी सुरक्षित नहीं हुआ. उसी पत्रकार को पता चला कि दशकों से कमला द्वारा उगाए और बचाए गए कालाजीरा धान के कानूनी अधिकार 2013 में दूसरे किसान के नाम दर्ज हुए थे. उन्हें ऐसे कानून की जानकारी नहीं थी. उनके लिए बीज का अर्थ प्रमाणपत्र नहीं था. बीज खेत में उगे और दूसरों तक पहुंचे, यही ज़रूरी था.

74 साल की उम्र में निधन

अंतिम वर्षों में उन्हें गुर्दे की बीमारी रही. 20 जुलाई 2024 को कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में लगभग 74 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ. उनकी बेटी रायमति घिउरिया छह एकड़ में देसी धान उगाती हैं. बेटे ने भी पुरानी किस्मों की ओर लौटने की इच्छा जताई थी. वह लौटे या नहीं, इसका रिकॉर्ड नहीं है. 2023 में कमला ने छात्रा हर्षिता प्रियदर्शिनी मोहंती को चार किस्मों के बीज देकर कहा था कि अब बच्चों को इन्हें बचाना होगा. हर्षिता ने तब से 180 से अधिक किस्में जुटाई हैं.

हमारी थाली का चावल किसी अकेले इंसान की देन नहीं है. किसी ने बीज चुने, बचाए और आगे दिए. अधिकतर के नाम हम नहीं जानते. कमला पुजारी का नाम जानते हैं. वह कहती थीं कि बीज बोने, उगाने, जुटाने और रखने से अधिक उन्हें बांटना पसंद था. मेरे पास के बीज खो भी जाएं, तो किसी और के पास सुरक्षित रहेंगे. हमारे पास ऐसा क्या है, जो किसी और के हाथों में पहुंचकर अधिक सुरक्षित रहेगा, आगे बढ़ेगा?

उन्हें देखिए. उन्हें जानिए. उनका धन्यवाद कीजिए.