हिंदू धर्म में होने वाले तमाम पूजा-पाठ में आपने चरणामृत का इस्तेमाल होते देखा होगा। ऐसा भी संभव है कि आपने चरणामृत का कई बार सेवन भी किया होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चरणामृत होता क्या है और पूजा-पाठ में इसका इस्तेमाल क्यों किया जाता है। आज हम आपको इस बारे में विस्तार से बताएंगे। सामान्य तौर पर ऐसा कहा जाता है कि हिंदू धर्म में चरणामृत के इस्तेमाल के बिना कोई पूजा-पाठ पूरा ही नहीं होता है। पूजा-पाठ समाप्त होने के बाद चरणामृत को प्रसाद के तौर पर दिया जाता है। बता दें कि चरणामृत का अर्थ है- चरणों का अमृत। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कहते हैं कि भगवान के चरणों का अमृत बड़े भाग्यशाली लोगों को ही नसीब होता है।

puja-4

ऐसी मान्यता है कि चरणामृत के सेवन से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है। उस व्यक्ति के जीवन से नकारात्मक भाव दूर हो जाते हैं और वह समृद्धि को प्राप्त करता है। सकारात्मकता आने से व्यक्ति नए उत्साह से भर जाता है और अपने भविष्य में नए लक्ष्यों की प्राप्ति में लग जाता है। इसके अलावा चरणामृत का पान करने वाले व्यक्ति पर सीधे भगवान की कृपा बरसती है। उस व्यक्ति के सारे कष्ट समाप्त हो जाते हैं और वह सुखों को प्राप्त करता है।

मालूम हो कि चरणामृत सदैव दाएं हाथ से ही ग्रहण करना चाहिए। इससे जीवन में शीतलता आती है। चरणामृत तांबे या फिर मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है। इसके लिए शीतल जल, तिल, दही, गुण, तुलसी का पत्ता और अन्य औषधीय तत्व मिलाए जाते हैं। तांबे में रखने से उसके पोषक तस्व चरणामृत में घुल जाते हैं। इस प्रकार से चरणामृत का सेवन स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत अच्छा है। कहते हैं कि चरणामृत के सेवन से पौरुष शक्ति भी बढ़ती है। इससे व्यक्ति ऊर्जावान होता है।