मानहानि के मामले में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एमपीएमएलए अदालत ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बरी कर दिया है. आरोप है कि साल 2018 में राहुल गांधी ने मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. आठ साल बाद यह फैसला सुल्तानपुर की विशेष अदालत ने सुनाया है.

आइए, इसी बहाने समझते हैं कि क्या होती है एमपीएमएलए अदालत? कौनकौन से मामले कि सुनवाई यहाa होती है? इन अदालतों की शुरुआत कब हुई और कितनी तेजी से फैसलों का निपटारा होता है?

MPMLA अदालत क्या होती है?

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे ने बताया कि MPMLA अदालत सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष या नामित अदालत होती है. इसका उद्देश्य ऐसे मामलों को प्राथमिकता देकर जल्दी सुनना है. यह आम तौर पर सत्र न्यायालय या मजिस्ट्रेट अदालत के रूप में काम करती है.

फर्क यह है कि इसमें सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई को विशेष रूप से तय किया जाता है. हर राज्य में इसका ढांचा एक जैसा नहीं है. कहीं अलग विशेष अदालत बनाई गई है, तो कहीं मौजूदा अदालत को इन मामलों के लिए नामित किया गया है. इनका पर्यवेक्षण हाईकोर्ट से करने की व्यवस्था है. सुप्रीम कोर्ट को समयसमय पर इसकी रिपोर्ट भी भेजी जाती है.

मानहानि मामले में राहुल गांधी को कोर्ट ने बरी कर दिया है.

यहां किन मामलों की सुनवाई होती है?

इन अदालतों में मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है. इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, दंगा, मारपीट, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, धमकी और चुनाव से जुड़े अपराध जैसे मामले शामिल हो सकते हैं. मानहानि के मामले भी यहां पहुंच सकते हैं, यदि संबंधित अदालत को उस मामले की सुनवाई के लिए नामित किया गया हो. सिर्फ किसी जनप्रतिनिधि का नाम मामले में होने से यह तय नहीं होता कि सुनवाई एमपीएमएलए अदालत में ही होगी.

अदालत का अधिकार क्षेत्र, मामले की प्रकृति और राज्य में लागू व्यवस्था भी मायने रखती है. मामला किस अदालत में जाएगा, यह संबंधित कानूनी नियमों और न्यायिक आदेशों से तय होता है.

केंद्र सरकार की विशेष अदालत योजना के तहत देश में 11 अदालतें बताई गई हैं.

शुरुआत कब और क्यों हुई?

इन विशेष अदालतों की शुरुआत की पृष्ठभूमि में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक मामले थे. चिंता यह थी कि मुकदमे लंबे समय तक चलते रहें, तो जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में सांसदों और विधायकों के लंबित आपराधिक मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनाने का निर्देश दिया. यह निर्देश अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ के मामले में आया था. अदालत ने केंद्र सरकार से राज्यों के साथ मिलकर ऐसी अदालतें स्थापित करने को कहा था.

इसका मकसद मुकदमों को नियमित अदालतों की लंबी कतार से अलग प्राथमिकता देना था. इस व्यवस्था का एक उद्देश्य यह भी था कि गंभीर अपराधों के आरोपों का फैसला बिना अनावश्यक देरी के हो. इससे दोषी पाए गए व्यक्ति को कानून के अनुसार सजा मिल सकती है. वहीं, आरोपी को भी समय पर अपना पक्ष रखने और अदालत से निर्णय पाने का अवसर मिलता है.

देश में ऐसी कितनी अदालतें हैं?

केंद्र सरकार की विशेष अदालत योजना के तहत देश में 11 अदालतें बताई गई हैं. इनमें दिल्ली में दो अदालतें हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल और अंडमान निकोबार में एकएक अदालत है. यह संख्या केंद्र की इस विशेष योजना के तहत स्थापित अदालतों की है.

एडवोकेट दुबे कहते हैं कि इसके अलावा, कई राज्यों में मौजूदा जिला या सत्र अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए नामित किया गया है. इसलिए देश में ऐसी सुनवाई करने वाली अदालतों की कुल संख्या केवल इन 11 से नहीं समझी जा सकती. राज्यों की व्यवस्था और नामित अदालतों की संख्या इनसे कहीं ज्यादा हो सकती है.

ये अदालतें किसके सुपरविजन में काम करती हैं?

विशेष अदालतें न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. वे संबंधित राज्य की न्यायपालिका मतलब हाईकोर्ट के अधीन काम करती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में हाई कोर्टों को सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की निगरानी के लिए विशेष पीठ बनाने और लंबित मामलों की प्रगति देखने के निर्देश दिए. हाई कोर्ट जरूरत के अनुसार रिपोर्ट मंगा सकता है और सुनवाई में देरी रोकने के लिए निर्देश दे सकता है.

इसका मतलब यह नहीं कि हाई कोर्ट हर मामले का फैसला खुद करता है. मुकदमे का फैसला वही अदालत करती है जहां मामला चल रहा है. केंद्र सरकार का विधि मंत्रालय विशेष अदालतों की स्थापना और संबंधित योजना में भूमिका निभाता है. लेकिन अदालतों के रोजमर्रा के न्यायिक काम में न्यायिक स्वतंत्रता बनी रहती है.

पहले फैसले कितनी देरी से आते थे?

विशेष अदालतों से पहले भी सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों में होती थी. उन अदालतों में दूसरे आपराधिक और दीवानी मामले भी चलते थे. गवाहों की अनुपस्थिति, जांच में देरी, बारबार स्थगन, दस्तावेजों की कमी और अदालतों में लंबित काम के कारण कुछ मामले वर्षों तक चल सकते थे.

विशेष अदालतों से मामलों को प्राथमिकता मिली है और कुछ मामलों का निपटारा तेजी से हुआ है. संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2023 में सांसदों और विधायकों से जुड़े 2,018 मामले निपटाए गए. उसी वर्ष 4,697 मामले लंबित बताए गए थे. ये आंकड़े बताते हैं कि अदालतों में काम हुआ, लेकिन यह अपनेआप साबित नहीं करते कि हर मामले का निपटारा पहले से तेज हुआ.

रफ्तार का सही आकलन करने के लिए हर मामले की शुरुआत की तारीख, आरोप तय होने का समय और फैसले की तारीख की तुलना जरूरी है. यह भी देखना होगा कि कितने नए मामले दर्ज हुए. निपटाए गए मामलों की संख्या बढ़ने के बावजूद कुल लंबित मामले कम न हों, तो इसका कारण नए मामलों का जुड़ना भी हो सकता है.

क्या हैं इस व्यवस्था की सीमाएं?

ये विशेष अदालतें लंबित मामलों को प्राथमिकता देने का तरीका हैं. वे अपनेआप मुकदमे की देरी खत्म नहीं करतीं. जांच, अभियोजन, गवाह, बचाव पक्ष और अदालतों के संसाधन सभी सुनवाई की गति पर असर डालते हैं. हाई कोर्ट की निगरानी और नियमित सुनवाई से देरी कम करने में मदद मिल सकती है. इसलिए संतुलित निष्कर्ष यह है कि विशेष अदालतें बनाने से सुनवाई को अधिक प्राथमिकता मिली और कई मामलों का निपटारा हुआ. लेकिन देश भर में फैसलों की औसत गति कितनी बढ़ी, इसका स्पष्ट राष्ट्रीय तुलनात्मक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.