अपना घर होना हर किसी का सपना होता है. लेकिन उत्तर प्रदेश के कई शहरों में घर खरीदना मुसीबत का सबब बनता जा रहा है. यहां के कई बड़े महानगरों में घर खरीदने के लिए लोग अपनी जिंदगी की बड़ी बचत लगाते हैं, बैंक से होम लोन लेते हैं और सालों तक EMI चुकाते हैं. इसके बावजूद प्रोजेक्ट में देरी, समय पर कब्जा नहीं मिलना, पैसा फंस जाना या बिल्डर के वादे पूरे नहीं होने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं.

UP RERA ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 202223 में प्रोजेक्ट्स के रजिस्ट्रेशन, शिकायतों के निस्तारण , बिल्डरों से वसूली और घर खरीदारों को रकम वापस दिलाने से जुड़े कई आंकड़े पेश किए हैं. इसमें भी प्रोजेक्ट में देरी, समय पर कब्जा नहीं मिलना, पैसा फंस जाना या बिल्डर के वादे पूरे नहीं होने जैसी शिकायतों का अंबार दिखा.
UP RERA क्या है?
रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डर और खरीदार के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने रियल एस्टेट एक्ट, 2016 यानी RERA लागू किया था. 4 अगस्त 2018 को स्थायी UP RERA का गठन हुआ था. UP RERA का मूल उद्देश्य है कि रियल एस्टेट परियोजनाओं में खरीदारों के हित सुरक्षित रहें, बिल्डरों की जवाबदेही तय हो और विवादों का जल्द समाधान किया जा सके
202223 में कितने प्रोजेक्ट और एजेंट रजिस्टर्ड हुए?
वित्तीय वर्ष 202223 में UP RERA के साथ 200 नई रियल एस्टेट परियोजनाएं रजिस्टर्ड हुईं. इनमें NCR और गैरNCR क्षेत्रों की आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाएं शामिल थीं. इसी अवधि में 797 रियल एस्टेट एजेंटों का पंजीकरण और नवीनीकरण किया गया.
वित्तीय वर्ष 202223 में RERA के पास 5,334 नई शिकायतें दर्ज हुईं. वहीं, प्राधिकरण ने इसी अवधि में 7,965 शिकायतों का निस्तारण किया. यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निस्तारित शिकायतों की संख्या उस साल दर्ज हुई नई शिकायतों से काफी ज्यादा थी. इसमें पहले से लंबित मामलों का निपटारा भी शामिल था. इसके अलावा धारा 40, 38 और 63 के तहत 2,357 निष्पादन यानी एक्सक्यूजशन से जुड़े मामलों का भी समाधान किया गया
किन जिलों में सबसे ज्यादा शिकायतें?
शिकायतों के मामले में गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद सबसे आगे रहे इसके बाद लखनऊ, वाराणसी, आगरा और मेरठ जैसे जिलों से भी बड़ी संख्या में शिकायतें सामने आईं. NCR में नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे बड़े रियल एस्टेट बाजार होने की वजह से यहां प्रोजेक्ट, फ्लैट और बिल्डर से जुड़े विवादों की संख्या भी ज्यादा रही.
- गौतमबुद्ध नगर3906
- गाजियाबाद 979
- लखनऊ 979
- आगरा93
- मेरठ84
बिल्डरों से कितनी रकम वसूली गई?
UP RERA ने उन मामलों में रिकवरी सर्टिफिकेट यानी RC जारी किए, जहां प्राधिकरण के आदेश के बावजूद बिल्डर ने भुगतान नहीं किया. वित्तीय वर्ष 202223 में 2,828 रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किए गए. इनकी कुल रकम करीब 642.68 करोड़ थी. इन RC के जरिए संबंधित जिलाधिकारियों के माध्यम से 266.77 करोड़ की वसूली की गई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यानी सिर्फ आदेश जारी करने तक कार्रवाई सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी के जरिए आदेशों को लागू कराने की कोशिश भी की गई.
घर खरीदारों को सीधे कितने पैसे मिले?
वसूली गई रकम में से 228.27 करोड़ रुपये सीधे प्रभावित शिकायतकर्ताओं और आवंटियों के बैंक खातों में RTGS के जरिए ट्रांसफर किए गए. यही आंकड़ा घर खरीदारों के नजरिए से सबसे अहम है क्योंकि किसी प्राधिकरण का आदेश तभी प्रभावी माना जाता है जब उसका वास्तविक लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसने पैसा लगाया है
ईकोर्ट से लेकर वर्चुअल सुनवाई तक
UP RERA ने विवादों के समाधान के लिए डिजिटल सिस्टम का भी इस्तेमाल किया है. 2 मार्च 2020 से ईकोर्ट प्रणाली लागू की गई इसके जरिए शिकायत दर्ज करने से लेकर सुनवाई और आदेश जारी करने तक की प्रक्रिया को डिजिटल और पेपरलेस बनाने की कोशिश की गई. वर्चुअल सुनवाई की सुविधा से ऐसे घर खरीदार भी अपनी शिकायतों की पैरवी कर सकते हैं, जो उत्तर प्रदेश या भारत से बाहर रहते हैं.
बिल्डर और खरीदार के बीच समझौते की भी कोशिश
हर विवाद को आदेश या कानूनी लड़ाई के जरिए खत्म करना जरूरी नहीं होता, इसी सोच के तहत UP RERA ने कॉन्सिलेशन फोरम यानी समझौता मंच की व्यवस्था की. RERA एक्ट की धारा 32 के तहत बनाए गए इस मंच का उद्देश्य बिल्डर और घर खरीदार के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझाना है. लखनऊ और ग्रेटर नोएडा में कॉन्सिलिएशन कंसल्टेंट्स के जरिए मामलों को बातचीत और सहमति से सुलझाने की कोशिश की गई.
अटकी परियोजनाओं को पूरा कराने पर भी जोर
रियल एस्टेट में सबसे बड़ी समस्या सिर्फ पैसा वापस मिलने की नहीं होती कई बार खरीदार वर्षों तक फ्लैट का इंतजार करता रहता है ऐसी अटकी परियोजनाओं को पूरा कराने के लिए UP RERA ने RERA एक्ट की धारा 6 और 7 के तहत विशेष व्यवस्था का इस्तेमाल किया.
इसमें जहां प्रमोटर परियोजना पूरी करने की स्थिति में नहीं था, वहां एसोशिएशन ऑफ एलॉटी यानी खरीदारों के संगठन और संबंधित सक्षम प्राधिकरणों के साथ मिलकर प्रोजेक्ट पूरा कराने की कोशिश की गई. कुछ अटकी परियोजनाओं में निर्माण दोबारा शुरू कराने और खरीदारों को कब्जा दिलाने की दिशा में भी काम किया गया



