Zydus Lifesciences: भारत की फार्मा कंपनी जाइडस लाइफसाइंसेज ने कैंसर के इलाज की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. कंपनी ने दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली कैंसर दवा कीट्रूडा का दुनिया का पहला सार्वजनिक रूप से घोषित सस्ता विकल्प तैयार किया है. अमेरिका की दिग्गज स्वास्थ्य एजेंसी यूएस एफडीए ने जाइडस की इस नई दवा की समीक्षा के लिए कंपनी का आवेदन स्वीकार कर लिया है. अगर एफडीए से इस दवा को अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो जाइडस अमेरिकी बाजार में प्रवेश करने वाली पहली कुछ कंपनियों में से एक बन जाएगी. कीट्रूडा दवा बनाने वाली कंपनी मर्क हर साल इस दवा से 30 अरब डॉलर से भी ज्यादा की कमाई करती है. जाइडस की इस नई पहल से सिर्फ कैंसर का इलाज सस्ता होने की उम्मीद है.

कैंसर मरीजों के लिए क्यों खास है ये नई दवा
कीट्रूडा एक बेहद असरदार दवा है जो कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकती है. ये दवा पीड़ी1 रिसेप्टर को ब्लॉक करके अपना काम करती है. फिलहाल इस दवा का इस्तेमाल 19 अलगअलग तरह के कैंसर के इलाज में किया जा रहा है. इसमें स्किन, फेफड़े, ब्रेस्ट से लेकर पेट के कैंसर जैसे गंभीर मामले शामिल हैं. मुंबई के जसलोक अस्पताल के जानेमाने ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. सुनील चोपड़ा ने बताया कि कीट्रूडा का दायरा बहुत बड़ा है. मरीजों की उम्र बढ़ाने में ये काफी कारगर साबित हुई है. उन्होंने साफ किया कि जाइडस द्वारा तैयार किए जा रहे इस सस्ते विकल्प से दवा की कीमत में भारी कमी आएगी.
इससे उन मरीजों को सबसे ज्यादा फायदा होगा जो पैसे की कमी के कारण ये महंगी दवा नहीं खरीद पाते. जाइडस के मैनेजिंग डायरेक्टर शार्विल पी पटेल ने भी कहा कि अमेरिका तथा कनाडा में मरीजों तक सस्ती दवा पहुंचाने की दिशा में ये एक बहुत अहम कदम है. पटेल ने ये भी साफ किया कि कंपनी का मकसद सिर्फ दवा बेचना नहीं है, बल्कि मरीजों तक नई पीढ़ी के कैंसर इलाज को आसान बनाना है. जाइडस लंबे समय से ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में भारी निवेश कर रही है.
बाजार में कंपनी को कैसे मिलेगा फायदा
जाइडस ने इस नई दवा को म्यूनिख की स्वतंत्र कंपनी फॉर्मिकॉन एजी के साथ मिलकर बनाया है. दिसंबर 2025 में दोनों कंपनियों के बीच एक खास समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत जाइडस के पास अमेरिका तथा कनाडा के बाजारों में इस दवा को बेचने के विशेष अधिकार हैं. फॉर्मिकॉन दवा के विकास, रेगुलेटरी फाइलिंग तथा सप्लाई का काम देखेगी. आवेदन स्वीकार होने के बाद अब फॉर्मिकॉन को जाइडस से एक तय भुगतान भी मिलेगा.
कंपनी ने साल 2026 की तीसरी तिमाही में मंजूरी के लिए अपना आवेदन जमा किया था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अब एफडीए इस दवा का पूरा मूल्यांकन करेगा. उम्मीद है कि साल 2027 की तीसरी तिमाही तक एजेंसी अपना अंतिम फैसला सुना देगी. इसके अलावा कंपनी ने हेल्थ कनाडा में भी अपनी अर्जी दाखिल कर दी है. ड्रगपेटेंटवॉच के आंकड़ों पर गौर करें तो, एफडीए द्वारा समीक्षा के लिए स्वीकार किए गए बायोसिमिलर दवाओं की मंजूरी दर ऐतिहासिक रूप से 90 प्रतिशत से ज्यादा रही है.
पेटेंट खत्म होने से पहले कंपनियों में मची होड़
बिक्री के मामले में कीट्रूडा दुनिया की सबसे बड़ी बायोलॉजिक दवा है. साल 2025 में इसकी कुल बिक्री 31.7 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी. वहीं 2026 की पहली छमाही में ही इस दवा ने 16.40 अरब डॉलर की कमाई कर ली है. मर्क का ओरिजिनल पेटेंट 2028 में खत्म होने वाला है. हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि मर्क ने कई नए पेटेंट भी दाखिल किए हैं जिससे उनका एकाधिकार 2031 तक खिंच सकता है. मर्क अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए पूरी तरह तैयार है, इसलिए जाइडस की राह इतनी आसान नहीं होगी. सिस्टमैटिक्स ग्रुप के एनालिस्ट विशाल मनचंदा का कहना है कि मर्क अन्य कंपनियों को कड़ी टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार है.
इस बीच बाजार के इस बड़े मौके को भुनाने के लिए कई अन्य कंपनियां भी रेस में कूद पड़ी हैं. सितंबर में सिप्ला की अमेरिकी सब्सिडियरी इनवाजेन ने चीनी कंपनी क्यूलू के साथ करार किया है. बायोकॉन तथा सैंडोज़ जैसी कंपनियां भी अपना विकल्प लाने की रेस में आगे हैं. इन सबके बीच जाइडस के लिए एक अच्छी बात ये है कि कंपनी ने बिना तीसरे चरण के लंबे ट्रायल के ही दवा का विकास पूरा कर लिया है. फॉर्मिकॉन एजी के सीईओ स्टीफन ग्लोम्बिट्ज़ा ने बताया कि एफडीए की सहमति से साल 2025 की शुरुआत में ही ये रास्ता चुना गया था. इससे दवा को तेजी से विकसित करने में मदद मिली.



