दिसम्बर की कोहरे से लिपटी उस ठिठुरती सुबह घर के दरवाजे पर दस्तक हुई. तीन साल के बच्चे के साथ घर में अकेली महिला ने संशय के बीच दरवाजा खोला. ये दुर्गावती थीं. क्रांतिकारियों की दुर्गा भाभी. आजाद, भगत सिंह और उनके साथियों के साथी भगवती चरण बोहरा की पत्नी. 17 दिसम्बर 1928 को पुलिस अफसर जे. ए. साण्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह और उनके साथियों को जल्दी से जल्दी लाहौर छोड़ना था. उन्होंने एक गुप्त ठिकाने पर रात गुजारी थी. घर के बाहर पुलिस की निगरानी थी. भगवती चरण उन दिनों कलकत्ता गए हुए थे. आजाद ने दुर्गा भाभी को योजना बताई. उन्हें भगत सिंह की पत्नी बनकर कलकत्ता जाना होगा.

पति अनुपस्थित. तुरन्त सम्पर्कस्वीकृति का कोई जरिया नहीं. विकट प्रस्ताव. निजी संकोच. समाज की सोच का भय. दुर्गा भाभी ने खुद को सबसे उबारा. तैयारी शुरू की. सफर का खर्च भी उन्हीं के जिम्मे था. जाते समय भगवती चरण घर खर्च के लिए पर्याप्त पैसे दे गए थे. अगली सुबह हैट लगाए, क्लीन शेव्ड खूबसूरत नौजवान भगत सिंह आगेआगे ‘रंजीत’ के नाम से थे. पीछे हाई हील में आत्मविश्वास से भरी दुर्गा भाभी तीन साल के बेटे शचीन्द्र को साथ लिए ‘सुजाता’ थीं. सबसे पीछे लगेज संभाले नौकर बने राजगुरु थे.

लाहौर स्टेशन पर चप्पेचप्पे पर साण्डर्स के हत्यारों की तलाश में पुलिस थी. यह जोड़ा फर्स्ट क्लास के डिब्बे की ओर बेफिक्र बढ़ता गया. राजगुरु लगेज व्यवस्थित करने के बाद तीसरे दर्जे के डिब्बे में चले गए. आजाद भी इसी ट्रेन में मथुरा जा रही साधुओं की एक मंडली में शामिल थे.

दुर्गा भाभी.

क्रांतिकारियों की दुर्गा भाभी

दुर्गा भाभी की सलाह पर कानपुर में ट्रेन छोड़ दी गई. फिर वे लखनऊ और वहां से दूसरी ट्रेन से कलकत्ता पहुंचे. भगवती चरण को उन्होंने तार दिया था कि भाई के साथ आ रही हूं. पहले वे चौंके. साण्डर्स की हत्या की खबर अखबार में पढ़ चुके थे. दिमाग उसी ओर गया. स्टेशन पर उनके सामने पुराने साथी भगत सिंह थे. 7 अक्तूबर 1907 को इलाहाबाद के शाहजादपुर में जन्मी दुर्गावती ने कम उम्र में मां को खो दिया था. सिर्फ 11 साल की उम्र में उनका भगवती चरण बोहरा से विवाह हुआ. आगे चलकर यही दुर्गावती क्रांतिकारियों की ‘दुर्गा भाभी’ बनीं. भगवती चरण कम उम्र में आजादी के आंदोलन से जुड़ चुके थे. गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सेदारी से शुरुआत हुई. तब उन्हें कहां पता था कि जिन गांधीजी के आह्वान पर वे आजादी की लड़ाई में कूद रहे हैं, उन्हीं की अहिंसा की राह से आगे चलकर उनका रास्ता अलग हो जाएगा और वे ‘बम का पन्थ’ के जवाब में ‘बम का दर्शन’ लिखेंगे.

लाहौर में भगवती चरण और भगत सिंह हुए साथ

लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई के दौरान भगवती चरण का सम्पर्क भगत सिंह, सुखदेव आदि से हुआ. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। नौजवान भारत सभा के निर्माण और प्रचारप्रसार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी संगठन के पुनर्गठन की प्रक्रिया में चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव और भगवती चरण बोहरा जैसे युवाओं की भूमिका सामने आई.

संगठन का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से आगे चलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हुआ. भगवती चरण केवल संगठनकर्ता नहीं थे. विचारक, लेखक, सिद्धान्तकार और रणनीतिकार भी थे. क्रांतिकारी साहित्य और प्रचार सामग्री तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बम बनाने का तकनीकी ज्ञान भी उन्होंने हासिल किया था. संगठन को बौद्धिक सहायता देने के साथ उसके निर्णयों के प्रति उनका पूर्ण समर्पण था.

भगत सिंह.

इरविन पर हमले ने गांधी को किया नाराज

आमतौर पर क्रांतिकारी अविवाहित होते थे. लेकिन भगवती चरण का पारिवारिक जीवन इसमें बाधक की जगह सहायक बना. पत्नी दुर्गावती उनके साथियों की दुर्गा भाभी बन गईं. वे केवल किसी क्रांतिकारी की पत्नी नहीं थीं. गुप्त संदेशों, आश्रय, आवागमन और जोखिम भरे अभियानों में स्वयं सक्रिय भागीदार बनती चली गईं. 23 दिसम्बर 1929 को आगरादिल्ली रेल लाइन पर वाइसरॉय लॉर्ड इरविन की विशेष ट्रेन को बम से निशाना बनाने की कोशिश हुई. विस्फोट जबरदस्त था. ट्रेन के डिब्बे क्षतिग्रस्त हुए. लेकिन इरविन बालबाल बच गए.

इस घटना ने कांग्रेस और क्रांतिकारियों के बीच चल रहे वैचारिक मतभेदों को और तीखा कर दिया. महात्मा गांधी ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की. Young India में 2 जनवरी 1930 को उन्होंने ‘The Cult of the Bomb’ अर्थात ‘बम का पन्थ’ शीर्षक से अपने विचार विस्तार से लिखें. गांधीजी की सोच थी कि अंग्रेजों को मारकर या उनके जीवन को खतरे में डालकर स्वराज नहीं मिल सकता. उनका विश्वास था कि व्यापक जनआंदोलन, अहिंसा और सामूहिक अवज्ञा के माध्यम से ही स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है.

उन्होंने जनता से क्रांतिकारी हिंसा का समर्थन न करने की अपील की.उन्होंने लिखा, हम लोगों के चारों ओर इतनी हिंसा व्याप्त है कि कभी इधर तो कभी उधर बमों के फेंके जाने से किसी को परेशानी नहीं महसूस होती. गांधीजी को आशंका थी कि हिंसा का रास्ता स्वतंत्रता के आंदोलन को अराजकता की ओर ले जा सकता है. उनके लिए साधन और लक्ष्य अलग नहीं थे. स्वतंत्रता चाहिए तो उसका रास्ता भी अहिंसक होना चाहिए.

बम का पंथ बनाम बम का दर्शन

महात्मा गांधी के लेख के जवाब में भगवती चरण बोहरा ने ‘The Philosophy of the Bomb’ अर्थात ‘बम का दर्शन’ लिखा. यह महज एक प्रतिक्रिया नहीं थी. यह क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा को समझाने का प्रयास था. इतिहासकार क्रिस मोफैट के शोध के अनुसार यह लेख भगवती चरण ने जनवरी 1930 में लिखा. चन्द्रशेखर आजाद से परामर्श किया. जेल में भगत सिंह ने इसके मसौदे को अनुमोदित किया. इसलिए ‘बम का दर्शन’ को केवल भगत सिंह से जोड़ देना भी सही नहीं होगा. उसे केवल महात्मा गांधी को दिया गया जवाब मानना भी अधूरा होगा.

यह उस समय के क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक दस्तावेज था, जिसमें हिंसा, प्रतिरोध, औपनिवेशिक सत्ता और स्वतंत्रता के साधनों पर अपना पक्ष रखा गया था. 26 जनवरी 1930 को इसे देश के विभिन्न हिस्सों में वितरित किया गया. सरकार ने इसे प्रतिबंधित साहित्य की श्रेणी में रखा. इसके वितरण को दंडनीय बनाने की कोशिश की. ‘बम का दर्शन’ में क्रांतिकारियों ने अपने पक्ष को जनता के सामने रखा. लिखा कि क्रांति का अर्थ अंधी हिंसा नहीं है. अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में बल का प्रयोग और अन्याय करने के लिए हिंसा एक ही चीज नहीं हैं. क्रांतिकारियों ने कांग्रेस की भूमिका पर भी तीखा सवाल किया. उनके मुताबिक कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का लक्ष्य स्वीकार तो किया, लेकिन ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष के बजाय क्रांतिकारियों की कार्रवाइयों की निंदा को प्राथमिकता दी.

दुर्गा भाभी महज सहयोगी नहीं

इस पूरे प्रसंग में दुर्गा भाभी को केवल भगवती चरण बोहरा या एक क्रांतिकारी की पत्नी कह देना उनके योगदान की अनदेखी होगी.क्रांतिकारी साहित्य में भगवती चरण की कलम बोल रही थी . जमीन पर दुर्गा भाभी उस संघर्ष को जी रही थीं. सच तो यह कि पति और अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ बौद्धिक विमर्श के साथ ही जमीनी कार्रवाइयों में भी तय जिम्मेदारियों के लिए वे समर्पित थीं. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि जेल में थे. बाहर क्रांतिकारी उन्हें छुड़ाने की योजना बना रहे थे. 28 मई 1930 को भगवती चरण बोहरा, सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन रावी के किनारे पहुंचे. वहां बम का परीक्षण किया जाना था. परीक्षण के दौरान भगवती चरण के हाथ में ही बम फट गया. वे बुरी तरह घायल हुए. वहीं उनकी मृत्यु हो गई.

पति को खोया, टूटने की जगह साथियों को दिया साहस

वैशम्पायन जो इस अभियान में शामिल थे, के मुताबिक भगवती चरण ने जान की परवाह किए बिना बम अपने हाथ में ले रखा था. घायल अवस्था में भी उनका आग्रह था कि उनकी मृत्यु भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को छुड़ाने की योजना में बाधक न बने. दुःखद खबर घर पहुंच चुकी थी. लेकिन दुर्गा भाभी बिल्कुल खामोश थीं. आजाद सिर झुकाए आंसू पोंछ रहे थे. साथी स्तब्ध थे. भरोसा करना मुश्किल था. लेकिन वहां मौजूद वैशम्पायन ने देखा और लिखा,” जिसने अपना पति खो दिया था, वे दुर्गा भाभी उठीं और सबको ढांढस बंधाने लगीं.” उन्हें पति के आखिरी दर्शन भी नसीब नहीं हुए. पुलिस के खतरे के चलते आजाद ने उनसे वहां न जाने का अनुरोध किया था. क्रांतिकारियों ने उनका अंतिम संस्कार भी गुप्त रूप से किया. आजाद ने उनके निधन पर कहा था—मेरा दाहिना हाथ कट गया.

सीधे एक्शन में

पति को खोने के सिर्फ पांच महीने बाद. संघर्ष में आगेआगे थीं. वे अब सहयोगी की भूमिका में नहीं बल्कि सीधे एक्शन में थीं. तब जबकि बेटा अभी छोटा था. 8 अक्टूबर 1930 की मध्यरात्रि को बम्बई की लैमिंगटन रोड पर उन्होंने एक यूरोपीय दंपत्ति पर गोली चलाई. पुलिस सार्जेंट टेलर और उनकी पत्नी इस हमले में घायल हुए. शोधकर्ता कामा मेकलीन के अनुसार इस कार्रवाई की योजना और क्रियान्वयन में दुर्गा देवी की प्रमुख भूमिका थी. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने के विरोध में उन्होंने यह कदम उठाया. निर्भीकता के साथ वे भगत सिंह और उनके साथियों से जेल में बराबर मिलती रहीं. उन्हें खाना, कपड़े, किताबें और चिट्ठियां पहुंचाती रहीं. उनकी फांसी के खिलाफ प्रदर्शनों में सक्रिय रहीं. फरवरी 1931 में गांधीजी से भी मिलीं और उनसे फांसी रद्द कराने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग करने का अनुरोध किया.

कभी नहीं रही पद पुरस्कार और नाम की चाहत

1932 में सरकार विरोधी गतिविधियों के आरोप में दुर्गा भाभी की गिरफ्तारी हुई. आजादी के बाद उन्होंने लखनऊ में गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल चलाया. उनका शेष जीवन भी सार्वजनिक प्रदर्शन या निजी यश की तलाश से दूर रहा.अंग्रेजी राज में वे खतरों से खेलती रहीं. आजाद भारत में उन्होंने अपने लिए किसी सम्मान या पद की तलाश नहीं की. क्रांतिकारी आंदोलन तो बलिदानों का पर्याय रहा है. लेकिन इस धारा में शायद ही अन्य उदाहरण मिले जहां पति पत्नी दोनों उस खतरनाक रास्ते एक साथ चले. दुर्गा भाभी का मुकाम इसलिए और भी ऊंचा है कि पति के बलिदान के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

लगातार संघर्ष बीच बेटे को पालने की जिम्मेदारी भी निभाती रहीं. अपने जीवन को शिकायत की कहानी नहीं बनने दिया. पति भगवती चरण, फिर साथी आजाद, भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव सब बिछड़ते गए. दुर्गा भाभी ने उन सबको सिर्फ नजदीक से देखा और जाना नहीं बल्कि हर कदम साथ दिया. जन्मदिन के बहाने सिर्फ साहसी दुर्गा भाभी नहीं, उस दौर को याद करने का मौका है जब आजादी की लड़ाई में कलम और पिस्तौल, विचार और कार्रवाई, नर नारी सबने अपनेअपने ढंग से इतिहास को बदलने की कोशिश की थी. दुर्गा भाभी ने उस इतिहास में अपना नाम किसी पद पुरस्कार और नाम की चाहत में नहीं, बल्कि आजादी के बड़े मकसद के लिए निःस्वार्थ भाव से सुनहरे शब्दों में दर्ज कराया.