एक बच्चा साइकिल चलाना सीख रहा है. वह बारबार पीछे मुड़कर देखता है. पीछे से कोई हाथ उसकी साइकिल पकड़े हुए है. बच्चा कहता है, मुझे छोड़ना मत. कुछ देर बाद, बिना बताए, वह हाथ साइकिल छोड़ देता है. बच्चा कुछ दूर तक चलता है, फिर पीछे देखता है और पाता है कि उसका शिक्षक बहुत पीछे खड़ा है. एक पल के लिए डर लगता है, फिर हैरानी होती है और फिर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. कुछ बहुत सुंदर घट चुका है. शिक्षक ने खुद को गैरजरूरी बनाकर अपना काम पूरा कर दिया. शायद सबसे अच्छी शिक्षा ऐसी ही होती है. महान शिक्षक अपने नाम से नहीं, अपने विद्यार्थियों की जिंदगी से याद रखे जाते हैं.

हम अक्सर शिक्षक को इस बात से मापते हैं कि विद्यार्थी कितना जानता है. लेकिन शायद इससे भी बड़ी कसौटी यह है कि शिक्षक के सामने न होने पर विद्यार्थी क्या कर सकता है. जवाब कोई भी बता सकता है. महान शिक्षक धीरेधीरे जवाब खोजने की समझ पैदा करता है. आदेश मानना सिखाना आसान है. असली शिक्षा तब शुरू होती है जब विद्यार्थी अपने फैसले खुद लेना सीखता है. दोनों में बड़ा फर्क है. केवल आदेश मानने वाला बारबार पीछे देखकर पूछता है कि अब क्या करूं. समझ रखने वाला एक दिन अपने पैरों पर चलना सीख जाता है.
‘हमारा अहंकार चाहता है लोग हमारे पीछे चलते रहें’
यहीं एक अजीब विरोधाभास है. हमारा अहंकार चाहता है कि लोग हमारे पीछे चलते रहें. लेकिन शिक्षक का ऊंचा उद्देश्य ऐसे इंसान तैयार करना है जो एक दिन उसके पीछे चलना छोड़ सकें. भीतर एक आवाज कहती है, अगर विद्यार्थी मुझसे सवाल कर रहा है तो मेरा अधिकार कम हो रहा है. दूसरी आवाज कहती है, अगर विद्यार्थी कभी मुझसे सवाल ही नहीं करता, तो शायद मैंने उसे पूरा सिखाया ही नहीं. पहली आवाज हमेशा विद्यार्थी की दुनिया के बीच में रहना चाहती है. दूसरी उसे धीरेधीरे अपनी दुनिया का केंद्र खुद बनने के लिए तैयार करती है.
कई बातें धीरेधीरे हमारे भीतर उतरती गईं
पत्रकारिता के इतने वर्षों में मैंने ज्ञान को इसी तरह एक व्यक्ति से दूसरे तक जाते देखा है. काम की सबसे उपयोगी सीख हमेशा ऐसी नहीं थी जिसे किसी कॉपी में लिखा जा सके. कई बातें धीरेधीरे हमारे भीतर उतरती गईं. किसी बात पर भरोसा करने से पहले एक बार और जांच लेना. केवल इसलिए लापरवाह न हो जाना कि बाकी सब लोग किसी बात को सच मान रहे हैं. खबर के पीछे छिपे इंसान को देखना. और फैसला अपना हो तो उसकी जिम्मेदारी भी अपनी मानना.
वर्षों बाद ऐसी सीख किसी दूसरे की कही हुई बात नहीं लगती. वह हमारे काम करने के तरीके का हिस्सा बन जाती है. शायद शिक्षक की सबसे अनोखी जीत यही है कि उसकी आवाज याद न रहे, लेकिन उसकी सीख हमारे भीतर जीवित रहे. लेकिन इससे भी कठिन परीक्षा तब आती है जब विद्यार्थी शिक्षक से आगे निकल जाता है. पुरानी परंपराओं में इसे शिक्षक की हार नहीं, उसकी सफलता माना गया. पेड़ अपने फल से यह नहीं कहता कि वह उसकी शाखाओं से छोटा ही रहे. लेकिन इंसान कभीकभी ऐसा करने लगता है. मातापिता को बेचैनी हो सकती है जब बच्चे को उनकी सलाह की जरूरत कम होने लगे.
शिक्षा खुद को जानने की यात्रा
कोई वरिष्ठ किसी युवा साथी को आगे बढ़ते देखकर तब तक खुश हो सकता है, जब तक उसी युवा को उससे ज्यादा पहचान न मिलने लगे. हम कहते हैं कि हम चाहते हैं लोग आगे बढ़ें, लेकिन भीतर कहीं यह इच्छा भी हो सकती है कि उनका आगे बढ़ना हमारे महत्व को साबित करता रहे. यहीं शिक्षा खुद को जानने की यात्रा बन जाती है. क्या मैं किसी को ज्ञान दे रहा हूं या उसे अपने ऊपर निर्भर बना रहा हूं? क्या मुझे खुशी होती है जब कोई मेरे बिना अपना काम संभाल लेता है? क्या मैं यह देख सकता हूं कि कोई मेरी सिखाई बात को इस्तेमाल करे, उसमें बदलाव करे, उसे मुझसे बेहतर बनाए और शायद मुझसे असहमत भी हो जाए? इन सवालों के जवाब किसी परीक्षा में नहीं मिलते. कभीकभी शिक्षक को सबसे आखिरी पाठ यही सीखना पड़ता है कि विद्यार्थी को जाने कैसे दिया जाए.
सच्चा शिक्षक पूजा नहीं, सवाल की ओर ले जाता है?
एक खतरा दूसरी तरफ भी है. विद्यार्थी शिक्षक को मूर्ति बना सकते हैं. किसी का बहुत सम्मान करतेकरते हम उसकी हर बात को हमेशा के लिए अंतिम सत्य मानने लगते हैं. लेकिन सच्चा शिक्षक पूजा नहीं, सवाल की ओर ले जाता है. अगर कल की सीख आज के सवाल का सामना नहीं कर सकती, तो उसे बिना सोचे दोहराते रहना सम्मान नहीं है. दुनिया बदलती है. ज्ञान बढ़ता है. परिस्थितियां बदलती हैं. कभीकभी शिक्षक के प्रति सबसे सच्ची निष्ठा शिक्षक से भी आगे जाने में होती है.
कल्पना कीजिए, 40 साल बाद कोई बूढ़ा शिक्षक अपने पुराने विद्यार्थी से मिलता है. वह पूछता है, जो मैंने तुम्हें सिखाया था, क्या वह सब याद है? विद्यार्थी कहता है, सब कुछ नहीं. शिक्षक मुस्कुराकर पूछता है, फिर क्या बचा? विद्यार्थी थोड़ी देर सोचकर कहता है, जब मुझे कुछ नहीं पता होता, तो सीखने में शर्म नहीं आती. और जब मुझे कुछ पता होता है, तो कोशिश करता हूं कि सामने वाला छोटा महसूस न करे. शायद इसके बाद शिक्षक को कुछ और सुनने की जरूरत नहीं है.
आपको कौनकौन से शिक्षक याद हैं?
अपनी जिंदगी को भी एक बार इस तरह देखिए. यह मत पूछिए कि आपको कौनकौन से शिक्षक याद हैं. पूछिए कि आपके व्यवहार में आज भी कौनसा शिक्षक जीवित है. कोई आपके काम करने की ईमानदारी में होगा. कोई आसान रास्ता न चुनने की आदत में. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कोई अपनी राय बदल लेने के साहस में. शायद कक्षा याद न हो, तारीख याद न हो, ठीकठीक शब्द भी याद न हों. फिर भी शिक्षक उन फैसलों के भीतर चल रहा हो सकता है जिन्हें आज आप पूरी तरह अपना समझते हैं. और अब सवाल हमारी तरफ मुड़ता है.
हमारी असली विरासत
उम्र के साथ लगभग हर इंसान किसी न किसी का शिक्षक बन जाता है, भले वह किसी स्कूल में न पढ़ाता हो. कोई छोटा हमसे सीख रहा होता है कि सफलता, निराशा, अधिकार, गलती और बदलाव को कैसे संभाला जाता है. शायद हमारी असली विरासत हमारी सलाह नहीं होगी. वह इंसान होगा जो हमारे साथ चलतेचलते किसी तरह का इंसान बनना सीख गया.
महान शिक्षक इसलिए हमेशा जीवित नहीं रहता कि उसके विद्यार्थी उसका नाम दोहराते रहें. वह इसलिए जीवित रहता है क्योंकि वर्षों बाद कहीं उसका विद्यार्थी एक बेहतर फैसला लेता है, जबकि शिक्षक उस कमरे में मौजूद भी नहीं होता. जब मैं किसी को रास्ता दिखाने के लिए इस दुनिया में नहीं रहूंगा, तब मेरे जीने का कौनसा हिस्सा ऐसा होगा जो मेरे बिना भी आगे चलना जानता होगा?



