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साहब हम बहुत गरीब हैं… जेब में फूटी कौड़ी नहीं बची. सरकारी अस्पताल में भी हर बार ड्रेसिंग के लिए पैसे मांगे जा रहे थे. जब पैसे खत्म हुए तो इलाज रुक गया और पत्नी की सांसें टूट गईं. मेरे पास इतने पैसे भी नहीं कि उसका अंतिम संस्कार कर सकूं, इसलिए मन बना लिया था कि शव को मां नर्मदा के बहते जल में बहा दूंगा… कम से कम मरने के बाद वह मछलियों का भोजन तो बन जाएगी. यह कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी. इतना ही नहीं, इस कहानी से शायद आप महसूस कर पाएंगे कि लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है. सिस्टम को चला रहे लोग कैसे गरीब लोगों की भावनाओं को कुचलते हैं. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि आप किस परिस्थिति से गुजर रहे हैं, उन्हें सिर्फ अपनी जेब भरने से मतलब होता है…

कलेजा चीर देने वाले यह शब्द संस्कारधानी कहे जाने वाले शहर जबलपुर के 51 वर्षीय लाचार पति श्याम विश्वकर्मा के हैं, जो गरीबी और बदहाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के आगे पूरी तरह टूट चुके थे. एक तरफ जहां पैसे के अभाव में एक मां की जान चली गई, वहीं दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए लाचार पति जब शव को नदी में फेंकने जा रहा था, तब इंसानियत का एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसने समाज का सिर फक्र से ऊंचा कर दिया.

क्या है पूरा मामला?

जबलपुर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर मगरमुंहा गांव के रहने वाले मजदूर श्याम की 41 वर्षिय पत्नी आरती विश्वकर्मा का छह महीने पहले सड़क हादसा हुआ था. पैर की सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने गैंगरीन फैलने के खतरे को देखते हुए नियमित ड्रेसिंग की सलाह दी थी. परिवार पाई-पाई को मोहताज था, लेकिन मां को बचाने के लिए नाबालिग बेटे राजू ने दिन-रात एक कर दिया. बेटे ने ढाबों और होटलों में जूठी प्लेटें धोकर, मजदूरी कर जो पैसे कमाए, उन्हें मां के इलाज में लगा दिया. करीब 5 से 7 हजार रुपये खर्च करने के बावजूद जब हालत बिगड़े, तो आरती को जिला अस्पताल के गैंगरीन वार्ड में भर्ती कराया गया.

श्याम का आरोप है कि सरकारी अस्पताल के गैंगरीन वार्ड में भी उनकी गरीबी का सौदा हुआ. वार्ड में हर बार ड्रेसिंग के एवज में 100-100 रुपये की मांग की जाती थी. दो दिन तक तो जैसे-तैसे पैसे दिए, लेकिन जब जेब खाली हो गई, तो स्वास्थ्य कर्मियों ने ड्रेसिंग करने से साफ मना कर दिया. 48 घंटे तक घाव की ड्रेसिंग न होने से उसमें कीड़े पड़ गए और तड़प-तड़पकर आरती की मौत हो गई.

अंतिम संस्कार के लिए नहीं थे पैसे

पत्नी की मौत के बाद जब श्याम के पास अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं बचे, तो वह बिना किसी को बताए शव लेकर अस्पताल से निकलने लगा. तभी एक मुस्तैद नर्स की नजर उस पर पड़ी. जब नर्स ने उसे रोका, तो श्याम ने बिलखते हुए अपनी खौफनाक मजबूरी बताई. मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी CMHO डॉ. नवीन कोठारी ने कहा कि मामला संज्ञान में आया है. गैंगरीन वार्ड में ड्रेसिंग के लिए कर्मचारियों को अलग से भत्ता दिया जाता है. अगर मरीजों से अवैध वसूली की बात सच साबित होती है या लिखित शिकायत मिलती है, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी.

सामाजिक संस्था ने कराया अंतिम संस्कार

मामले की नजाकत को देखते हुए स्वास्थ्य कर्मचारियों ने तुरंत सामाजिक संस्था गरीब नवाज कमेटी के इनायत अली से संपर्क किया. खबर मिलते ही इनायत अली अपने साथियों के साथ अस्पताल पहुंचे और लाचार परिवार को ढांढस बंधाया. इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए मुस्लिम समाज की इस संस्था ने पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ गौरीघाट मुक्तिधाम में आरती का अंतिम संस्कार संपन्न कराया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इनायत अली ने कहा कि अगर वक्त रहते श्याम को रोका न जाता तो गरीबी का यह दर्द एक बड़ी त्रासदी बन जाता.