इंटरनेशनल मार्केट में 9 सितंबर 2026 को उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष के अचानक तेज होने के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई. जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक समुद्री मार्ग से आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंजों में भारी ‘जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम’ जोड़ दिया है. दुनिया का लगभग 20 फीसदी पेट्रोलियम परिवहन इसी स्ट्रेट से होता है, जिससे सप्लाई में किसी भी रुकावट की खबर ने वैश्विक इक्विटी बाजारों, सरकारी बॉन्ड यील्ड और करेंसी मार्केट्स में खलबली मचा दी है.

भारत जैसे प्रमुख एनर्जी इंपोर्टर देश के लिए, जो अपनी आवश्यकता का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर का क्रूड सीधा मैक्रोइकोनॉमिक झटका है. कच्चे तेल की कीमतों में प्रति 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 1315 बिलियन डॉलर बढ़ जाता है, जिससे चालू खाता घाटा चौड़ा होता है और भारतीय रुपए पर डॉलर के मुकाबले भारी दबाव बनता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके अलावा, इंपोर्टेड फ्यूल की हाई कॉस्ट से खुदरा महंगाई के दोबारा भड़कने का जोखिम पैदा हो गया है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा आगामी मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं को झटका लग सकता है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमत कितनी हो गई है.
ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के पार
बुधवार को बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल फ्यूचर्स की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई. 24 जुलाई के बाद पहली बार इसने इस अहम स्तर को पार किया है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण इस इलाके से तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स $2.15 या 2.2 फीसदी बढ़कर 100.07 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि यूएस वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड 1.70 डॉलर या 1.83 फीसदी बढ़कर 94.73 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. पिछले महीने की शुरुआत से ब्रेंट की कीमतों में एकचौथाई की बढ़ोतरी हुई है. वास्तव में अमेरिका और ईरान के बीच छह महीने से चल रहे तनाव का कोई स्थायी समाधान निकलने की उम्मीद कम होती जा रही है.
क्यों बढ़ी कच्चे तेल की कीमत
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि U.S. युद्धपोतों पर हमले की कोशिशों के जवाब में वॉशिंगटन ईरानी तेल टैंकरों को निशाना बनाना जारी रखेगा. कोलंबिया यात्रा के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा कि ईरान लगातार अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर हमला करने की कोशिश कर रहा है, और हर बार जब वे ऐसा करेंगे या ऐसा करने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें अपने टैंकर गंवाने पड़ेंगे. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने मंगलवार को बताया कि अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत पर पिछले दो दिनों में मिसाइल हमले की कोशिशों के बाद, उसकी सेना ने 8 सितंबर को ईरान के पांच क्रूड ऑयल टैंकरों को नष्ट कर दिया. देश की सरकारी समाचार एजेंसी ने सेना के हवाले से बताया कि जॉर्डन के एयरडिफेंस सिस्टम ने ईरान की तरफ से दागी गई 20 बैलिस्टिक मिसाइलों में से 18 को रोक दिया, जबकि बाकी दो मिसाइलें सुनसान इलाकों में गिरीं. इसमें किसी के हताहत होने की खबर नहीं है.
क्या और बढ़ सकती हैं कीमतें?
गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि अगर मिडिल ईस्ट में शिपिंग पर हमले और तेज होते हैं, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं. फिर से शुरू हुई लड़ाई से कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावट की चिंता बढ़ गई है.
गोल्डमैन सैक्स में ग्लोबल कमोडिटीज रिसर्च के कोहेड, डान स्ट्रुवेन ने ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि हाल की घटनाओं से पता चलता है कि शिपिंग में बड़ी और गंभीर रुकावट का जोखिम एक अहम चिंता बन गया है.
स्ट्रुवेन ने कहा कि गोल्डमैन सैक्स को “कच्चे तेल की कीमतों में अच्छीखासी बढ़ोतरी” की उम्मीद है, साथ ही उन्होंने निवेशकों को सलाह दी कि वे नैचुरल गैस और रिफाइंड प्रोडक्ट्स की ऊंची कीमतों के हिसाब से तैयारी करें. उन्होंने कहा कि गैस और ईंधन में सप्लाई का झटका कच्चे तेल के बाजार की तुलना में ज्यादा बड़ा है.
तेल बाजार के लिए रुकावट की अवधि बहुत अहम होगी. जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि रुकावट का हर अतिरिक्त महीना ब्रेंट की कीमतों में लगभग 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी कर सकता है. अगर रुकावट तीन महीने तक चलती है, तो बैंक को उम्मीद है कि औसत मासिक ब्रेंट कीमतें लगभग 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी.
सिटी ने तीसरी तिमाही के लिए अपने औसत ब्रेंट क्रूड कीमत के अनुमान को 80 से बढ़ाकर 86 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है. ANZ के एनालिस्ट्स ने भी अपने शॉर्टटर्म ब्रेंट अनुमान को बढ़ाकर 95 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है और चेतावनी दी है कि अगर मिडिल ईस्ट में संघर्ष बढ़ता है तो कीमतें और बढ़ सकती हैं.



