भारत में गिग वर्कर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा अंशदान को लेकर नियमों पर चर्चा जारी है. सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि एग्रीगेटर कंपनियों से अंशदान उनके सालाना कारोबार के आधार पर लिया जाए या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर. दोनों तरीकों का अलगअलग कारोबार पर अलग असर पड़ सकता है. खासकर कैब, ऑटो और बाइक जैसी राइडहेलिंग सेवाओं पर भुगतान आधारित व्यवस्था का बोझ ज्यादा पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

दो तरीकों पर हो रहा विचार

एनालिस्ट और इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक श्रम और रोजगार मंत्रालय सामाजिक सुरक्षा अंशदान तय करने के लिए प्रति लेनदेन या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान पर आधारित व्यवस्था को मानक बनाने पर विचार कर रहा है. दूसरा विकल्प कंपनियों के सालाना कारोबार के आधार पर अंशदान लेने का है. विश्लेषकों और उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, प्रति लेनदेन या कामगारों के भुगतान से जुड़ा मॉडल उन कारोबारों पर ज्यादा वित्तीय बोझ डाल सकता है, जहां लेनदेन की संख्या बहुत ज्यादा लेकिन हर लेनदेन की कीमत कम होती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अलगअलग प्लेटफॉर्म के कारोबार मॉडल के कारण दोनों व्यवस्थाओं का असर भी अलग हो सकता है.

क्या है सामाजिक सुरक्षा कानून?

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों के सामाजिक सुरक्षा कोष में अंशदान देना अनिवार्य है. नियमों के अनुसार, किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में 90 दिन काम करने या कई एग्रीगेटर कंपनियों के साथ कुल 120 दिन काम करने के बाद गिग वर्कर इस योजना के तहत लाभ पाने का पात्र हो जाता है. एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना अंशदान का आकलन कर उसे हर साल जमा करना होता है. अब अंशदान की गणना किस आधार पर होगी, इसी को लेकर तकनीकी व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है.

1 से 2% कारोबार, भुगतान पर 5% तक अंशदान

संहिता की धारा 114 के तहत एग्रीगेटर को अपने सालाना कारोबार का 1 से 2% अंशदान देना होगा. हालांकि, यह राशि गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को किए जाने वाले कुल भुगतान के 5% से ज्यादा नहीं हो सकती. मंत्रालय विकल्प के तौर पर सीधे कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर भी फॉर्मूले पर विचार कर रहा है, जिसमें भुगतान का 5% तक अंशदान लिया जा सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी भुगतान आधारित व्यवस्था राइडहेलिंग यानी कैब, ऑटो और बाइक सेवाओं जैसे ज्यादा लेनदेन वाले कारोबारों पर काफी भारी पड़ सकती है.