राम मंदिर में 5 जून को चढ़ावा चोरी की जानकारी मिली थी, लेकिन 25 जून को 8 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई. यानी चोरी का पता चलने के 20 दिन बाद. क्या इन 20 दिनों में चढ़ावा चोरी के सबूत पूरी तरह मिटा दिए गए? यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है और पुलिस जांच शायद रामभक्तों को इन सवालों के जवाब दे सकता है, लेकिन अब तक की पड़ताल और रिकॉर्ड से एक निष्कर्ष निकल कर सामने आ रहा है और वे ये है कि सबूत मौजूद थे. चोरी का पता भी चल चुका था. इसके बावजूद भी शायद चोरी छिपे साक्ष्यों को मिटाया जा रहा था और से चढ़ावा चोरी होता रहा, अब ये करोड़ों भक्तों के साथ छल नहीं तो फिर क्या है?

इस पेचीदा मामले में और भी कई डेवलपमेंट हैं. आइए पूरी तारीख और सवालों वाली क्रोनोलॉजी सरल शब्दों में समझते हैं, जिनसे आपको कई जवाब मिल सकते हैं.

इस बात का अंदाजा अब सभी को है कि चढ़ावा चोरी का खेल हफ्तों या महीनों से नहीं वर्षों से चल रहा था. लेकिन किसी को खबर नहीं लगने दी गयी और जब इसकी भनक लगी तो गुप्त जांच शुरू हो गयी.

चार जून को ही ट्रस्ट को मिल गयी थी चोरी की जानकारी

सूत्रों के अनुसार, चोरी का मामला सार्वजनिक होने से पहले ही 4 जून को मंदिर ट्रस्ट को इसकी जानकारी मिल गई थी.इसके अगले ही दिन 5 जून को ही ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने निजी सुुरक्षाकर्मियों और पुलिस के साथ मिलकर अभियुक्तों के घरों से करीब 58 लाख रुपये बरामद कर लिए थे.

  • जबकि शेष रकम अभियुक्तों ने अपने बैंक खातों से निकलवाकर 8 जून तक ट्रस्ट को लौटा दी थी.
  • कई मामलों में अभियुक्तों ने लिखित रूप से रकम सौंपी जिस पर उनके परिवार के दस्तखत भी हैं.
  • कुल मिलाकर लगभग 80 लाख रुपये की रिकवरी होने के बावजूद करीब 20 दिन तक FIR नहीं करवाई गई.
  • जिससे ट्रस्ट पदाधिकारी चंपत राय और अनिल मिश्रा की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

सूत्रों का दावा है कि चढ़ावे की गिनती में लगे कुछ कर्मचारी लंबे समय से रकम में हेराफेरी कर रहे थे. इसीलिये आशंका है कि वास्तविक चोरी की रकम बरामद राशि से कहीं ज्यादा हो सकती है. जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क और संभावित बड़े वित्तीय नुकसान की भी पड़ताल कर रही हैं.

क्या ट्रस्ट गुपचुप तरीके से मामले को निपटाना चाहता था?

जांच के दौरान सबसे अधिक संदेह टिन्नू यादव पर जताया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि उसके पास चढ़ावे में दिए गए आभूषण और अन्य धातुएं भी मिली हैं. दिलचस्प ये है कि जब अन्य अभियुक्तों के घर से रिकवरी हो रही थी, तब पहले दिन टिन्नू के घर जांच टीम नहीं पहुंची.

दावा है कि पूछताछ के बाद उसने केवल एक लाख रुपये मंगवाकर दिए, जिससे ये सवाल उठ रहा है कि क्या उसे बाकी रकम और सामान ठिकाने लगाने का मौका मिला.

एक और चौंकाने वाली बात ये है कि रिकवरी के लिए ट्रस्ट के आधिकारिक वाहन का इस्तेमाल नहीं किया गया, क्योंकि नियम के हिसाब से इन गाड़ियों का इस्तेमाल करने पर रिकॉर्ड में लिखना पड़ता है इसलिए निजी वाहनों के जरिए रिकवरी की गई.

तो सवाल ये है कि क्या ट्रस्ट गुपचुप तरीके से चढ़ावा चोरी के मामले की जांच कर निपटाना चाहता था और क्या रकम की रिकवरी भी इसलिए की जा रही थी कि अगर कभी सवाल उठा तो ये दलील दी जा सकती है कि चढ़ावा तो मौजूद है, लेकिन भेद खुल गया. इसलिए अब ट्रस्ट की व्यवस्था पर ही लोगों का ट्रस्ट खत्म हो रहा है.

आइए जानें चोरी कांड की पूरी टाइमलाइन

  • 4 जून को ट्रस्ट महासचिव रहे चंपत राय ने पुलिस को चोरी की जानकारी दी. सवाल है कि चंपत राय को चोरी की जानकारी कैसे और किससे मिली?
  • 5 जून को अयोध्या पुलिस ने संदिग्धों के ठिकानों पर रेड मारी. क्या ये बात सिर्फ चंपत राय और अनिल मिश्रा को पता थी?
  • 5 जून को ही चोरी के 80 लाख बरामद हो गए. अब सवाल है कि चढ़ावा चोरी की बरामद रकम कहां रखी गई थी?
  • 5 जून को अनुकल्प मिश्रा के घर पर रेड पड़ी. चोरी की रकम भी मिली तो FIR दर्ज क्यों नहीं हुई?
  • इसके 8 दिन बाद 13 जून को सरकार ने SIT बनाने का ऐलान किया. फिर सवाल वही है कि जब FIR नहीं हुई थी तो क्या इस दौरान सबूत गायब किए गए?
  • 15 जून को SIT जांच के लिए अयोध्या पहुंची. यानी चोरी का पता चलने के 10 दिन बाद तो इन 10 दिनों में क्याक्या छिपाया गया?
  • 15 जून को ये पता चला कि 27 अप्रैल से पहले की CCTV फुटेज नहीं है. क्या गारंटी है कि उससे पहले चढ़ावा चोरी नहीं होती थी?
  • 25 जून को 8 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई. यानी चोरी का पता चलने के 20 दिन बाद. क्या इन 20 दिनों में चढ़ावा चोरी के सबूत पूरी तरह मिटा दिए गए?
  • 25 जून को ट्रस्ट की शिकायत पर FIR दर्ज हुई तो सवाल है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा पर सबूत मिटाने का केस क्यों नहीं किया गया?
  • 25 जून को SIT रिपोर्ट ट्रस्ट को दी गई. यानी जो जांच के घेरे में थे उसे SIT रिपोर्ट क्यों दी गई?
  • 27 जून को चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा हुआ, लेकिन पैसों की हेराफेरी में कोषाध्यक्ष का इस्तीफा क्यों नहीं गया?
  • 26 जून और 29 जून को आठों अभियुक्तों को कोर्ट में पेश किया गया, लेकिन पुलिस ने रिमांड क्यों नहीं मांगी? सवाल ये है कि पुलिस ने आरोपियों की रिमांड क्यों नहीं मांगी?

एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि क्या चढ़ावे की गणना से जुड़े संदिग्ध कर्मचारियों को कोई बचा रहा था और इसे लेकर भी ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर उंगली उठ रही है?

कुछ कर्मियों पर तीन महीने पहले ही हुआ था संदेह

सूत्रों के अनुसार, दान की गणना में लगे कुछ कर्मियों पर तीन महीने पहले ही संदेह जताया गया था और ऐसे कर्मचारियों को हटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई थी, लेकिन ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण कार्रवाई रुक गई. सवाल ये है कि वो पदाधिकारी कौन हैं जो इन चोरों को बचा रहे थे? अब जांच में सवाल उठ रहा है कि यदि उसी समय संदिग्ध कर्मियों को हटा दिया गया होता, तो क्या करोड़ों रुपये के चढ़ावे में कथित हेराफेरी रोकी जा सकती थी?

सूत्रों के मुताबिक दान की गणना में लगे कर्मचारियों की नियुक्ति स्टेट बैंक के जरिए एक आउटसोर्सिंग कंपनी ने की थी. अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष यादव, रमाशंकर मिश्रा, अवनीश और करुणेश शुक्ला समेत कई कर्मचारी लंबे समय से इसी काम में लगे थे. बैंक के एक अधिकारी को इनके काम पर संदेह हुआ, जिसके बाद उन्हें बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई.

बताया जाता है कि बैंक ने ट्रस्ट को भी इस प्रस्ताव की जानकारी दी थी. इसी दौरान संबंधित कर्मचारियों ने ट्रस्ट के पदाधिकारियों से उन्हें नहीं हटाने का अनुरोध किया. सूत्रों का दावा है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्रा और निर्माण सहायक गोपाल राव ने हस्तक्षेप करते हुए बैंक अधिकारियों से कहा कि किसी भी कर्मचारी को नहीं हटाया जाए. इसके बाद बदलाव की प्रक्रिया रोक दी गई.

जांच से जुड़े सूत्रों का मानना है कि कर्मचारियों को संरक्षण मिलने से उनका मनोबल बढ़ा और चढ़ावे में हेराफेरी का सिलसिला जारी रहा. यदि समय रहते कर्मचारियों को बदल दिया जाता तो चोरी का नेटवर्क टूट सकता था.

ब्यूरो रिपोर्ट, टीवी9 भारतवर्ष