शुरुआती कामयाबियों के बाद टीपू सुल्तान चाहता था कि उसे बादशाह माना जाए. उसके नाम का खुतबा पढ़ा जाए. अपने राज्य मैसूर में उसकी यह चाहत पूरी हो रही थी. लेकिन अन्य राजामहाराजा और विदेशी ताकतें उसे वैध शासक मानने को तैयार नहीं थे. मुगल सम्राट ने उसकी मांग ठुकरा दी और एक खिताब के जरिए उसे संतुष्ट करने की कोशिश की. जल्दी ही अपने नाम का खुतबा पढ़वाने के कारण टीपू की उससे भी ठनक गई. फिर टीपू ने कुस्तुनतुनिया में बैठे खलीफ़ा ओटोमन सुल्तान अब्दुल हमीद और मुस्लिम दुनिया की ओर रुख किया. चार जहाजों में 900 सदस्यीय मैसूर डेलिगेशन वहां भेजा गया. दुर्भाग्य से इनमें से 830 सदस्य प्लेग और अन्य बीमारियों की चपेट में आकर वहीं मर गए.

बचे लोगों की दो साल बाद ख़लीफा से मुलाकात मुमकिन हुई. बसरा की गलियोंबाजारों की दुकानों पर घूमते और मोलभाव करते डेलिगेशन के सदस्यों ने अपनी हैसियत का कतई ख़्याल न रख मुल्क की काफी बदनामी कराई. वापसी में टीपू ने उनकी खासी लानतमलामत की और उन्हें आदमखोर तक पुकारा. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पढ़िए बादशाहत के रुतबे के लिए बेताब टीपू की कोशिशों के दिलचस्प किस्से.
अन्य राजा नहीं मानते थे टीपू को वैध शासक
शासन के शुरुआती पांच सालों के युद्धों में बड़ी कामयाबी के बाद टीपू सुल्तान की सबसे बड़ी समस्या थी कि मैसूर की गद्दी पर उसका कोई वैध अधिकार अथवा उपाधि नहीं थी. उसके पिता हैदर अली भी इन्हीं हालात से गुजरे थे . राज्य की सत्ता संभालने के बाद भी प्रजा की नज़र में महाराजा इम्माडी कृष्णराज वोडेयार के एक प्रभावशाली जमींदार से ज्यादा हैदर की हैसियत नहीं मानी गई. फिर भी हैदर अली ने कभी प्रत्यक्ष रूप से महाराजा को हटाने या सार्वजनिक तौर पर उनके अनादर का प्रयास नहीं किया था. लेकिन टीपू ने इतनी उदारता नहीं बरती. उसने महाराजा की नाम मात्र की हैसियत छीन ली और सिंहासन पर पूरा कब्जा जमा लिया. शासन पर उसकी पकड़ और निरंकुश शासन के चलते मैसूर की प्रजा तो कुछ बोलने की हिमाकत नहीं करती थी लेकिन अन्य राजाओं और विदेशी उसे वैध शासक नहीं मानते थे.
पिता हैदर अली टीपू सुल्तान को दी गई शिक्षा से खुश नहीं था.
मुगल सम्राट की कानूनी हैसियत थी बरकार
सात दिसंबर 1782 को हैदर अली की मौत के बाद टीपू ने मैसूर की सत्ता संभाली. अगले पांच सालों में उसने अंग्रेजों और मराठों को परास्त किया. कृष्णा नदी के दक्षिणी इलाकों पर कब्जा किया. विद्रोही पालेगरो और कुर्गों को कुचला. दरबार के भीतर की साजिशों को ठिकाने लगाया. जाहिर है कि इन कामयाबियों ने उसका आत्मविश्वास काफी बढ़ा दिया था. वह अब खुद को एक सम्राट के तौर पर पेश करने लगा था. लेकिन वो खुद को कुछ भी कहता समझता रहा और उसके दरबारी चाहे जितनी हां हुजूरी करते रहे हों लेकिन मैसूर के बाहर की ताकतें एक वैध शासक के तौर पर उसे मान्यता एवं सम्मान देने को तैयार नहीं थे.
1707 में औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य का सूरज अस्त होने लगा था. टीपू के दौर तक तो लाल किले में बैठे मुगल सम्राट शाह आलम की हैसियत बेहद मामूली रह गई थी. लेकिन दिलचस्प है कि उसका शासन दिल्ली में पालम तक सिमटने और मालीफौजी ताकत सजावटी रह जाने के बाद भी कानूनी हैसियत बरकरार थी. मुल्क के तमाम हिस्सों में शासन का वैध अधिकार, कर वसूली और ख़िताब पदवियां मुगल सम्राट की सनद से ही हासिल होते थे.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
मराठे, निज़ाम, आर्कोट के नवाब सहित तमाम शासकों को शासन के अधिकार और उपाधियां मुगल दरबार से प्राप्त थे. जिन वोडेयार राजा का मैसूर राज्य टीपू ने हड़पा था, उन्हें भी मुगल सम्राट से शासन का अधिकार हासिल हुआ था. निज़ाम तो दक्कन में मुग़ल सम्राट के सूबेदार ही थे. यहां तक कि ईस्ट इंडिया कंपनी का 1857 की क्रांति के पहले तक अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफ़र से सनदें लेने का सिलसिला जारी रखा.
शाह आलम को नज़राने की पेशकश
टीपू ने 1783 में मुगल दरबार में अपनी पैरवी शुरू करवाई. दिल्ली में वकील मुकुंदराव ने दरबार में टीपू के लिए आर्कोट की सनद और सात हजार की मनसबदारी की गुजारिश की. एवज में सम्राट को नज़राना और काफी बड़ी धनराशि पेश करने का वादा किया. फ्रांसीसी प्रतिनिधि मोंटिनी ने भी उसकी जोरदार पैरवी की. उन दिनों अंग्रेजों की बढ़ती ताकत की काट के लिए सम्राट शाह आलम फ्रांसीसियों से गठबंधन की कोशिश में था, इसलिए टीपू को मोंटिनी के जरिए बात बन जाने की खासी उम्मीद थी. लेकिन अंग्रेज प्रतिनिधि मेजर ब्राउन और सम्राट के मंत्री मज़दउददौला ने टीपू की ख्वाहिश पूरी नहीं होने दी. हालांकि शाह आलम ने टीपू की पेशकश ठुकरा दी, फिर भी उसे खुश रखने के लिए ‘ उम्दतउलमुल्क मुबारकउददौलत टीपू सुल्तान फतेह अली ख़ान बहादुर हिज़बर जंग फदवी शाह आलम बादशाह गाज़ी’ की लंबी उपाधि प्रदान की.
एक वक्त शाहआलम को सजदा, फिर किया नजरअंदाज
मुग़ल सम्राट से मिले इस सम्मान ने टीपू को काफी ख़ुश किया. 23 जून 1785 के उसके पत्र को विक्रम संपत ने अपनी किताब “टीपू सुल्तान” में उद्धृत किया है, ” जब मुझे आपका शाही आदेश मिला तो मेरा सिर सम्मान से ऊंचा हो गया. अपनी महान दया से मुकुंदराव से जो खास उपहार भेजे, वे भी शुभ समय पर पहुंचे. मैं झुककर आपको आदर प्रकट करता हूं. मैंने मोहम्मद साहब के धर्म की मदद के लिए ,कुछ समय पहले ईसाइयों को सजा देने का काम शुरू किया था. वे मेरे साथ लड़ाई जारी नहीं रख पाए और उन्होंने विनती करके मुझसे शांति मांगी. यह बात सबको पता है ,इसलिए मुझे कुछ और कहने की जरूरत नहीं है. मेरा अब पक्का इरादा है कि मैं धर्म के दुश्मनों को पूरी तौर पर खत्म कर दूं. मैं आपसे सच्ची लगन दिखाने के लिए नज्र के तौर पर एक सौ इक्कीस सोने की मोहरे भेज रहा हूं. कृपया इसे स्वीकार करें. उम्मीद है कि आपके सम्मानजनक आदेश मिलते रहेंगे. इससे ज्यादा लिखना आदर के ख़िलाफ़ होगा.”
टीपू सुल्तान.
मुगल सम्राट की शान में अपने पत्र में टीपू ने भले कसीदे कसे हों लेकिन जल्दी ही उसने उन्हें नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. कुर्ग अभियान की कामयाबी के बाद उसने हुक्म दिया कि जुमा को सभी मस्जिदों में खुतबा मुगल सम्राट शाह आलम के नाम पर नहीं बल्कि उसके नाम पर पढ़ा जाएगा. मैसूर के उलेमाओं ने बिना नानुकुर इसे मान लिया. राज्य की मस्जिदों में दुआयें बादशाह टीपू सुल्तान बहादुर के नाम पर उसकी बेहतरी और तरक्की के लिए पढ़ी जाने लगीं. मुगल सम्राट के लिए यह सीधी चुनौती थी, लेकिन वे इतनी कमजोर हैसियत में थे कि उनके ऐतराज से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. पर इसके बाद भी टीपू संतुष्ट नहीं था. मैसूर में उसका एकछत्र राज था और वहां वो जो चाहे पूरा हो सकता था लेकिन अन्य राजा और ताकतें बादशाह के तौर पर उसे स्वीकार करने या सम्मान देने को तैयार नहीं थे.
वो भव्य सिंहासन जिस पर बैठना नसीब नहीं हुआ
दूसरे भले टीपू को बादशाह के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नहीं थे लेकिन खुद उसने सामर्थ्य प्रदर्शन के भरपूर प्रयास किए. इमामी नाम के चांदी के सिक्के जारी किए जिनमें एक तरफ लिखा था, ” हैदर की जीतों से अहमद का धर्म दुनिया में रोशन हुआदूसरी तरफ लिखा टीपू एकमात्र सच्चा राजा है.” अन्य शासकों के सिक्कों में एक तरफ मुगल सम्राट का जिक्र होता था लेकिन टीपू ने उनकी अनदेखी की. राज्य की अंदरूनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए शासन के हर क्षेत्र में अपनी मुहर लगाने के उपाय शुरू किए.
हैदर अली. फोटो: Wikipedia
वोडेयार राजवंश की हर निशानी खत्म करने की उसने कोशिश की. मौलूदी नाम से उसने अपना कैलेंडर बनवाया. गुर्राते हुए बाघ के आकार का जमीन से चार फीट ऊंचा जवाहरातों से सजा ठोस सोने का सिंहासन और उस तक पहुंचने के लिए चांदी की सीढ़ियां बनवाईं. ऊपर जवाहरातों से सजा पंखों को फैलाएं हुम्मा पक्षी सजा हुआ था. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जिस पर इस पक्षी की छाया पड़ती है, वह राजसी मुकुट तक पहुंचता है. हालांकि लगभग नौ फीट ऊंचे इस सिंहासन पर बैठना टीपू को कभी नसीब नहीं हो सका.
खलीफ़ा के दरबार में जम्बो डेलिगेशन
मुगल सम्राट से वैधता न मिलने पर टीपू ने कुस्तुनतुनिया में बैठे खलीफ़ा ओटोमन सुल्तान अब्दुल हमीद और मुस्लिम दुनिया की ओर रुख किया. 1784 में उथमन खान की अगुवाई में एक छोटा डेलिगेशन वहां का माहौल परखने के लिए भेजा गया और खलीफ़ा को दखल के लिए उकसाते हुए बताया गया कि अंग्रेजों के बंगाल, कर्नाटक सहित कई इलाकों पर कब्जा कर लिया है और वहां की मुस्लिम आबादी को ईसाई बना रहे हैं. 17नवंबर 1785 को गुलाम अली खान ने कुस्तुनतुनिया के लिए रवाना जिस भारी भरकम डेलिगेशन की अगुवाई की उसमें चार जहाजों में भरे नौ सौ लोग और बड़ी मात्रा में कीमती उपहारों के साथ चार हाथी भी थे.
हालांकि, इन हाथियों को भेंट किए जाने की नौबत नहीं आई, क्योंकि वे रास्ते में ही मर गए. मलवार तट से रवाना इस प्रतिनिधिमंडल के पास टीपू को बादशाह के तौर पर ख़लीफ़ा की मान्यता, उसके नाम पर खुतबा पढ़ने की इजाजत और इराक के मुख्य बंदरगाह बसरा की मांग और एवज में मंगलौर बंदरगाह को ख़लीफा को भेंट की पेशकश शामिल थी.
एकएक सिक्के के लिए हुज्जत
ख़लीफा और उसके वजीर से लगभग दो साल बाद इस डेलिगेशन की भेंट मुमकिन हो सकी. पहले वजीर ने मांगों के बारे में शुरुआती जानकारी ली. बसरा बंदरगाह की मांग सुनते ही दुभाषिया ही भड़क गया और चेतावनी के लहजे में कहा कि सोचो कहां और किससे बात कर रहे हो? फौरन ही खुशामदी लहजे में गुलाम अली ने बात पलटते हुए कहा कि हम तो अपने जहाजों की अच्छी देखभाल की मांग कर रहे हैं.
नजफ़ तक नहर खोदने की टीपू की पेशकश को भी व्यंग्यात्मक लहजे में ठुकरा दिया गया. अन्य अनेक मसलों में देखा जाएगा, का जवाब मिला. कदमकदम पर यह जाहिर हुआ कि कूटनीतिक बातचीत के मसले में डेलिगेशन के लीडर अनाड़ी हैं. रोजमर्रा की गतिविधियां भी राजनयिक शिष्टाचार के लिहाज से घटिया थीं. लुत्फ अली खान पालकी में बैठकर बसरा की गलियों में बारबार घूमते और गोमेद जैसे साधारण पत्थर खरीदते रहे. किराना सहित हर दुकान पर गए और एकएक तांबे के सिक्के के लिए हुज्जत कर मुल्क का नाम बदनाम किया.
टीपू की नज़र में वे आदमखोर !
बदनसीबी से उन्हीं दिनों कुस्तुनतुनिया में प्लेग फैला. अन्य बीमारियों की चपेट में भी लोग आए. जनवरी 1788 तक नौ सौ सदस्यीय डेलिगेशन के सिर्फ सत्तर सदस्य जीवित बचे. इधर टीपू की नाराजगी बढ़ती गई. वापसी में गुलाम अली खान की काफी लानतमलामत की गई. सभी पदों से उसकी छुट्टी करके टीपू ने उसे घर में नजरबंद कर दिया.
हिस्ट्री ऑफ मैसूर के लेखक हयवदन राव को विक्रम संपत ने अपनी किताब “टीपू सुल्तान” में उद्धृत करते हुए लिखा, “डेलिगेशन पर लगभग बीस लाख खर्च आया. सजी हुई तलवार और ढाल और वज़ीरों के दोस्ती भरे बधाई संदेशों के अलावा,बदले में प्राप्त हुई एक मात्र चीज, जैसा कि दबी हुई जुबान से टिप्पणी की गई थी, वह कुस्तुनतुनिया के सुल्तान का एक शाही फरमान और लगभग पांच रूपये मूल्य की जर्नल की पैंसठ आधी कापियां थीं! लेकिन टीपू ने अपनी इस मूर्खता और अज्ञानता का कोई दोष खुद पर नहीं लिया. सारा दोष गुलाम अली खान की अकुशलता और बेईमानी का बताया. एक शाम टीपू ने दरबार के एक अधिकारी ने “आदमखोरों” को बुलाने के लिए कहा. हैरानी से देख रहे अधिकारी को टीपू ने समझाया, ‘उन्हें बुलाओ जो कुस्तुनतुनिया में अपने साथियों को खा कर लौटे हैं!’



