मार्केट रेगुलेटर सेबी अब शेयर बाजार में ट्रेडिंग का दायरा बढ़ाने जा रहा है. सेबी चीफ तुहिन कांता पांडे ने हाल ही में साफ किया है कि कैपिटल मार्केट को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए लॉन्गटर्म फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स पर फोकस करना जरूरी है. फिलहाल बाजार में वीकली या मंथली यानी कम समय वाले सौदों का ही दबदबा है. लेकिन, अब सेबी चाहता है कि निवेशकों के लिए लंबे समय वाले डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स भी उपलब्ध हों. बाजार के जानकारों ने भी इस कदम का स्वागत किया है.

लंबे समय वाले सौदों में क्या है चुनौती?
मार्केट के जानकारों का कहना है कि लॉन्गटर्म डेरिवेटिव्स में सबसे बड़ी रुकावट इसका मौजूदा ढांचा है. एसोसिएशन ऑफ एनएसई मेंबर्स ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश श्रॉफ के मुताबिक, लंबे समय वाले डेरिवेटिव्स तभी लोकप्रिय होंगे जब ट्रेडिंग की लागत कम होगी और बड़े संस्थागत निवेशक इसमें दिलचस्पी दिखाएंगे. दुनिया भर के बाजारों में पेंशन फंड और एसेट मैनेजर अपने बड़े पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए लंबे समय वाले कॉन्ट्रैक्ट्स का ही इस्तेमाल करते हैं. इसे शॉर्टटर्म सट्टेबाजी के बजाय पोर्टफोलियो को जोखिम से बचाने वाले टूल के रूप में देखा जाना चाहिए.
सफलता के लिए मार्जिन कम करना बेहद जरूरी
भारत में लॉन्गटर्म डेरिवेटिव्स के ज्यादा न चलने की एक बड़ी वजह यहां लागू होने वाले कड़े मार्जिन नियम हैं. हेज फंड मैनेजर मयंक बंसल बताते हैं कि ऑप्शन ग्रीक्स के काम करने के तरीके के कारण, लंबी अवधि के ऑप्शंस में कम अवधि के मुकाबले रिटर्न काफी कम होता है. ऊपर से, भारत में लंबे समय वाले इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर मार्जिन बहुत ज्यादा है. सामान्य इंडेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए यह 9.3 प्रतिशत है, जबकि लंबी अवधि के लिए इसे 17.7 प्रतिशत रखा गया है. एक्सपोजर मार्जिन भी 5 प्रतिशत है, जो निवेशकों को निराश करता है.
मार्केट मेकर्स को देना होगा फायदा
किसी भी नए प्रोडक्ट को सफल बनाने में मार्केट मेकर्स की अहम भूमिका होती है. क्रॉस सीज कैपिटल के एमडी राजेश बाहेती का कहना है कि लंबे समय वाले प्रोडक्ट्स की सफलता के लिए ऐसे डेजिग्नेटेड मार्केट मेकर्स चाहिए जिन्हें दोनों तरफ के कोट्स देने पर फायदा मिले. यह फायदा लेनदेन की लागत और एसटीटी से ज्यादा होना चाहिए. बीएसई के एमडी और सीईओ सुंदररामन आर भी सेबी के इस कदम का समर्थन करते हैं. उनका मानना है कि मौजूदा एसटीटी ढांचे और मार्जिन नियमों को तार्किक बनाने से इन प्रोडक्ट्स को अपनाने में तेजी आएगी.
इंडेक्स से शुरुआत करना बेहतर
जानकारों का सुझाव है कि शुरुआत में ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स सिर्फ इंडेक्स डेरिवेटिव्स में ही लाए जाने चाहिए क्योंकि इनमें उतारचढ़ाव कम होता है, जिससे मैनिपुलेशन का खतरा घट जाता है. बाद में लिक्विडिटी बढ़ने पर चुनिंदा शेयरों में इसे लागू किया जा सकता है. लेकिन, क्या लॉन्गटर्म कॉन्ट्रैक्ट्स भी वीकली एक्सपायरी जितना वॉल्यूम ला पाएंगे? एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मार्जिन कम होने के बावजूद लंबी अवधि के सौदे वीकली या मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स की बराबरी नहीं कर सकते. जुलाई में सेबी रिटेल निवेशकों को डेरिवेटिव्स में होने वाले नुकसान पर अपनी रिपोर्ट भी जारी करने वाला है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि सेबी किस तरह बाजार की इन दिक्कतों को दूर कर लॉन्गटर्म कॉन्ट्रैक्ट्स को कामयाब बनाता है.



