बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एक कर्मचारी की विधवा को उनके पति की मौत के बाद प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी मिली. कई साल बाद, उन्होंने बैंक की शुरू की गई एक बार की पेंशन स्कीम के तहत फ़ैमिली पेंशन की मांग की, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने उनका दावा खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि वह तय समयसीमा के अंदर विकल्प चुनने में नाकाम रहीं और समय पर आवेदन जमा करने का सबूत भी नहीं दे पाईं.

यह मामला स्वर्गीय रमेश चंद की विधवा सावित्री देवी से जुड़ा है. रमेश चंद 1 मार्च 1985 को बैंक ऑफ महाराष्ट्र में शामिल हुए थे और 12 फरवरी 2006 को नौकरी के दौरान उनकी मौत हो गई थी. उस समय, वह कॉन्ट्रिब्यूटरी प्रोविडेंट फंड स्कीम के दायरे में आते थे. बैंक ने उनकी मौत पर मिलने वाले प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का भुगतान 24 जुलाई 2006 को कर दिया था.

विवाद तब शुरू हुआ जब बैंक ने अगस्त 2010 में पुराने कर्मचारियों और उनके परिजनों के लिए पेंशन स्कीम चुनने का एक एकमुश्त मौका निकाला. इस स्कीम में आवेदन करने की अंतिम तिथि 18 अक्टूबर 2010 थी. सावित्री देवी का फॉर्म 2 मार्च 2011 का था, जो डेडलाइन बीतने के कई महीने बाद जमा किया गया. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

विधवा पात्र थीं, लेकिन पेंशन के लिए सख्त डेडलाइन

18 अगस्त के सर्कुलर में उन कर्मचारियों के परिवारों को शामिल किया गया था जो 29 सितंबर 1995 से पहले बैंक में शामिल हुए थे और उस तारीख के बाद नौकरी के दौरान जिनकी मौत हो गई थी. इसलिए, चंद की विधवा पात्र कैटेगिरी में आती थीं.

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पात्रता ही काफी नहीं थी. स्कीम के तहत पात्र परिवारों को तय ‘एनेक्जर III’ ऑप्शन फॉर्म 18 अक्टूबर 2010 तक जमा करना था. ब्रांच को भी फॉर्म मिलने की पुष्टि करनी थी, एक कॉपी अपने पास रखनी थी और तय प्रशासनिक चैनल के जरिए फॉर्म आगे भेजना था. सर्कुलर में साफ तौर पर कहा गया था कि जिन परिवारों के फॉर्म तय समय के अंदर नहीं मिलेंगे, वे पेंशन या फैमिली पेंशन के लिए पात्र नहीं होंगे.

देवी ने 2 मार्च 2011 के ऑप्शन फॉर्म का हवाला दिया, जो समयसीमा खत्म होने के कई महीने बाद का था. उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रोविडेंट फंड में बैंक के योगदान को ब्याज और पेंशन स्कीम के तहत जरूरी अन्य रकम के साथ वापस करने को तैयार हैं. लेकिन कोर्ट को एक और समस्या दिखी. ऐसा कोई सबूत नहीं था—जैसे ब्रांच की तरफ से मिली रसीद, रिसीविंग स्टैम्प या उस समय का कोई रिकॉर्ड—जो यह साबित करे कि फॉर्म असल में 2 मार्च, 2011 को बैंक में जमा किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऑप्शन का समय पर इस्तेमाल करना सिर्फ एक प्रक्रियात्मक जरूरत नहीं थी. यह स्कीम के तहत पेंशन का अधिकार पाने के लिए जरूरी था.

नहीं शुरू हो सकता क्लेम

देवी ने जनवरी 2014 में बैंक की ब्रांच और हेड ऑफिस के बीच हुई अंदरूनी बातचीत का भी हवाला दिया. ब्रांच ने उनके ऑप्शन फॉर्म की एक कॉपी हेड ऑफिस भेजी थी और गाइडेंस मांगी थी, जबकि हेड ऑफिस ने जरूरी डॉक्यूमेंट्स लेने और कागजात पर विचार के लिए दोबारा जमा करने को कहा था.

हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि इस बातचीत का मतलब यह नहीं था कि बैंक ने उनका पेंशन ऑप्शन मान लिया था या देरी को माफ कर दिया था. ब्रांच ने खुद यह रिकॉर्ड किया था कि उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि फ़ॉर्म पहले हेड ऑफिस भेजा गया था.

कोर्ट ने माना कि मामले को संभालने में बैंक की तरफ से प्रशासनिक लापरवाही और फैसला न ले पाने की कमी दिखी. लेकिन कोर्ट ने कहा कि ऐसी कमियों से पेंशन का ऐसा अधिकार नहीं बन सकता जो स्कीम के तहत उपलब्ध ही नहीं था.

कोर्ट ने यह भी पाया कि देवी के मामले में बहुत ज्यादा देरी हुई थी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि बातचीत 2014 में हुई थी, लेकिन वह 2025 तक हाई कोर्ट नहीं गईं. 2024 में उनकी बाद की अर्जी और RTI एप्लीकेशन से उस दावे को फिर से शुरू नहीं किया जा सकता था जो एक बार मिलने वाले ऑप्शन पर आधारित था, जिसका इस्तेमाल 2010 में किया जाना था.

कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि देवी पेंशन या फैमिली पेंशन स्कीम के लिए कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार साबित करने में नाकाम रहीं. कर्मचारी फायदों से जुड़े मामलों में, यह केस एक व्यावहारिक बात बताता है कि जब कोई पेंशन या फायदा स्कीम एक बार ऑप्शन चुनने का मौका देती है, तो सिर्फ एलिजिबिलिटी लेटर रखना काफी नहीं है. तय समय सीमा के अंदर ही जरूरी फॉर्म जमा करना चाहिए, और आवेदक को तारीख वाली रसीद या जमा करने का कोई और सबूत अपने पास रखना चाहिए.