अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसने कोई वसीयत नहीं बनाई है, तो परिवार के सामने कई कानूनी और वित्तीय सवाल खड़े हो जाते हैं. सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि मृतक का इनकम टैक्स रिटर्न कौन दाखिल करेगा और बैंक या डीमैट खाते में मौजूद नॉमिनी का क्या अधिकार होगा. टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसी स्थिति में नॉमिनी संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता, बल्कि वह केवल कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से ट्रस्टी की भूमिका निभाता है.

कब भरना होगा मृतक का ITR?

आयकर कानून के अनुसार, अगर मृतक की आय निर्धारित बेसिक छूट सीमा से अधिक है या वह अन्य निर्धारित शर्तों को पूरा करता है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी को उसकी ओर से ITR दाखिल करना होगा. यदि व्यक्ति ने नया टैक्स सिस्टम चुना था तो बेसिक छूट सीमा 4 लाख रुपये है, जबकि पुराने टैक्स सिस्टम में यह उम्र के अनुसार अलगअलग होती है. इसके अलावा, कुछ मामलों में आय कम होने के बावजूद भी ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है, जैसे बिजली पर 1 लाख रुपये से अधिक खर्च या विदेश यात्रा पर 2 लाख रुपये से ज्यादा खर्च.

बिना वसीयत क्या होगा?

यदि मृतक ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी है, तो उसकी संपत्ति उसकी मृत्यु के साथ ही लागू व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून के अनुसार कानूनी वारिसों में चली जाती है. ऐसी स्थिति में केवल 1 अप्रैल से मृत्यु की तारीख तक की अवधि के लिए एक ही ITR दाखिल करना होता है. इसके बाद संपत्ति से होने वाली आय संबंधित कानूनी वारिसों के हाथ में टैक्स योग्य मानी जाएगी.

नॉमिनी और कानूनी वारिस में क्या अंतर है?

विशेषज्ञों के अनुसार, बैंक या डीमैट खाते में नॉमिनी का नाम होना सिर्फ संपत्ति के हस्तांतरण की प्रक्रिया को आसान बनाता है. इससे नॉमिनी उस संपत्ति का अंतिम मालिक नहीं बन जाता. अंतिम अधिकार हमेशा कानूनी उत्तराधिकारियों का होता है और संपत्ति का बंटवारा संबंधित उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाता है.

क्यों जरूरी है समय पर ITR दाखिल करना?

टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मृतक के नाम पर ITR दाखिल करना जरूरी है और ऐसा नहीं किया जाता, तो भविष्य में टैक्स नोटिस, रिफंड में देरी या अन्य कानूनी दिक्कतें आ सकती हैं. इसलिए परिवार के कानूनी उत्तराधिकारी को समय रहते आयकर पोर्टल पर खुद को कानूनी प्रतिनिधि के रूप में पंजीकृत कर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए.