साल 2018 में एक फिल्म आई थी. नाम था KGF. वैसे तो यह पिक्चर की स्टोरी काल्पनिक थी मगर इसकी कहानी अलसी कोलार गोल्ड फील्ड्स से प्रेरित थी. सोने की खदान के लिए फेमस या फील्ड दशकों पहले बंद हो गई. फिल्म में एक मजदूर दिखाया है जो आगे चलकर रॉकी भाई बन जाता है. नायक बनता है दुश्मनों को मारता पीटता है…इसका दूसरा पार्ट भी 2022 में आ जाता है. फिल्म तो सिनेमा घरों में सफल रही मगर इसके बाद गोल्ड माइनिंग को लेकर एक नए सिरे से चर्चा शुरू हुई. जो कि आज और तेज हो गई है. इसका प्रमुख कारण है कि भारत में पहली प्राइवेट गोल्ड माइन खुल गई है. जी हां आध्र प्रदेश में यह हुआ है. भारत में निजी गोल्ड माइनिंग के नए दौर की शुरुआत आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव से हुई है, जिसे अब स्वर्णगिरी के नाम से जाना जा रहा है. करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से विकसित यह परियोजना देश की पहली बड़े पैमाने की निजी सोना खदान मानी जा रही है. शुरुआती सर्वेक्षणों में यहां 13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि हुई है, जबकि आगे की खोज के बाद यह आंकड़ा 42 टन तक पहुंचने की संभावना जताई गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि निजी कंपनियां कितना सोना निकाल सकती हैं, इसके लिए नियम क्या हैं और क्या देश के दूसरे हिस्सों में भी निजी गोल्ड माइनिंग का रास्ता खुल सकता है. भारत में गोल्ड माइनिंग का इतिहास क्या रहा है. आइए इन सभी पहलुओं पर विस्तार से बात करते हैं.

वैसे तो किसी भी निजी कंपनी को अपनी इच्छा के अनुसार असीमित मात्रा में सोना निकालने की अनुमति नहीं होती. खनन की मात्रा पूरी तरह उस भंडार पर निर्भर करती है जिसे सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रमाणित और स्वीकृत किया गया हो. इसके बाद खनन योजना तैयार की जाती है, जिसमें यह तय होता है कि हर साल कितना अयस्क और उससे कितना सोना निकाला जा सकेगा. जोन्नागिरी परियोजना इसका उदाहरण है. यहां संभावित भंडार 42 टन तक पहुंच सकता है, लेकिन पहले साल उत्पादन केवल लगभग 400 किलोग्राम रहने का अनुमान है. बाद के वर्षों में यह बढ़कर 900 किलोग्राम से एक टन सालाना तक पहुंच सकता है. यानी कंपनियां केवल स्वीकृत उत्पादन योजना के भीतर रहकर ही खनन कर सकती हैं.
निजी गोल्ड माइनिंग के लिए क्या हैं नियम?
भारत में सोना समेत सभी प्रमुख खनिजों का खनन Mines and Minerals Act, 1957 और उससे जुड़े नियमों के तहत होता है. निजी कंपनियों को खनन शुरू करने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है.
- राज्य सरकार खनिज ब्लॉक की नीलामी करती है और सफल बोलीदाता को अधिकार मिलता है.
- कंपनी को पहले विस्तृत अन्वेषण और भंडार का वैज्ञानिक आकलन करना होता है.
- माइनिंग लीज मिलने के बाद केवल स्वीकृत भंडार और निर्धारित उत्पादन योजना के अनुसार ही खनन किया जा सकता है.
- कंपनी को रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, जिला खनिज फाउंडेशन और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट जैसे शुल्क जमा करने होते हैं.
- पर्यावरण, वन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी मंजूरियां अनिवार्य होती हैं.
- उत्पादन, सुरक्षा और पर्यावरण मानकों की निगरानी राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियां करती हैं.
यानी निजी कंपनियों को केवल खनन का अधिकार मिलता है, खनिज संसाधनों का स्वामित्व राज्य के पास ही रहता है.
भारत गोल्ड माइनिंग में पीछे क्यों रह गया?
आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है, लेकिन उत्पादन के मामले में काफी पीछे है. दिलचस्प बात यह है कि 1970 और 1980 के दशक में भारत का सालाना उत्पादन करीब 5 टन था, जो उस समय चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के बराबर माना जाता था. मगर अब भारत को अपनी जरूरत का करीब 99 प्रतिशत सोना इंपोर्ट ही करना पड़ता है. भारत गोल्ड माइनिंग में इतना पीछे क्यों रह गया इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला, देश में सोने की खोज और उससे जुड़ी रिसर्च गतिविधियों पर बहुत कम ध्यान दिया गया. दूसरा, खनन से जुड़ी मंजूरियों और नियामकीय प्रक्रियाओं में लंबा समय लगता रहा. दशकों तक सरकारी नीति का फोकस कोयला, लौह अयस्क, तांबा और जस्ता जैसे खनिजों पर रहा, जिन्हें औद्योगिक विकास के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया. 1990 के दशक में निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खुलने के बावजूद अनुमति और स्वीकृति प्रक्रियाओं ने निवेश की गति को धीमा रखा.
भारत में गोल्ड माइनिंग का इतिहास
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, भारत में सोना खनन का इतिहास हजारों साल पुराना है. माना जाता है कि देश में पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व से ही सीमित स्तर पर सोना निकाला जाता रहा है. हालांकि आधुनिक गोल्ड माइनिंग की पहचान मुख्य रूप से कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड से जुड़ी रही. Kolar Gold Fields को दुनिया की सबसे प्रसिद्ध सोना खदानों में गिना जाता था. यह क्षेत्र दक्षिण भारत के धारवाड़ क्रेटन और कोलार ग्रीनस्टोन बेल्ट में स्थित है, जिसकी भूगर्भीय संरचना दुनिया की कई बड़ी सोना खदानों जैसी मानी जाती है. 1880 के दशक में शुरू हुई इस खदान ने लगभग 120 वर्षों के संचालन के दौरान 800 टन से अधिक सोना उत्पादन किया. शुरुआती दो दशकों में यहां निकाले गए अयस्क की औसत ग्रेड 45 ग्राम प्रति टन थी, जबकि पूरे जीवनकाल में औसत ग्रेड करीब 15 ग्राम प्रति टन रही, जो वैश्विक मानकों के हिसाब से बेहद ऊंची मानी जाती है.
सोर्स कोलार गोल्ड, WGC
कोलार क्षेत्र में मुख्य रूप से चैंपियन, मैसूर और नंदीदुर्ग खदानों से सोना निकाला जाता था. समय के साथ अयस्क की गुणवत्ता घटने लगी और उत्पादन लागत बढ़ती गई. वर्ष 2001 में आखिर में कोलार गोल्ड फील्ड को बंद करना पड़ा. उस समय तक खनन की गहराई लगभग 3,200 मीटर तक पहुंच चुकी थी, जो इसे दुनिया की सबसे गहरी सोना खदानों में शामिल करती थी. खदान का नेटवर्क 7.3 किलोमीटर लंबाई तक फैला हुआ था और इसमें लगभग 100 शाफ्ट तथा 1,400 किलोमीटर से अधिक भूमिगत सुरंगें थीं. कोलार के बंद होने के बाद भारत का घरेलू सोना उत्पादन तेजी से घट गया और देश आयात पर अधिक निर्भर होता चला गया.
आंध्र प्रदेश के बाद इन राज्यों में खुल सकती हैं निजी सोना खदानें
- ओडिशा में भी है संभावना आंध्र प्रदेश के बाद ओडिशा को भारत का अगला प्रमुख सोना उत्पादक राज्य माना जा रहा है. ऑर्गनाइजर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, में राज्य के देवगढ़, क्योंझर और मयूरभंज जिलों में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों के दौरान सोने के भंडार के संकेत मिले हैं. शुरुआती आकलनों के अनुसार इन क्षेत्रों में लगभग 1,685 किलोग्राम सोने के अयस्क की संभावना जताई गई है. विस्तृत ड्रिलिंग और आगे की जांच के बाद यह भंडार इससे कहीं अधिक बड़ा साबित हो सकता है. राज्य सरकार भविष्य में गोल्ड ब्लॉकों की नीलामी पर विचार कर रही है. यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो ओडिशा लौह अयस्क के साथसाथ सोना उत्पादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
- कर्नाटक में कोप्पल और रायचूर में बढ़ी उम्मीदें कर्नाटक के कोप्पल और रायचूर क्षेत्रों में भी सोने की मौजूदगी के संकेत मिले हैं. शुरुआती अध्ययनों में कुछ स्थानों पर 12 से 14 ग्राम प्रति टन तक सोने की ग्रेडिंग दर्ज होने की जानकारी सामने आई है, जिसे वैश्विक मानकों के अनुसार बेहतर गुणवत्ता माना जाता है. हालांकि, इन संभावित खनन क्षेत्रों का एक हिस्सा वन क्षेत्र में आता है, जिसके कारण पर्यावरण और वन मंत्रालय से मंजूरी प्राप्त करना बड़ी चुनौती हो सकता है. ऐसे में यहां व्यावसायिक खनन शुरू होने में समय लग सकता है.
- मध्य प्रदेश के महाकौशल बेल्ट पर टिकी नजरें अगस्त 2025 से ही मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की महाकौशल बेल्ट भी सोने की संभावनाओं को लेकर चर्चा में है. शुरुआती सर्वेक्षणों में यहां 2 से 5 ग्राम प्रति टन तक सोने की मात्रा मिलने के संकेत मिले हैं. यदि आगे के सर्वेक्षणों में इन संकेतों की पुष्टि होती है, तो यह क्षेत्र सोना और तांबा आधारित उद्योगों के विकास के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. फिलहाल यह क्षेत्र खोज और मूल्यांकन के शुरुआती चरण में है.
क्या भारत की सोने पर आयात निर्भरता कम होगी?
भारत हर साल लगभग 700 से 900 टन सोने का आयात करता है, जबकि घरेलू उत्पादन अभी केवल कुछ टन के आसपास है. ऐसे में जोन्नागिरी जैसी परियोजनाएं प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व जरूर रखती हैं, लेकिन अकेले इनके दम पर आयात निर्भरता में बड़ा बदलाव नहीं आएगा. फिर भी यदि आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में नए भंडार विकसित होते हैं और निजी निवेश बढ़ता है, तो अगले दशक में भारत का घरेलू उत्पादन कई गुना बढ़ सकता है. इससे न केवल आयात बिल कम होगा बल्कि खनन, प्रसंस्करण और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. भारत में निजी गोल्ड माइनिंग की यह शुरुआत केवल एक नई खदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस क्षेत्र के पुनर्जागरण की शुरुआत हो सकती है. जिस तरीके से ग्लोबल टेंशन के माहौल में भारत सरकार ने भी सोना कम खरीदने की अपील की क्योंकि इंपोर्ट बिल बढ़ रहा था. ऐसे में अगर देश में ज्यादा खदाने होंगी तो वह सरकारी खजाने के लिए भी गुड न्यूज साबित होगी.



