यूपी विधानसभा चुनाव2027 को लेकर सियासी जंग हर दिन तेज होती जा रही है. इसी कड़ी में दलित वोट बैंक को लेकर सबने अपनीअपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है. इसे लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ती जा रही है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कभी बसपा का मजबूत आधार रहे इस वोट बैंक के बीच अब सपा और कांग्रेस अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही हैं. दोनों की नजर उस सियासी स्पेस पर है, जो पिछले कुछ चुनावों में बसपा के कमजोर होने से बना है.

इस दिशा में कांग्रेस ने बाकायदा अभियान शुरू करने का फैसला किया है. कांग्रेस 21 अगस्त से राज्य में सामाजिक न्याय सम्मेलन करने जा रही है. सूबे की राजधानी लखनऊ से शुरू होने वाले अभियान के जरिए कांग्रेस दलित और ओबीसी मतदाताओं तक पहुंच बनाने के साथ ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे मुद्दों को प्रमुखता देने की तैयारी में है.
प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में होने वाले सम्मेलन में प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश अध्यक्ष अजय राय व पिछड़ा वर्ग विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. अनिल जयहिंद सहित अन्य वरिष्ठ नेता दलितों व पिछड़ों को संविधान और आरक्षण के मुद्दे को लेकर पार्टी से जोड़ने का प्रयास करेंगे.हर विधानसभा क्षेत्र में जाने का प्लान है. फिलहाल पहले चरण में लखनऊ, कानपुर और झांसी में सम्मेलन होगा. लखनऊ के बाद 22 अगस्त को कानपुर और 23 अगस्त को झांसी में सम्मेलन होगा.
कांग्रेस का सामाजिक न्याय सम्मेलन
कांग्रेस की रणनीति महज सम्मेलन तक सीमित नहीं है बल्कि दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश का प्रभारी बनाकर अपनी रणनीति के संकेत दे दिए हैं कि 2027 की लड़ाई में दलित सामाजिक समीकरण कितना अहम है. लंबे समय बाद कांग्रेस अपने पुराने दलित जनाधार को वापस पाने की कोशिश में है.
लोकसभा चुनाव2024 में सपाकांग्रेस गठबंधन को दलित मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन मिला था. अब दोनों पार्टियों की कोशिश इस समर्थन को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखने और उसे पहले से भी ज्यादा मजबूत करने की है.
दलित नेताओं के बीच सपा भी सक्रिय
समाजवादी पार्टी भी दलित वोट बैंक को लेकर लगातार काम कर रही है. पार्टी नेतृत्व दलित समाज से जुड़े नेताओं से मुलाकात कर रहा है. इन नेताओं को पार्टी कार्यालय बुलाकर मीटिंग की जा रही है. इतना ही नहीं संगठन से जुड़े दलित नेताओं से भी संवाद बढ़ाया जा रहा है. सपा की कोशिश इन नेताओं को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए व्यापक सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा बनाने की है.
क्या है सपा की पूरी रणनीति?
सपा ये मैसेज देना चाहती है कि दलित हितों की राजनीति का विकल्प महज बसपा ही नहीं है. इसके लिए सपा दलित नेताओं को संगठन में सक्रिय भूमिका देने के साथ ही उनके जरिए समाज में पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है. ऐसे में सपाकांग्रेस गठबंधन की स्थिति में यह रणनीति काफी महत्वपूर्ण हो सकती है. दोनों की कोशिश मुस्लिमयादव के पार जाकर दलितों और ओबीसी के बीच पकड़ मजबूत करने की है.
राजनीतिक विश्लेषण का मानना है कि अगर दलितमुस्लिमओबीसी समीकरण मजबूत होता है तो यह 2027 के चुनाव में विपक्षी गठबंधन की ताकत बढ़ा सकता है. दरअसल प्रदेश में दलित मतदाता करीब 21 22 फीसदी हैं. यही वजह है कि 2027 के चुनाव में यह वर्ग किसी भी दल की जीतहार में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. ऐसे में 2027 के रण में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने में सपाकांग्रेस कितनी कामयाब होती है? साथ ही क्या 2024 में दिखा दलित समर्थन विधानसभा चुनाव में भी कायम रह पाता है?



