उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा बदलाव करते हुए महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को प्रदेश का प्रभारी बनाया है. उनके साथ गुजरात के जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सहप्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है. पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सरकार बनाना है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BJP को बड़ा झटका लगा था.

पार्टी की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं और विपक्ष ने संविधान, आरक्षण तथा पीडीए के सवालों के जरिए BJP के सामाजिक समीकरण में सेंध लगाई थी. ऐसे में 2027 का चुनाव BJP के लिए सिर्फ सत्ता में वापसी या लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सवाल नहीं है, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की जमीन तैयार करने की पहली बड़ी परीक्षा भी है.
बिहार में चुनावी प्रबंधन का अनुभव रखने वाले तावड़े के सामने यूपी की राजनीतिक जमीन कहीं ज्यादा बड़ी और जटिल है. ऐसे में उनकी भूमिका सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि संगठन के भीतर तालमेल से लेकर सामाजिक समीकरण साधने तक कई मोर्चों पर परीक्षा होगी.
सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल
तावड़े के सामने सबसे पहली चुनौती सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की होगी. चुनावी साल में संगठन की अपेक्षाओं और सरकार के कामकाज के बीच तालमेल बेहद अहम माना जाता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बीजेपी नेतृत्व पहले भी सरकारसंगठन के बेहतर समन्वय पर जोर देता रहा है.
गुटबाजी और अंदरूनी खींचतान पर लगाम
यूपी बीजेपी में अलगअलग नेताओं और खेमों के बीच राजनीतिक समीकरण लगातार चर्चा में रहे हैं. ऐसे में तावड़े के सामने चुनौती होगी कि चुनाव से पहले पार्टी के भीतर किसी भी तरह की गुटबाजी को चुनावी नुकसान में बदलने से रोका जाए. सभी बड़े नेताओं को एक मंच पर लाकर सामूहिक नेतृत्व में चुनावी अभियान चलाना उनकी अहम जिम्मेदारी होगी.
जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधना
यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं. बीजेपी को अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथसाथ ओबीसी, दलित और गैरयादव पिछड़े वर्गों के बीच पकड़ मजबूत करनी होगी. नई जिम्मेदारी में तावड़े और पटेल की जोड़ी को अलगअलग क्षेत्रों के सामाजिक समीकरणों को समझकर रणनीति तैयार करनी होगी.
बिहार मॉडल को यूपी की जमीन पर उतारना
बिहार में तावड़े के चुनावी प्रबंधन को बीजेपी की सफलता से जोड़कर देखा गया. अब चुनौती ये होगी कि बिहार में काम आया चुनावी मैनेजमेंट यूपी में कितना कारगर साबित होता है. यूपी की 403 विधानसभा सीटों, अलगअलग क्षेत्रीय मुद्दों और जटिल सामाजिक समीकरणों के कारण किसी भी दूसरे राज्य का मॉडल हूबहू लागू करना आसान नहीं होगा.
2027 में ‘हैट्रिक’ का लक्ष्य
सबसे बड़ी चुनौती नतीजे की होगी. 2017 और 2022 में सरकार बनाने के बाद बीजेपी अब 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करना चाहती है. इसके लिए योगी सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दों में बदलने, बूथ स्तर के संगठन को सक्रिय करने और विपक्ष के खिलाफ प्रभावी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी तावड़े के कंधों पर होगी.
यानी तावड़े के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जिताने की नहीं, बल्कि सरकार, संगठन, सहयोगी दल, लगातार सरकार मे रहने के कारण सत्ताविरोधी लहर,जातीय और सामाजिक समीकरण, इन सभी को एक साथ साधकर बीजेपी के ‘मिशन हैट्रिक’ को जमीन पर उतारने की है.



