UP BJP New Executive Committee: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों ने जोर पकड़ना शुरु कर दिया है। पक्ष हो या विपक्ष दोनों ने ही सियासी बयानबाजी के साथ अपनीअपनी गोटियां सेट करने में लग गए हैं। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने 25 जून को उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक स्तर पर व्यापक बदलाव करते हुए कुछ बड़े फेरबदल किया है। जिसका सीधा असर अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले पर पड़ सकता है। 

Explainer: यूपी बीजेपी की नई सोशल इंजीनियरिंग…क्या पंकज चौधरी की टीम सपा के PDA फॉर्मूले को दे पाएगी चुनौती?​
Explainer: यूपी बीजेपी की नई सोशल इंजीनियरिंग…क्या पंकज चौधरी की टीम सपा के PDA फॉर्मूले को दे पाएगी चुनौती?​

बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले बड़े झटके से सीखते हुए अब नई रणनीति पर चलने का फैसला किया है। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनने के सात महीने बाद अब पार्टी ने उनकी नई प्रदेश कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया है। बीजेपी ने साफ संकेत दिए हैं कि वो जातीय और क्षेत्रीय संतुलन के जरिए समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले का मुकाबला करने की रणनीति तैयार की है।

सामाजिक संतुलन बनाने में लगी बीजेपी

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी पहले से ही सरकार और संगठन के बीच समाजिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार की कमान जहां परंपरागत सवर्ण नेतृत्व के पास है, वहीं सगंठन की जिम्मेदारी ओबीसी समाज से आने वाले पंकज चौधरी के पास है और अब नई प्रदेश टीम के गठन में इसी संतुलन की झलक साफ देखने को मिलती है। 

नई टीम में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन

भाजपा ने अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी में छह क्षेत्रीय अध्यक्ष, 19 उपाध्यक्ष, आठ महामंत्री और 19 प्रदेश मंत्री बनाए गए हैं। पार्टी ने लगभग 40 प्रतिशत प्रमुख पद ठाकुर, ब्राह्मण, भूमिहार और कायस्थ समुदाय से आने वाले नेताओं को दिए हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में ओबीसी और दलित नेताओं को भी संगठन में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। 

भाजपा का मकसद सिर्फ जातीय प्रतिनिधित्व देना नहीं, बल्कि उन वर्गों को अपने साथ  दोबारा जोड़ना भी है, जिनका समर्थन 2024 के लोकसभा चुनाव में कमजोर पड़ता दिखाई दिया था। यही कारण है कि नई टीम बनाते समय पार्टी में युवा और अनुभवी नेताओं के मिश्रण के साथ क्षेत्रीय समीकरणों का भी खास ध्यान रखा गया है।

छह क्षेत्रीय अध्यक्षों में चार ओबीसी

बीजेपी ने अपने सभी पुराने क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलते हुए छह नए चेहरों को मौका दिया है। दिलचस्प बात ये है कि इन छह में से चार ओबीसी समाज से आते हैं। जबकि दो सवर्ण समुदाय से हैं। इस फैसले को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि समाजवादी पार्टी लंबे समय से गैरयादव पिछड़ी जातियों में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करती आ रही है।

भाजपा ने बड़ा दाव खेलते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिम्मा गुर्जर समाज से आने वाले नवाब सिंह नागर को सौंपी है। पश्चिमी यूपी में गुर्जर वोटों पर समाजवादी पार्टी भी लगातार फोकस कर रही है। ऐसे में बीजेपी ने इस वर्ग को मजबूत संदेश देने की कोशिश की है।

पूरन लाल लोधी को ब्रज क्षेत्र की कमा

वहीं, पार्टी ने पूरन लाल लोधी पर दांव लगाने का फैसला करते हुए उन्हें ब्रज क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी है। 2024 के चुनाव में लोध समाज का एक हिस्सा भाजपा से दूर होता नजर आया था। जिसका सीधा असर फिरोजाबाद, मैनपुरी, बदायूं, एटा और आंवला जैसी प्रमुख सीटों पर देखने को मिला था। भाजपा पूरन लाल लोधी को आगे करके लोध समुदाय को फिर से अपने साथ करना चाहती है। 

इसी तरह कानपुर क्षेत्र की कमान राम किशोर साहू को दी गई है। जबकि काशी क्षेत्र की जिम्मेदारी अशोक चौरसिया को मिली है। वहीं अवध क्षेत्र में ब्राह्मण समाज से अवधेश द्विवेदी और गोरखपुर क्षेत्र में भूमिहार समुदाय के विनोद राय को उपाध्यक्ष बनाकर पूर्वांचल और अवध के पारंपरिक वोट बैंक को भी अपने साथ बनाए रखने की कोशिश की है। 

संगठन में दलितओबीसी को प्राथमिकता

भारतीय जनता पार्टी ने नई प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में सामाजिक प्रतिनिधित्व का स्पष्ट संदेश दिया है। पार्टी ने नए बनाए गए 19 उपाध्यक्षों में सात ओबीसी, दो दलित, चार ठाकुर, तीन ब्राह्मण, चार ठाकुर, तीन ब्राह्मण, दो वैश्य और एक भूमिहार नेताओं को शामिल किया है।

प्रदेश मंत्रियों की सूची में भी 19 में से 12 पद दलित और ओबीसी समुदाय के नेताओं को मिले हैं। इनमें नौ ओबीसी और तीन दलित नेता शामिल हैं। बाकी पदों पर ब्राह्मण, भूमिहार, कायस्थ और ठाकुर समुदाय के नेताओं को जगह दी गई है। इससे स्पष्ट है कि बीजेपी ने उन्हीं सामाजिक वर्गों पर विशेष फोकस किया है, जिनके वोटों में 2024 के चुनाव के दौरान गिरावट दर्ज की गई थी।

2024 की हार से मिला सबक

बीजेपी के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन के लिहाज से उतना अच्छा नहीं रहा था। 80 सीटों वाले राज्य में भाजपा केवल 33 सीटें जीत सकी थी। 2019 की तुलना में पार्टी को 31 सीटों का नुकसान हुआ था। यही कारण है कि केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाने के लिए बीजेपी को सहयोगी दलों पर पहले से अधिक निर्भर होना पड़ा।  

2024 में बीजेपी की खराब प्रदर्शन का सीधा फायदा समाजवादी पार्टी को हुआ था। सपा ने  37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने का रिकॉर्ड बनाया। पार्टी की इस सफलता का सबसे बड़ा आधार पीडीए का व्यापक समर्थन था। बीजेपी का मानना है कि पार्टी का पारंपरिक सामाजिक समीकरण 2024 में कमजोर पड़ा। खासकर  गैरयादव ओबीसी और गैरजाटव दलित वर्गों का एक हिस्सा सपा की ओर गया। पार्टी अब उन्हें फिर से अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है। 

पीडीए बनाम नई सोशल इंजीनियरिंगBJP

समाजवादी पार्टी प्रमुख लगातार पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बता रहे हैं। अखिलेश का दावा है कि इन वर्गों की आबादी उत्तर प्रदेश में 85 से 90 प्रतिशत तक है। इसी रणनीति के दम पर सपा ने 2024 के चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया और कई ऐसी सीटें भी जीतीं, जिन्हें बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता था।

बीजेपी अब उसी रणनीति का जवाब अपनी नई सोशल इंजीनियरिंग के जरिए देने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने संगठन में गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित और पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक के बीच संतुलन बनाते हुए व्यापक प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है।

पश्चिम से पूर्वांचल तक अलगअलग रणनीति

बीजेपी की रणनीति क्षेत्रवार भी अलग दिखाई देती है। पूर्वांचल में पार्टी का फोकस कुर्मी, राजभर, कुशवाहा और अन्य गैरयादव ओबीसी समुदायों पर है। यही वे वर्ग हैं जिनमें 2024 के दौरान पार्टी का आधार कमजोर हुआ था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, जाट, सैनी और ठाकुर समुदाय के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। वहीं अवध क्षेत्र में ब्राह्मण नेतृत्व के साथ गैरजाटव दलित समुदाय, विशेषकर पासी समाज को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश हुई है। ब्रज क्षेत्र में लोध और शाक्य समाज को प्रतिनिधित्व देकर पार्टी उन क्षेत्रों में अपना खोया आधार वापस हासिल करना चाहती है, जहां लोकसभा चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ा था।

पंकज चौधरी के सामने बड़ी चुनौती

ओबीसी समुदाय से आने वाले के नेतृत्व में बीजेपी पहली बार 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल संगठन को मजबूत करना नहीं, बल्कि 2024 में खिसके सामाजिक आधार को दोबारा पार्टी के साथ जोड़ना भी है।

बीजेपी लगातार चार बड़े चुनाव 2014 और 2019 के लोकसभा तथा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। अब पार्टी की कोशिश उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगाने की होगी। लेकिन यह राह आसान नहीं है। एक दशक से सत्ता में रहने के कारण सरकार के खिलाफ संभावित एंटीइनकंबेंसी भी पार्टी के सामने चुनौती बन सकती है। ऐसे में नई प्रदेश टीम को केवल संगठनात्मक मजबूती ही नहीं दिखानी होगी, बल्कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, सामाजिक समीकरणों को दोबारा साधने और विपक्ष की रणनीति का प्रभावी जवाब देने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।