Himachal Se: जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा अपने पद से इस्तीफा दिए जाने के बावजूद सरकार उनके खिलाफ प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के मूड में नजर आ रही है. सूत्रों के अनुसार अभी तक जस्टिस वर्मा के इस्तीफे को मंजूरी नहीं मिली है. दावा किया जा रहा है कि सरकार आगामी मॉनसून सत्र में उन्हें पद से हटाने का महाभियोग पर संसद में चर्चा करा सकती है.

जस्टिस वर्मा के पूरे मामले की जांच कर रही विशेष समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंप चुकी है. हालांकि समिति की रिपोर्ट को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन सूत्रों का दावा है कि रिपोर्ट में लगे आरोपों को गंभीरता से लिया गया है. यही वजह है कि इस्तीफे के बाद भी सरकार इस मामले को तार्किक अंत तक ले जाना चाहती है, ताकि भविष्य के लिए एक सख्त संदेश दिया जा सके.
पारदर्शिता को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता
सरकार से जुड़े जानकारों का मानना है कि सरकार इस कार्रवाई के जरिए पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाना चाहती है. दूसरी ओर, विपक्ष भी इस मुद्दे पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और मॉनसून सत्र में महाभियोग को लेकर संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष में तीखी बहस होने के पूरे आसार हैं.
इससे पहले पिछले हफ्ते जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच कर रही एक जांच समिति ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर जले हुए नोट मिलने के बाद उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी.
स्पीकर ने बनाई थी 3 सदस्यीय जांच समिति
रिपोर्ट को लेकर लोकसभा सचिवालय ने बताया कि न्यायाधीश अधिनियम, 1968 के तहत वैधानिक आवश्यकताओं के अनुपालन में पेश की गई यह रिपोर्ट उचित समय पर संसद के दोनों सदनों में पेश की जाएगी. संसद की अगली बैठक मानसून सत्र में होगी, और यह अमूमन जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होता है।
लोकसभा स्पीकर ने पिछले साल 12 अगस्त को 3 सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में पिछले साल 14 मार्च की रात को आग लग गई थी और इसी दौरान दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर उनके बंगले के एक स्टोर रूम में भारी मात्रा में जले हुई रुपये बरामद किए.
जस्टिस वर्मा उस वक्त दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे और मामला सामने आने तक उन्हें उनके मूल कोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस भेज दिया गया था. तब तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की ओर से गठित एक आंतरिक समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि जस्टिस वर्मा का उस स्पेशल स्टोर रूम पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण था, जहां कथित तौर पर भारी मात्रा में कैश छिपाया गया था.
200 से अधिक सांसदों ने किए थे हस्ताक्षर
इस बीच जुलाई 2025 में, 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए थे. हालांकि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज और मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल संसद द्वारा न्यायाधीश अधिनियम में उल्लिखित प्रक्रिया के तहत ही पद से हटाया जा सकता है. पिछले साल अगस्त में लोकसभा स्पीकर ने आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था.
हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के बीच जस्टिस ने पिछले दिनों इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया जिससे उनके खिलाफ बर्खास्तगी की कार्यवाही रुक गई. हालांकि जस्टिस वर्मा का नाम अब भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज के रूप में दर्ज है. वैसे जस्टिस वर्मा को 5 जनवरी, 2031 को 62 साल की उम्र पूरी होने पर रिटायर होते.



