Himachal Se: देश में हज यात्रा का माहौल चल रहा है. बड़ी संख्या में मुस्लिम जायरीन देश के विभिन्न हिस्सों से मक्कामदीना की यात्रा कर रहे हैं. 25 मई 2026 से सऊदी अरब के मक्का में पवित्र हज शुरू है. वहां का तापमान इन दिनों 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास है. ऐसे में कहा जा सकता है कि यात्रा पहले भी कठिन थी, आज भी आसान नहीं है. मुगलों के दौर में यहां तक पहुंचना आसान नहीं था. मुगल काल में भारत से हज जाने का सबसे बड़ा रास्ता समुद्री मार्ग था. उत्तर भारत, दक्कन और गुजरात के लोग पहले किसी बड़े बंदरगाह तक पहुंचते थे. इनमें सूरत सबसे महत्वपूर्ण था. सूरत को मुगल काल में हज यात्रियों का बड़ा केंद्र माना जाता था. यहां से जहाज अरब की ओर जाते थे.

ऐसे में एक सवाल उठता है कि आज जब हवाई जहाज की सुविधा है, बड़ेबड़े शिप मौजूद हैं, लेकिन मुगल काल में इतनी सुविधाएं स्वाभाविक है कि नहीं थीं. उस जमाने में हज यात्रा कैसे होती थी? कितना मुश्किल हुआ करता था हज का सफर? कितने दिन लगते थे हज यात्रा को पूरा करने में?
मुगलों के दौर में हज का सफर लम्बा, महंगा और जोखिमभरा था
हज इस्लाम का बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य है. जो मुसलमान शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हो, वह जीवन में कमसेकम एक बार मक्का जाकर हज करना चाहता है. मुगल बादशाह भी इस भावना को समझते थे. सभी बादशाह खुद हज पर नहीं गए, लेकिन उन्होंने हज यात्रियों की मदद की. कई शाही महिलाएं, अमीर, सूफी, व्यापारी और आम लोग हज के लिए भारत से निकलते थे.
मुगल दौर में न हवाई जहाज थे और न हाईटेक सुविधाएं. इसलिए हज का सफर लंबा, महंगा और जोखिम भरा होता था. फिर भी लोग जाते थे. उनके लिए यह केवल यात्रा नहीं थी. यह ईमान, सब्र और त्याग की परीक्षा भी थी.
सूरत को मुगल काल में हज यात्रियों का बड़ा केंद्र माना जाता था. फोटो: Pexels
मुगल भारत से हज का मुख्य रास्ता क्या था?
मुगल काल में भारत से हज जाने का सबसे बड़ा रास्ता समुद्री मार्ग था. उत्तर भारत, दक्कन और गुजरात के लोग पहले किसी बड़े बंदरगाह तक पहुंचते थे. इनमें सूरत सबसे महत्वपूर्ण था. सूरत को मुगल काल में हज यात्रियों का बड़ा केंद्र माना जाता था. यहां से जहाज अरब की ओर जाते थे. लोग पहले अपने शहर से काफिले के साथ निकलते थे. कई दिनों या हफ्तों में सूरत पहुंचते. वहां जहाज, मौसम और अनुमति का इंतज़ार करना होता था. फिर अरब सागर पार कर जेद्दा या कभीकभी मोखा जैसे बंदरगाह पहुंचते थे जायरीन. जेद्दा से ऊंट, घोड़े या पैदल मक्का जाने का तरीका अपनाया जाता था. यानी हज केवल समुद्र की यात्रा नहीं थी. इसमें ज़मीन और समुद्र, दोनों तरह का कठिन सफर शामिल था.
सूरत इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
सूरत मुगल साम्राज्य का बड़ा व्यापारिक बंदरगाह था. यहां से लाल सागर और अरब के लिए जहाज चलते थे. हज यात्रियों, व्यापारियों और सूफी यात्रियों के लिए यह मुख्य द्वार बन गया था. 17वीं सदी के यूरोपीय यात्रियों और व्यापारिक दस्तावेज़ों में भी सूरत को मक्का जाने वाले जहाजों का प्रमुख केंद्र बताया गया है. मुगल राज्य को भी यह समझ थी कि हज यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा से उसकी इस्लामी प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है. इसलिए शाही परिवार और उच्च वर्ग अक्सर हज जहाजों को धन, उपहार और सुरक्षा दिलवाते थे.
अगर कोई यात्री दिल्ली, आगरा, लाहौर या उत्तर भारत के किसी बड़े शहर से निकलता था, तो उसे पहले सूरत पहुंचना पड़ता था. फोटो: Pexels
मुगल हज करने में कितना समय लगता था?
इस प्रश्न का एक लाइन में जवाब देना मुश्किल है. समय कई बातों पर निर्भर करता था. उदाहरण के लिए यात्री किस शहर से चला? वह किस मौसम में निकला? सूरत में उसे कितना इंतज़ार करना पड़ा? समुद्र शांत था या तूफानी? जहाज सीधा जेद्दा गया या बीच में कहीं रुका? बीमारी, लूट या राजनीतिक रुकावट तो नहीं आई? कुल समय इन सारे हालातों पर निर्भर करते थे. इसलिए ऐसा कहना उस जमाने में बेहद मुश्किल था कि हज यात्रा दसबीसतीस दिन या उससे भी कहीं ज्यादा समय लग सकता था. मतलब समय फिक्स करना अपने हाथ में नहीं था.
सूरत बंदरगाह पहुंचने में कितना समय लगता था?
अगर कोई यात्री दिल्ली, आगरा, लाहौर या उत्तर भारत के किसी बड़े शहर से निकलता था, तो उसे पहले सूरत पहुंचना पड़ता था. यह सफर कई बार एक महीने से दो महीने तक ले लेता था. रास्ता बैलगाड़ी, घोड़े, ऊंट या पैदल तय किया जाता था. काफिला धीरे चलता था. रास्ते में सराय, नदियां, कर चौकियां, डाकू और मौसम बड़ी समस्याएं थीं. अगर यात्री गुजरात या दक्कन के पास रहता था, तो समय कम लगता था. लेकिन उत्तर भारत से आने वालों के लिए यह यात्रा अपने आप में एक बड़ी परीक्षा थी.
मुगल बादशाह शाहजहां.
समुद्री यात्रा कितने दिन की होती थी?
सूरत से जेद्दा या लाल सागर के पास के बंदरगाह तक समुद्री यात्रा आम तौर पर तीन से छह हफ्ते लगते थे. अच्छे मौसम में यह कम भी हो सकती थी. खराब मौसम में अधिक भी. कई बार जहाज पहले मोखा पहुंचते थे. वहां से आगे का इंतज़ाम होता था. पुराने जहाज हवा पर निर्भर थे, इसलिए मानसून बहुत महत्वपूर्ण था. गलत मौसम में जहाज फंस सकता था. तूफान आ सकता था. रास्ता भटक सकता था. इस कारण यात्री कई बार बंदरगाह पर हफ्तों तक मौसम ठीक होने का इंतज़ार करते थे.
कुल मिलाकर पूरी यात्रा कितने महीनों की होती थी?
अगर पूरे सफर को देखें, तो भारत से निकलकर हज पूरा कर वापस आने में अक्सर छह महीने से एक साल तक लग सकता था. कुछ यात्राएं इससे भी लंबी होती थीं. कारण साफ है. यात्री को घर से बंदरगाह तक जाना, जहाज की प्रतीक्षा करना, समुद्र पार करना, जेद्दा से मक्का पहुंचना, हज के दिन का इंतज़ार करना फिर वापसी जहाज का इंतज़ार करना. इन सब चरणों में समय लगता था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। लोग जाने से पहले घर, व्यापार और संपत्ति का इंतज़ाम करके निकलते थे. क्योंकि उन्हें नहीं पता होता था कि कब तक वापसी होगी?
सफर इतना मुश्किल क्यों था?
हज यात्रा कठिन थी. बहुत कठिन थी. इसके पीछे एक नहीं, अनेक कारण थे.
1 समुद्री तूफान और जहाज डूबने का डर
अरब सागर और लाल सागर का सफर सुरक्षित नहीं था. जहाज लकड़ी के होते थे. तकनीक सीमित थी. समुद्र में तेज़ हवाएं, तूफान और लहरें जानलेवा बन सकती थीं. कई यात्रियों को समुद्री बीमारी होती थी. पानी खराब हो जाता था. खाना सीमित होता था.
2 लुटेरों और समुद्री ताकतों का खतरा
16वीं और 17वीं सदी में हिंद महासागर पर पुर्तगालियों का बड़ा असर था. वे कई जगह समुद्री रास्तों को नियंत्रित करते थे. कई जहाजों से वे अनुमतिपत्र, जिसे कार्ताज़ कहा जाता था, मांगते थे. बिना अनुमति के जहाज को रोकना, लूटना या पकड़ना संभव था. बाद में अन्य यूरोपीय ताकतें भी समुद्री राजनीति में आ गईं. इससे हज यात्रा और तनावपूर्ण हुई. जहांगीर के समय एक प्रसिद्ध घटना हुई. शाही संबंध वाली बड़ी जहाज रहीमी को पुर्तगालियों ने पकड़ लिया. इससे मुगल दरबार बहुत नाराज़ हुआ. यह घटना बताती है कि हज और समुद्री व्यापार राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं थे.
3 बीमारी और मौत का खतरा
लंबी यात्रा में स्वच्छ पानी मिलना कठिन था. भीड़ अधिक होती थी. जहाजों पर तंग जगह होती थी. गर्मी और संक्रमण का डर रहता था. कई लोग रास्ते में बीमार पड़ते थे. कुछ लोग वापस नहीं लौट पाते थे. उस दौर में डॉक्टर, दवा और साफसफाई की सुविधा बहुत सीमित थी.
मुगलों के लिए भी हज यात्रा करना आसान नहीं था. फोटो: Pexels
4 आर्थिक बोझ
हज सस्ता सफर नहीं था. यात्री को घर से बंदरगाह तक का खर्च उठाना पड़ता था. फिर जहाज का किराया, खाने का खर्च, जेद्दा से मक्का तक की यात्रा, ठहरने का खर्च और वापसी का इंतज़ाम. इसलिए गरीब आदमी के लिए यह बहुत कठिन था. कई लोग जीवन भर पैसे जोड़ते थे.
5 प्रशासनिक और राजनीतिक बाधाएं
विदेशी बंदरगाहों पर कर देना पड़ सकता था. स्थानीय शासकों की शर्तें माननी पड़ती थीं. कभीकभी रास्ते बंद हो जाते थे. कभी युद्ध का असर पड़ता था. कभी जहाजों को देरी से अनुमति मिलती थी यानी धार्मिक यात्रा भी राजनीति से प्रभावित होती थी.
शाही परिवार और महिलाओं की हज यात्रा
मुगल इतिहास में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण गुलबदन बेगम का है. वह बाबर की बेटी और हुमायूं की बहन थीं. अकबर के समय उन्होंने हज की यात्रा की. उनके साथ कई शाही महिलाएं भी गईं. यह बताता है कि मुगल दरबार में हज के प्रति गहरी श्रद्धा थी। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि शाही महिलाओं के लिए भी यात्रा आसान नहीं थी. उन्हें सुरक्षा, धन और बड़े काफिले की जरूरत होती थी. अकबर ने हज यात्रियों की सहायता के लिए दान और प्रबंध किए. हालांकि, बाद में लाल सागर और हिंद महासागर की राजनीति ने इन यात्राओं को जटिल बना दिया.
क्या सभी मुगल बादशाह खुद हज पर गए?
इसका जवाब हैनहीं. कोई प्रमुख मुगल बादशाह खुद मक्का तक नहीं गया. इसका एक बड़ा कारण था शासन की जिम्मेदारी. दूसरा कारण था लंबा और खतरनाक सफर. लेकिन उन्होंने हज को महत्व दिया. उन्होंने कई बार हज यात्रियों, सूफियों और शाही महिलाओं की सहायता की. कुछ बादशाहों ने मक्का और मदीना के लिए उपहार, धन और दान भी भेजे.



