Himachal Se: Pradosh Vrat Katha In Hindi: सनातन धर्म में प्रदोष व्रत को बेहद शुभ और फलदायी माना गया है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इसे श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत करने वाले भक्तों पर भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा बनी रहती है। प्रदोष व्रत की पूजा के दौरान इसकी कथा का पाठ करने से संपूर्ण फल की प्राप्ति होती है। यहां पढ़िए प्रदोष व्रत की महिमा और महत्व को दर्शाती यह पौराणिक कथा।

प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी अपने परिवार के साथ रहता था। कुछ समय बाद उस पुजारी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी पत्नी परिवार का पालनपोषण करने लगी। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। वह अपने छोटे पुत्र को साथ लेकर भीख मांगने लगी और दिनभर भटकने के बाद शाम को घर लौटती थी। एक दिन रास्ते में उसकी मुलाकात विदर्भ देश के एक राजकुमार से हुई। अपने पिता की मृत्यु के बाद वह राजकुमार भी दरदर भटकने को मजबूर था।
राजकुमार की दयनीय स्थिति देखकर पुजारी की पत्नी का हृदय पिघल गया और वह उसे अपने घर ले आई। उसने राजकुमार को अपने पुत्र के समान स्नेह और आश्रय दिया। कुछ समय बाद पुजारी की पत्नी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम पहुंची। वहां ऋषि ने उसे भगवान शिव के प्रदोष व्रत की कथा, महत्व और पूजा विधि बताई। कथा सुनने के बाद वह महिला पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करने लगी। एक दिन दोनों बालक जंगल घूमने गए। पुजारी का पुत्र तो वापस लौट आया, लेकिन राजकुमार वहीं रुक गया।
जंगल में उसकी मुलाकात गंधर्व कन्याओं से हुई, जिनमें अंशुमती नाम की कन्या भी शामिल थी। दोनों के बीच बातचीत हुई और राजकुमार देर से घर लौटा। बाद में अंशुमती के मातापिता को राजकुमार पसंद आ गया। उन्होंने कहा कि शिव जी की कृपा से वे अपनी पुत्री का विवाह उससे करना चाहते हैं। राजकुमार ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और दोनों का विवाह संपन्न हो गया। विवाह के बाद राजकुमार ने गंधर्वों की विशाल सेना की सहायता से विदर्भ राज्य पर आक्रमण किया और युद्ध में विजय प्राप्त कर अपना खोया हुआ राज्य वापस हासिल कर लिया। वह अपनी पत्नी अंशुमती के साथ सुखपूर्वक राज्य करने लगा।
राजकुमार ने पुजारी की पत्नी और उसके पुत्र को भी महल में सम्मान के साथ स्थान दिया। इस तरह उनके भी सभी दुख दूर और दरिद्रता समाप्त हो गई। एक दिन अंशुमती ने पति से उसके जीवन में आए इस बड़े बदलाव का कारण पूछा। तब राजकुमार ने उसे बताया कि यह सब प्रदोष व्रत के प्रभाव से संभव हुआ है। तभी से प्रदोष व्रत की महिमा चारों ओर फैल गई और लोग श्रद्धा भाव से यह व्रत करने लगे।



