Himachal Se: Garud Puran Niyam: सनातन धर्म ग्रंथों में मृत्यु के बाद की प्रक्रियाओं और आत्मा की यात्रा का विस्तार से वर्णन मिलता है। खासतौर पर गरुड़ पुराण में आत्मा की स्थिति, कर्मों का प्रभाव और अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियम बताए गए हैं। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण परंपरा है कि शव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ा जाता। तो क्या आपके मन में कभी यह सवाल उठा है कि आखिर क्यों हर हाल में इस परंपरा का निर्वाह किया जाता है। चलिए जानते हैं मरने के बाद व्यक्ति की मृत देह को अकेले न छोड़ने का इतना कड़ा नियम क्यों है। गरुड़ पुराण में इसके पीछे क्या रहस्य बताया गया है।

Garud Puran: मरने के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता, गरुड़ पुराण में बताया है इसका गहरा रहस्य​
Garud Puran: मरने के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता, गरुड़ पुराण में बताया है इसका गहरा रहस्य​

जन्ममरण की निरंतर प्रक्रिया

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जिस किसी ने भी इस संसार में जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है। व्यक्ति अपने कर्मों और चेतना के आधार पर अलगअलग योनियों में जन्म लेता है और यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक उस आत्मा को मोक्ष नहीं मिल जाता और ग्रंथों में मोक्ष प्राप्ति के लिए जीते जी मनुष्य को अच्छे कर्म करने पर विशेष जोर दिया गया है।

शव की सुरक्षा का कारण

मृत शरीर को अकेला न छोड़ने के पीछे प्रमुख व्यावहारिक कारण है। अगर शव लंबे समय तक बिना निगरानी के रहे तो उसके आसपास चींटियां, कीड़े या अन्य जीव आ सकते हैं, जिससे शरीर को नुकसान होता है। ऐसे में परिवार में से कोई व्यक्ति वहां मौजूद रहता है।

बुरी शक्तियों से बचाव की मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, रात के समय बुरी शक्तियां अधिक सक्रिय होती हैं। कहते हैं कि अगर मृत देह को अकेला छोड़ दिया जाए, तो भटकती आत्माएं या नकारात्मक ऊर्जा उस शरीर में प्रवेश कर सकती हैं। इससे परिवार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका मानी जाती है।

अन्य प्रमुख कारण

आत्मा का शरीर से जुड़ाव

गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि अंतिम संस्कार होने तक आत्मा का अपने शरीर से मोह बना रहता है। वह अपने परिजनों और आसपास की गतिविधियों को महसूस करती है। ऐसे में शव को अकेला छोड़ना आत्मा को दुख पहुंचाने जैसा माना जाता है। यही कारण है कि परिवारजन मृतक के पास बैठकर प्रार्थना और स्मरण करते हैं।

दीपक और धूप जलाने का महत्व

मृत शरीर के पास धूप, अगरबत्ती और दीपक जलाने की परंपरा भी प्राचीन समय से चली आ रही है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता के साथसाथ वातावरण को शुद्ध रखने का उद्देश्य भी होता है। माना जाता है कि प्रकाश और सुगंध नकारात्मकता को दूर रखने में सहायक होते हैं।

अधोगति से बचाने की मान्यता

धार्मिक कथाओं में यह भी कहा गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा की गति उसके कर्मों पर निर्भर करती है। इसी कारण शव के आसपास साफसफाई और उजाले का विशेष ध्यान रखा जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण का इंतजार करने का प्रसंग इसी आध्यात्मिक मान्यता से जुड़ा माना जाता है।

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