भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। सोमवार को नेपाल सरकार ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे पर अपने क्षेत्रीय दावे को दोहराते हुए भारत के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकालने की वकालत की। यह प्रतिक्रिया भारत द्वारा नेपाल के रुख को कड़े शब्दों में खारिज किए जाने के ठीक एक दिन बाद आई है। भारत ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से दशकों से आयोजित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति को रविवार को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि क्षेत्रीय दावों का ऐसा ‘‘एकतरफा कृत्रिम विस्तार’’ अस्वीकार्य है।

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भारत की इस प्रतिक्रिया के पहले नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के रास्ते आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह उसका क्षेत्र है।
नेपाल सरकार के प्रवक्ता सस्मित पोखरेल ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘‘नेपाल का अपनी सीमा बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है; यह क्षेत्र नेपाल का है, और सरकार का इस बारे में स्पष्ट दृष्टिकोण है और वह अपने रुख के प्रति प्रतिबद्ध है।’’

शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री पोखरेल ने कहा, ‘‘इस मुद्दे को दोनों देशों के बीच सहयोग और राजनयिक बातचीत के माध्यम से हल करने की आवश्यकता है।’’
उन्होंने कहा कि विदेश मंत्रालय ने इस मामले की जानकारी भारत को औपचारिकपत्र के माध्यम से पहले ही दे दी है।
चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की तीर्थयात्रा हिंदुओं, जैनियों और बौद्धों के लिए धार्मिक महत्व रखती है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के तहत लगभग पांच साल के अंतराल के बाद पिछले साल यह यात्रा फिर से शुरू हुई।

 

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विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को घोषणा की थी कि वार्षिक कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष जून से अगस्त तक दो मार्गों उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रा और सिक्किम में नाथू ला दर्रा के रास्ते होगी।

कूटनीतिक जटिलता

लिपुलेख का मुद्दा 2020 में तब और अधिक गरमा गया था जब नेपाल ने अपना नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। भारत इसे हमेशा से नकारता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक समानता के बावजूद, सीमा विवाद का यह “एकतरफा” नैरेटिव द्विपक्षीय संबंधों के लिए चुनौती बना हुआ है।