नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल और असम सहित पांच राज्यों के चुनावी नतीजों की झलक बता रही है कि राजनीति के बड़े-बड़े सूरमाओं के समीकरण कैसे चारों खाने चित हुए हैं। इन चुनावों में जनता ने यह साफ तौर पर बता दिया कि खामोशी के साथ दबाया गया ईवीएम के बटन का शोर बड़ी से बड़ी सत्ता को हिला सकता है। असम में बीजेपी की हैट्रिक सबूत है कि कैसे एक चेहरा दिल्ली तक गूंज मचा सकता है। केरल में सत्ता विरोधी लहर ने वामपंथ के गढ़ को हिला दिया। तमिलनाडु के चुनावी नतीजे इस बात के गवाह हैं कि सिल्वर स्क्रीन का जादू आज भी किस हद तक एक बड़ी आबादी के दिलों की धड़कन है। आइए समझते हैं कि चार मई को आए ये चुनावी परिणाम कौन से चार बड़े सबक लेकर आए हैं।

असम में कमल, कमल, कमल…
भारतीय जनता पार्टी ने असम में तीसरी बार अपनी सरकार बनाकर हैट्रिक लगाई है। बीजेपी ने साबित कर दिया कि राज्य में अब वह ‘मेहमान’ पार्टी नहीं, बल्कि उस घर की मुखिया है। विकास के मुद्दे और हिंदुत्व की विचारधारा के कॉकटेल से हिमंता बिस्वा सरमा ने पूरे चुनावी रण को एकतरफा रखा। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता को आगे रखते हुए और चुनाव प्रचार में आक्रामकता के साथ बीजेपी ने जो रणनीति अपनाई, विपक्षी दल उसके आस-पास भी नहीं थे।

9 अप्रैल को हुए रिकॉर्ड 85.64 फीसदी मतदान के बाद सियासी जानकार जब इसके मायने समझने में लगे थे, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि बीजेपी जीत भी उतनी ही दमदार दर्ज करेगी। अभी तक की मतगणना के मुताबिक, असम की 126 सीटों में से बीजेपी 78 पर आगे चल रही है। लगभग 39.41 फीसदी वोट शेयर हासिल कर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव के अपने पिछले रिकॉर्ड 33.6 फीसदी को भी पीछे छोड़ दिया है।

पश्चिम बंगाल में ‘खेला’, ढह गया 15 साल पुराना किला
बात जब ‘खेला’ करने की हो, तो पश्चिम बंगाल की जनता ने दिखा दिया कि असली ‘खेला’ क्या होता है। चुनाव प्रचार के बीच एक रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने भविष्यवाणी की थी, ‘4 मई को सुबह काउंटिंग शुरू होगी, 8 बजे बैलेट बॉक्स खुलना शुरू होगा, 9 बजे पहला राउंड, 10 बजे दूसरा राउंड, 1 बजे काउंटिंग समाप्त और दीदी टाटा बाय-बाय।’ शायद अमित शाह भांप चुके थे कि पश्चिम बंगाल की जनता ने बदलाव का मन बना लिया है।

केंद्रीय बलों की बड़े स्तर पर तैनाती के बीच बंगाल में रिकॉर्ड मतदान हुआ। पहले चरण में 93 फीसदी और दूसरे चरण में 92 फीसदी से ऊपर के वोटिंग के आंकड़े ने बदलाव की आहट पहले ही दिखा दी थी। चुनाव के बीच हिंसा भी हुई और आरोपों के तीर भी चले, लेकिन आखिरकार बंगाल में बदलाव हो गया। चुनाव आयोग के अभी तक के आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी को 181 सीटों पर बढ़त हासिल है।

तमिलनाडु में एक और सुपरस्टार सीएम का उदय
फिल्म एक्टर से राजनेता बने थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (टीवीके) ने तमिलनाडु में करिश्मा कर दिया है। अपने पहले ही चुनाव में विजय की पार्टी प्रदेश की एक मजबूत ताकत बनकर उभरी है। राज्य की दो दिग्गज और पुरानी पार्टियों- डीएमके और एआईएडीएमके को टीवीके ने पीछे छोड़ दिया है। विजय की पार्टी इस समय 234 में से 108 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।

तमिलनाडु की परंपरा रही है कि यहां सिनेमा केवल सिल्वर स्क्रीन पर ही नहीं रुकता, बल्कि इससे बाहर निकलकर सरकार भी चलाता है। एमजी रामचंद्रन, जयललिता, कमल हासन, खुशबू और विजयकांत, तमिलनाडु में वो नाम हैं, जो सिनेमा की पारी खेलने के बाद राजनीति में खूब छाए। इनमें एमजी रामचंद्रन और जयललिता तो मुख्यमंत्री भी बने। थलापति विजय ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है।

लेफ्ट का अखिरी किला ढहा, केरल में UDF की वापसी
वामपंथी विचारधारा के तौर पर केरल लेफ्ट का आखिरी और मजबूत गढ़ था। लेकिन, इस बार चुनाव में ये किला पूरी तरह टूट गया। बदलाव की बयार बही और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने राज्य की सत्ता में वापसी की दस्तक दे दी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, यूडीएफ इस समय 140 में से 100 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।

चुनाव की घोषणा के साथ ही तय हो गया था कि राज्य में मुख्य मुकाबला यूडीएफ और एलडीएफ के बीच रहेगा। एलडीएफ का चेहरा पूरी तरह से मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन थे। वहीं, यूडीएफ की तरफ से चुनाव अभियान का अगुवाई केसी वेणुगोपाल, वीएन सतीशन और रमेश चेन्निथाला कर रहे थे। चुनाव नतीजों ने दिखा दिया कि विचारधारा भले ही कितनी भी मजबूत क्यों ना हो, सत्ता विरोधी लहर बड़े से बड़े किले को गिरा देती है।