पूरी दुनिया इस वक्त शांति की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन पाकिस्तान है कि हर मौके पर अपनी बेइज्जती करवाने का कोई रास्ता निकाल ही लेता है। एक तरफ मध्य पूर्व में तनाव कम हो रहा था। सीज फायर लागू हो चुका था। ईरान ने भी अपने हमले रोक दिए थे। लेकिन तभी पाकिस्तान ने फिर वही पुराना खेल खेल दिया। जिस वक्त दुनिया शांति की तरफ बढ़ रही थी। उस वक्त पाकिस्तान ने अपने फाइटर चैट्स और करीब 13,000 सैनिक सऊदी अरब में भेज दिए। दरअसल 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता हुआ था। जिसके मुताबिक अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। कागजों पर यह समझौता भले ही मजबूत दिखता था, लेकिन असल में यह पाकिस्तान की मजबूरी और उसकी निर्भरता को उजागर करता है। सबसे बड़ी बात देखिए जब ईरान सऊदी अरब पर हमले कर रहा था, तब पाकिस्तान कहीं नजर नहीं आया। 

जैसे ही माहौल शांत हुआ,पाकिस्तान दिखावा करने पहुंच गया। यानी खतरे के वक्त गायब और बाद में हीरो बनने की कोशिश। अब यहां एक और बड़ा खेल देखिए। एक तरफ पाकिस्तान खुद को शांति का दूत दिखाना चाहता है। इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत करवाने की कोशिश कर रहा है और दूसरी तरफ उसी इलाके में अपनी सेना भेजकर एक पक्ष के साथ खड़ा भी हो रहा है। आप खुद सोचिए क्या कोई देश एक साथ मध्यस्थ भी बन सकता है और किसी एक पक्ष का सैनिक साथी भी यही पाकिस्तान के दोहरी नीति है जो उसकी कूटनीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। असल में यह कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब पर निर्भर रहा है और इसके बदले में सऊदी अरब उसे बार-बार आर्थिक मदद देता है। जब यूएई ने पाकिस्तान से अपना कर्ज वापस मांगा तब भी सऊदी अरब ही सामने आया। 2018 में 6 अरब का पैकेज और आज भी आर्थिक संकट के वक्त सऊदी का सहारा यानी साफ है कि पाकिस्तान की विदेश नीति या रणनीति पर नहीं बल्कि मजबूरी बन चुकी है। जहां फैसले राष्ट्रीय हित से नहीं बल्कि पैसों के दबाव से लिए जाते हैं। यही वजह है कि आज पाकिस्तान अपने ही सैनिकों को हजारों किलोमीटर दूर भेज रहा है। जबकि उसके अपने देश में हालत स्थिर नहीं है। 

पहले ही ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान का खुलकर सऊदी के साथ खड़ा होना उसे एक पक्षीय खिलाड़ी बना देता है। जिसका सीधा असर भविष्य में उस पर पड़ सकता है। यानी आने वाले समय में पाकिस्तान खुद अपने लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। कुल मिलाकर पाकिस्तान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि सुधारने में नहीं बल्कि उसे और उलझाने में माहिर है। एक तरफ शांति वार्ता दूसरी तरफ सैन्य तैनाती ये दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकती। लेकिन पाकिस्तान से शायद यही उम्मीद की जा सकती थी। 
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