दक्षिण लेबनान से आ रही तस्वीरें एक बार फिर युद्ध की भयावहता को सामने ला रही हैं, जहां पूरे के पूरे गांव मलबे में तब्दील होते नजर आ रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है और मानवाधिकार संगठनों ने इसे गंभीर मुद्दा बताया है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, इजरायली सेना ने लेबनान के सीमावर्ती इलाकों में कई गांवों को विस्फोटक लगाकर उड़ा दिया है। सामने आए वीडियो और स्थानीय रिपोर्टों में तैयबेह, नकौरा और देइर सेरयान जैसे गांवों में बड़े पैमाने पर धमाकों के जरिए घरों को पूरी तरह नष्ट करते देखा गया। हालांकि कुछ दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
बता दें कि यह कार्रवाई ऐसे समय पर हुई है जब इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने सीमा के पास मौजूद गांवों में सभी घरों को खत्म करने की बात कही थी। गौरतलब है कि इससे पहले गाजा पट्टी के रफाह और बीत हनून जैसे इलाकों में भी इसी तरह की रणनीति अपनाई गई थी, जहां बड़ी संख्या में घर तबाह हुए थे।
विशेषज्ञों और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि इस तरह की रणनीति को “डोमिसाइड” कहा जाता है, जिसमें जानबूझकर नागरिक इलाकों को इस तरह नष्ट किया जाता है कि वे रहने लायक न रहें। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में गंभीर सवाल खड़े करता है।
इजरायल की ओर से कहा गया है कि इन कार्रवाइयों का मकसद हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाना है, जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे आम नागरिकों के घरों और ढांचों के बीच छिपे हुए हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि पूरे गांवों को नष्ट करना किसी भी सैन्य जरूरत से कहीं ज्यादा है।
गौरतलब है कि इजरायल दक्षिण लेबनान में एक सुरक्षा क्षेत्र बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है, जो लितानी नदी तक फैला हो सकता है। इस योजना के तहत विस्थापित लोगों को तब तक अपने घरों में लौटने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जब तक उत्तरी इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती।
वहीं स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ इमारतों का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी के खत्म हो जाने जैसा है। तैयबेह के एक दुकानदार ने बताया कि उनका कारोबार, यादें और पूरा जीवन एक ही पल में खत्म हो गया। कई लोगों ने खुद को अब बेघर और शरणार्थी जैसा महसूस करने की बात कही है।
जानकार मानते हैं कि इस तरह की घटनाएं सिर्फ मौजूदा संघर्ष तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक असर छोड़ती हैं। दक्षिण लेबनान के कई परिवार पहले से ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे हुए हैं और अब उनके लिए अपने घर लौटने की उम्मीद और भी कमजोर हो गई है।






